कांग्रेस मुक्त भारत के लिए दो कदम और

गुजरात और हिमाचल प्रदेश में चुनावी धूल बैठ चुकी है। मैदान में पहाड़ की अपेक्षा धूल और गुबार कुछ अधिक ही उठता है। चुनाव तो दोनों राज्यों में थे; पर शोर गुजरात का अधिक हुआ। इस चक्कर में लोग हिमाचल प्रदेश को भूल ही गये।

असल में कांग्रेस ने चुनाव से पहले ही मान लिया था कि हिमाचल में इस बार हमें हारना है। इसलिए उन्होंने वहां ताकत ही नहीं लगायी। राहुल बाबा भी एक दिन चक्कर लगाकर चले गये। मैडम जी तो घर से निकली ही नहीं। वैसे उनके आने से होना भी क्या था ? वहां लोग वीरभद्र सिंह को पहचानते हैं। वोट भी उनके नाम पर ही पड़ता है। इसीलिए कांग्रेस ने युवा कार्यकर्ताओं के विरोध के बावजूद 83 वर्षीय वीरभद्र सिंह पर ही दांव लगाया। उन्होंने इसे अपनी आखिरी पारी बताकर सहानुभूति बटोरनी चाही; पर जनता ने उनकी बजाय मोदी की अपील पर भरोसा किया। हां, उन्होंने अपने बेटे विक्रमादित्य सिंह को विधायक बनवा दिया। अर्थात अगले चुनाव में कांग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी वही होंगे।

यद्यपि भा.ज.पा. की जीत तो हुई; पर खीर में कंकड़ भी पड़ गया। चूंकि उसके मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी प्रेम कुमार धूमल खुद चुनाव हार गये। कुछ लोगों का कहना है कि इसके लिए उन्हें नेता घोषित करने में देर तथा उनके चुनाव क्षेत्र की बदल जिम्मेदार है। इसका दोष मोदी को दें या अमित शाह और जगत प्रकाश नड्डा को; पर इससे नुकसान तो हुआ ही है। जो भी हो, अब अनुभवी विधायक जयराम ठाकुर वहां मुख्यमंत्री बन गये हैं।

जहां तक गुजरात की बात है, वहां सब यह जानने को उत्सुक थे कि मोदी और शाह अपने घरेलू राज्य में भा.ज.पा. को फिर से जिता सकते हैं या नहीं। दूसरी ओर सब राहुल बाबा की योग्यता भी जांचना चाहते थे। कांग्रेस वाले भी उन्हें इस जीत से पार्टी की अध्यक्षता का उपहार देना चाहते थे; पर पहले ही कौर में हिमाचल के साथ गुजरात की मक्खी भी आ गयी। सिर मुंडाते ही ओले पड़ गये। न मंदिर दर्शन काम आया और न जनेऊ का प्रदर्शन। यद्यपि वोट और सीटें बढ़ने से हार का दुख कुछ कम हो गया। फिर भी हार तो हार ही है। यद्यपि कांग्रेसी इसे ही उनकी जीत बता रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि राहुल बाबा और उनके खानदानी चमचे अब भी कुछ सीखने को तैयार नहीं हैं।

जो लोग वहां कांग्रेस की सीट और वोट बढ़ने को उपलब्धि मान रहे हैं, वे भूलते हैं कि यह वस्तुतः हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर तथा जिग्नेश मेवाणी नामक उन युवा नेताओं की उपलब्धि है, जिनकी बैसाखी के सहारे राहुल बाबा 77 सीटों तक पहुंचे हैं। इनके बिना कांग्रेस 50 से भी नीचे रह जाती। कांग्रेस को अधिकांश सीटें पटेल बहुल सौराष्ट्र और कच्छ क्षेत्र से ही मिली हैं। अर्थात ये सीटें हार्दिक की हैं, कांग्रेस की नहीं। कांग्रेस की ताकत इसी से आंकी जा सकती है कि मुख्यमंत्री पद के दावेदार उसके चारों बड़े नेता (शक्ति सिंह गोहिल, अर्जुन मोधवाडिया, सिद्धार्थ पटेल तथा तुषार चौधरी) चुनाव हार गये।

इसमें तो कोई संदेह नहीं है कि इस बार भा.ज.पा. के लिए यह चुनाव काफी कठिन था। एक ओर मोदी की राज्य में अनुपस्थिति तथा पांच बार की सत्ता के कारण कुछ नाराजगी, तो दूसरी ओर मोदी विरोधियों की शह पर चल रहे जातिवादी आंदोलन। फिर भी मोदी के परिश्रम, लोकप्रियता और अमित शाह के संगठन कौशल ने बाजी मार ली। यह हमारे लोकतंत्र का विद्रूप ही है कि वोट बढ़ने के बाद भी सीटें घट जाती हैं। सवा प्रतिशत वोट बढ़ने के बावजूद भा.ज.पा. को 16 सीटों की हानि हुई तथा ढाई प्रतिशत की वृद्धि से कांग्रेस को इतना ही लाभ।

गुजरात का चुनाव तीखे शाब्दिक बाणों के लिए भी याद किया जाएगा। चाहे सर्वोच्च न्यायालय में बाबर के पैरोकार कपिल सिब्बल द्वारा श्रीराम मंदिर का विवाद टालने का दुराग्रह हो या मणिशंकर अय्यर का मोदी को नीच कहने वाला बयान। इनसे चुनावी प्रचार का स्तर गिरा ही है। उधर मोदी ने भी मणि बाबू के घर पाकिस्तानी अधिकारियों के साथ हुए भोज को खूब उछाला। इस चक्कर में सज्जनता के कलियुगी अवतार मनमोहन सिंह भी फंस गये। अब चुनावी घात-प्रतिघात मान कर इस अध्याय को बंद कर देना ही उचित है।

इस चुनाव के कुछ अन्य पक्ष भी हैं। काफी समय से गुजरात जातीय प्रपंचों से मुक्त था; पर कांग्रेस ने तीन जातीय नेताओं के सहारे फिर यह गंदगी फैलाने का प्रयास किया। कांग्रेस की हार से यह षड्यंत्र विफल तो हुआ है; पर इसका कुछ खराब असर तो रहेगा ही। भा.ज.पा. के साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिन्दू परिषद जैसे संगठनों के लिए भी यह चिंता का विषय है। उन्हें यह गंदगी दूर करने के लिए नये सिरे से प्रयास करने होंगे। दूसरी ओर कांग्रेस और उसके नेताओं को यह बात समझ में आ गयी कि सरकार हिन्दुओं के वोट से ही बनती है। इसलिए इस बार राहुल बाबा ने मजारों की बजाय मंदिरों में माथा टेका। गुजरात का यह संदेश दूर तक जाएगा और सभी दलों में मुल्ला टोपी, रोजा इफ्तार और कब्रों पर चादर चढ़ाने जैसे ढकोसले कम हो जाएंगे।

कई महत्वपूर्ण संदेश भा.ज.पा. के लिए भी हैं। उसकी लाज अमदाबाद, बड़ोदरा और सूरत जैसे बड़े नगरों ने बचायी है। गांवों में किसान और युवाओं की नाराजगी उसके प्रति साफ नजर आयी है। मोदी ने भा.ज.पा. कार्यालय में दिये गये भाषण में इसकी चर्चा की भी है। जिग्नेश मेवाणी को मुसलमान ताकतें इतना सहयोग क्यों कर रही हैं, यह भी समझना होगा। यह दोस्ती हिन्दू समाज और विशेषकर उसके निर्धन (दलित) वर्ग के लिए सदा घातक ही सिद्ध हुई है। भा.ज.पा. ने विजय रूपाणी और नितिन पटेल की जोड़ी पर फिर से भरोसा किया है। पिछला समय इनके लिए सीखने का था; पर इस बार ये दोनों निश्चित ही गुजरात में कुछ करके दिखाएंगे।

कांग्रेस वाले और उनके पिछलग्गू विश्लेषक इन परिणामों की व्याख्या चाहे जैसे करें; पर निःसंदेह भारत कांग्रेसमुक्ति की दिशा में दो कदम और आगे बढ़ गया है। अगले कदम के लिए कर्नाटक भी प्रतीक्षा में है।

– विजय कुमार,

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