धर्म-अध्यात्म

टूटे हुए को सार्थक बना लेना ही असली विजय है : संदर्भ एकदंत गणेश

गणेश जी की प्रतिमा देखते ही एक सहज जिज्ञासा होती है , गजानन के दो दाँतों में से एक दाँत कहाँ गया? वे एकदंत क्यों कहलाते हैं?

इस प्रश्न का उत्तर किसी एक कथा में नहीं मिलता। भारतीय पुराण-परंपरा में गणेश जी के दाँत के टूटने के कई आख्यान हैं। किसी कथा में परशुराम के परशु का प्रहार है, किसी में कार्तिकेय का क्रोध। महाभारत की लोकप्रिय परंपरा में गणेश जी स्वयं अपना दाँत तोड़कर उसे लेखनी बना लेते हैं। किंतु गणेश पुराण में एक अलग और अत्यंत अर्थपूर्ण प्रसंग मिलता है।

यहीं से ‘एकदंत’ का अर्थ केवल शारीरिक विशेषता न रहकर जीवन-दर्शन बन जाता है।

गणेश पुराण के क्रीड़ाखण्ड में गणेश जी का महोत्कट विनायक रूप वर्णित है। उस समय असुरराज नरान्तक और देवान्तक के अत्याचार से लोक व्याकुल है। नरान्तक के वध के बाद देवान्तक और महोत्कट विनायक का भीषण युद्ध होता है।

युद्ध अपने चरम पर पहुँचता है।

देवान्तक गणेश जी के दाँत पकड़ लेता है। संघर्ष में उनके एक दाँत का अग्रभाग टूटकर उसके हाथ में रह जाता है। यहीं कथा का सबसे विलक्षण मोड़ आता है।

गणेश जी उस टूटे हुए दाँत को अपनी दुर्बलता नहीं मानते। वे उसे ही अस्त्र बना लेते हैं और उसी के प्रहार से देवान्तक का अंत कर देते हैं।

कितना अद्भुत विरोधाभास है!

जिसने दाँत तोड़ा, उसी ने अनजाने में अपने विनाश का अस्त्र गणेश के हाथों में दे दिया।

यही इस कथा का सार है।

जीवन में टूटना असामान्य नहीं है। कभी परिस्थितियाँ तोड़ती हैं, कभी असफलताएँ। कभी संबंधों की दरारें भीतर तक उतर जाती हैं। कभी हमारी अपनी भूलें हमें अपने ही सामने छोटा कर देती हैं। तब हम उस टूटन को अपनी कमी समझ बैठते हैं।

लेकिन गणेश पुराण की यह कथा पूछती है, टूटने के बाद तुम करते क्या हो?

गणेश जी के पास विकल्प था कि वे अपने टूटे दाँत को देखकर शोक करें। उसे अपनी पराजय मानें। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।

उन्होंने उसे उठा लिया।

और वही टूटा हुआ हिस्सा उनकी शक्ति बन गया।

शायद यही गणेश-तत्त्व है, विघ्न को केवल हटाना नहीं, आवश्यकता पड़े तो उसी विघ्न को साधन में बदल देना।

हम अक्सर जीवन में पूर्णता खोजते हैं। सब कुछ ठीक हो। कोई कमी न हो। कोई असफलता न हो। कोई चोट न हो। कोई अधूरापन न हो। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा जीवन संभव है?

गणेश जी का स्वरूप ही इसका उत्तर है।

गजमुख, विशाल उदर, बड़े कान, छोटी आँखें और छोटा-सा मूषक वाहन। पूरा स्वरूप ही असंगत प्रतीत होने वाले तत्वों का अद्भुत सामंजस्य है। और उस पर एक टूटा हुआ दाँत।

फिर भी वे मंगलमूर्ति हैं।

अर्थात पूर्णता का अर्थ निर्दोष होना नहीं है। पूर्णता का अर्थ है ,अपनी अपूर्णताओं को भी सार्थक बना लेना।

इसीलिए ‘एकदंत’ शब्द को केवल एक दाँत वाले गणेश के अर्थ में पढ़ना शायद उनके मिथकीय प्रतीक को छोटा कर देना होगा। एकदंत हमें यह देखने की दृष्टि देते हैं कि जो घट गया है, वह हमेशा हानि नहीं होता। जो टूट गया है, वह हमेशा अनुपयोगी नहीं होता।

कभी-कभी जीवन हमसे कुछ छीनकर ही हमें कुछ नया देता है।

परशुराम वाली कथा में दाँत का टूटना शिव-अस्त्र के प्रति गणेश के सम्मान और आज्ञाकारिता से जुड़ता है। महाभारत की लोकप्रिय कथा में वही दाँत ज्ञान-लेखन के लिए त्याग का प्रतीक बनता है। अन्य पुराणिक परंपराओं में इसके अलग प्रसंग हैं। कथाएँ अलग हैं, किंतु गणेश पुराण की कथा का संदेश विशेष रूप से चौंकाता है, टूटा हुआ दाँत भी विजय का अस्त्र हो सकता है।

आज के जीवन में यह संदेश और अधिक प्रासंगिक लगता है।

हम अपनी कमियों को लेकर असहज रहते हैं। कोई परीक्षा में असफल हुआ तो वह असफलता उसकी पहचान बन जाती है। किसी का व्यवसाय नहीं चला तो वह स्वयं को विफल मान लेता है। कोई संबंध टूट गया तो उसे लगता है कि जीवन भी टूट गया। किसी आलोचना से आहत होकर व्यक्ति अपनी सृजनात्मकता तक रोक देता है।

लेकिन एकदंत गणेश जैसे सामने खड़े होकर कहते हैं, “जो टूटा है, उसे देखो जरूर,पर केवल उसकी कमी मत देखो। यह भी देखो कि उससे क्या बनाया जा सकता है।”

दाँत टूट गया था।

गणेश जी ने उसे इतिहास का घाव नहीं बनने दिया।

उसे अस्त्र बना दिया।

यही रचनात्मकता है।

यही प्रतिरोध है।

यही जीवन की कला है।

मनुष्य की असली शक्ति उसकी निर्दोषता में नहीं, बल्कि अपनी चोटों के साथ आगे बढ़ने की क्षमता में है। जो व्यक्ति असफलता से सीख लेता है, वह असफलता को उपलब्धि में बदल देता है। जो टूटे संबंध से आत्मबोध प्राप्त करता है, वह टूटन को परिपक्वता में बदल देता है। जो आलोचना को आत्मसुधार का अवसर बना लेता है, वह आलोचना को अपनी शक्ति में बदल देता है।

इस दृष्टि से गणेश जी का टूटा हुआ दाँत केवल एक पौराणिक प्रतीक नहीं है। वह जीवन का रूपक है।

देवान्तक ने दाँत तोड़ा था। उसे लगा होगा कि उसने प्रतिद्वंद्वी को कमजोर कर दिया। लेकिन वह यह नहीं जानता था कि गणेश अपने पास बची हुई चीजों से ही नहीं, अपने से छिन गई चीज से भी शक्ति पैदा कर सकते हैं।

शायद मनुष्य और देवत्व के बीच यही अंतर है।मनुष्य सोचता है“मेरे पास क्या बचा?”

गणेश-तत्त्व पूछता है,“जो बचा है, उससे मैं क्या बना सकता हूँ?”

और इससे भी आगे,

“जो टूट गया है, उससे क्या बनाया जा सकता है?”

‘एकदंत’ का यह अर्थ जितना सरल है, उतना ही गहरा।जीवन कभी पूरा नहीं मिलता। उसमें कुछ न कुछ टूटता रहता है। योजनाएँ टूटती हैं। अपेक्षाएँ टूटती हैं। अहंकार टूटता है। कभी-कभी स्वयं का बनाया हुआ व्यक्तित्व भी टूटता है।

लेकिन हर टूटन विनाश नहीं होती। कुछ टूटनें हमें नया आकार देती हैं।कुछ दरारों से प्रकाश भीतर आता है।

और कुछ टूटे हुए हिस्से, यदि हम उन्हें स्वीकार कर सकें, हमारी सबसे बड़ी शक्ति बन जाते हैं।

गणेश पुराण का देवान्तक प्रसंग इसी सत्य को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से सामने रखता है।

इसलिए शायद प्रश्न केवल यह नहीं कि,

गणेश जी का दाँत किसने तोड़ा?

बड़ा प्रश्न यह है

टूटने के बाद गणेश जी ने उस दाँत के साथ क्या किया?

उत्तर हमारे सामने है।

उन्होंने उसे उठा लिया।

अस्त्र बना लिया।

और विजय प्राप्त की।

यही एकदंत गणेश का सबसे सुंदर संदेश है,

जीवन में टूटने से डरना नहीं चाहिए।क्योंकि संभव है, जिसे हम अपनी कमजोरी समझ रहे हों, वही हमारी अगली विजय का साधन बन जाए।

टूटे हुए को ढोना विवशता है।

टूटे हुए को भूल जाना पलायन है।

लेकिन टूटे हुए को सार्थक बना लेना,

यही वास्तविक विजय है।

विवेक रंजन श्रीवास्तव