फिर सामने आया षड्यंत्री मानसिकता का कुत्सित चेहरा

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                           प्रवीण दुबे

रिजर्व बैंक ने दो हजार का नोट चलन से बाहर क्या किया हमारे देश के कुछ कथित अखबार नवीसों,वामपंथी बुद्धिजीवियों और टुकड़े टुकड़े गैंग के सदस्यों को जैसे प्रधानमंत्री मोदी को गरियाने का  मुद्दा मिल गया। तरस आता है इन मूड़मतों की बुद्धि पर, रिजर्व बैंक के इस निर्णय की तुलना 2016 में की गई नोटबंदी से करके देशवासियों को बरगलाने का काम लगातार जारी है। ऐसा लगता है की देशवासियों को जैसे मूर्ख समझ लिया गया है और सारी बुद्धिमत्ता का धनी खुद को मान लिया गया है।

 पूरा देश अब भली प्रकार से यह समझ चुका है कि देश में एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा है जिसका कि केवल यही काम रह गया है कि कैसे न कैसे केंद्र सरकार द्वारा जनहित और राष्ट्रहित में उठाए कदमों का विरोध किया जाए और उसके प्रति तमाम भ्रमपूर्ण बातें फैलाकर देश के माहौल को गंदा किया जाए। 

दो हजार के नोट को चलन से बाहर करने पर भी कुछ ऐसा ही माहौल पैदा करने का षडयंत्र लगातार जारी है। इस षड्यंत्र में कमोवेश वही लोग नजर आ रहे हैं पिछले 9 वर्षों के दौरान तमाम सरकारी नीतियों पर गला फाड़ते दिखाई दिए हैं।

पूरे देश ने देखा है कि धारा 370 को हटाए जाने का विषय हो,किसान हित में लिए गए निर्णय हो,अयोध्या राममंदिर निर्माण का विषय हो,समान नागरिक कानून लागू करने की बात हो, सीएए हो,तीन तलाक जैसी कुरीति समाप्त करना हो,नई शिक्षा नीति लागू किया जाना,अथवा आर्थिक उन्नयन के लिए उठाए गए तमाम निर्ण्य हों यहां तक कि विदेश व सैन्य क्षेत्र से जुड़े तमाम संवेदनशील विषय सहित अनेक ऐसे मामले हैं जिनका राजनीतिक वैचारिक दुर्भावना के कारण विरोध होता रहा है।

आश्चर्य की बात यह है कि इस विरोध के चलते ढपली बजाओ और टुकड़े टुकड़े गैंग के लोग आजादी के नारे बुलंद करते दिखाई दिए, जे एन यू , जामिया, एयू जैसे शिक्षा के मंदिरों में षड्यंत्रों की फसल तैयार की गई, टूल किट के माध्यम देश में  पूर्व नियोजित आग लगाई गई। विदेशों में बैठकर अपने ही देश की तमाम रीतियों नीतियों का विरोध भी पूरे देश ने देखा है।

जहां तक दो हजार के नोट को चलन से बाहर करने का निर्णय है रिजर्व बैंक ने एक चरणबद्ध प्रक्रिया के अंतर्गत इसे लागू करने का काम बहुत पहले से ही प्रारंभ कर दिया था। रिजर्व बैंक द्वारा नए दो हजार के नोट छापने का काम 2018 से ही बंद कर दिया गया था।आरबीआई एक्ट 1934 की धारा 24 (1) के तहत पहली बार 2000 के नोट नवंबर 2016 में जारी किए गए थे। तब 500 रुपये और 1000 रुपये के नोट बंद किए जाने के बाद अर्थव्यवस्था में मुद्रा ज़रूरतों को पूरा करने के लिए 2000 के नोट जारी किए गए थे।.जब छोटे नोटों की आपूर्ति सुचारू हो गई तो 2018-19 में 2000 के नोटों को छापना बंद कर दिया गया। आरबीआई के अनुसार, 2000 के 89% नोट मार्च 2017 से पहले जारी किए गए थे।आरबीआई अपनी क्लीन नोट पॉलिसी के तहत नोटों को बंद करती है या नए नोट जारी करती है।साल 2021 में तत्कालीन वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर ने बताया था कि आरबीआई ने साल 2019 और 2020 में दो हज़ार रुपए के नए नोट छापे ही नहीं हैं।वहीं अनुराग ठाकुर ने साल 2020 में कहा था, “मार्च 2019 में 329.10 करोड़ रुपए क़ीमत के दो हज़ार रुपए के नोट बाज़ार में चल रहे थे. वहीं मार्च 2020 में इनकी क़ीमत कम होकर 273.98 करोड़ रुपए रह गई”।

शुक्रवार को जो निर्णय लिया गया है उससे देश की ईमानदार जनता बेहद खुश नजर आती है परेशान वे लोग हैं जिन्होंने दो हजार के नोटों को अपनी काली कमाई के संरक्षण का साधन बना लिया था, ऐसे लोगों की तिजोरियां ऊपर से नीचे तक गुलाबी हो रहीं थीं, परेशान वे लोग हैं जो देश तोड़ने के लिए ऐसे गुलाबी नोटों के माध्यम से टेरर फंडिंग का काम कर रहे थे। हाल ही में देश के तमाम राज्यों में एनआईए की छापामारी में इसके सबूत सामने आए हैं।

 आरबीआई पूर्व डिप्टी गवर्नर आर गांधी ने कहा कि 2,000 रुपये के बैंक नोट वापस लेने से काले धन पर रोक लगाने में काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकेगा क्योंकि लोग यह नोट जमा कर रहे हैं। गांधी ही वर्ष 2016 में 500 और 1,000 रुपये के नोट चलन से हटाये जाने के समय आरबीआई में मुद्रा विभाग के प्रमुख थे। उन्होंने कहा कि भुगतान पर किसी भी सिस्टमेटिक प्रभाव की संभावना नहीं है क्योंकि इन नोटों का उपयोग डेली ट्रांजैक्शंस में नहीं किया जाता है. ज्यादातर भुगतान डिजिटल माध्यम से होते हैं।

पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने RBI के इस फैसले को लेकर कहा कि यह ‘बहुत बड़ी घटना’ नहीं है और इससे इकोनॉमी या मौद्रिक नीति (Monetary policy) पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। क्योंकि 2,000 रुपये के नोट को 2016 में सुभाष चंद्र गर्ग डेमोनेटिज़ेशन के समय देश में करेंसी की अस्थायी कमी को दूर करने के लिए लगाया गया था। गर्ग ने कहा कि पिछले पांच-छह वर्षों में डिजिटल पेमेंट में भारी बढ़ोत्तरी के बाद, 2,000 रुपये के नोट (जो वास्तव में अन्य मूल्यवर्ग के नोटों के स्थान पर लाया गया था) वापस लेने से कुल करेंसी फ्लो प्रभावित नहीं होगा और इसलिए मोनेटरी पॉलिसी पर भी कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। उन्होंने पीटीआई से बात करते हुए कहा, “इससे भारत के इकोनॉमिक और फाइनेंसियल सिस्टम के परिचालन पर भी कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा और जीडीपी ग्रोथ या पब्लिक वेलफेयर पर कोई भी प्रभाव नहीं पड़ेगा.

नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पनगड़िया ने कहा है कि 2000 का नोट वापस मंगाने के भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के फैसले से इकोनॉमी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा क्योंकि ऐसे वापस हुए नोटों के स्थान पर उसी कीमत में कम मूल्यवर्ग (denomination ) के नोट जारी कर दिए जाएंगे।पनगड़िया ने कहा कि RBI के इस कदम से जरुर अवैध धन की आवाजाही को  मुश्किल हो सकता है। पनगड़िया पीटीआई से बात करते हुए कहा, “हम इसका इकोनॉमी पर कोई बुरा प्रभाव पड़ता नहीं देख रहे है. क्योंकि 2,000 के नोट को उसी राशि के बराबर कीमत के नोटों से बदल दिया जाएगा. इसलिए इसका मनी फ्लो पर कोई  प्रभाव नहीं पड़ेगा.।

 इस बार 2000 रुपए की नोटबंदी का फैसला 2016 की नोटबंदी से अलग है क्‍योंकि 2000 का नोट बतौर लीगल टेंडर मनी जारी रहेगा. यानी अगर किसी के पास दो हजार रुपए का नोट है तो उसकी मान्यता बनी रहेगा. ऐसे में कोई भी आपके इस नोट को लेने से मना नहीं करेगा. हालांकि इन नोटों को 30 सितंबर तक बैंक में जाकर बदलना होगा.।

आजादी से पहले भी हो चुकी है नोटबंदी

देश में नोटबंदी का इतिहास आजादी से पहले का है. ये बात 1946 की है. उस समय देश में पहली बाद अंग्रेजी हुकूमत ने पहली बार नोटबंदी का फैसला लिया था। भारत के वायसराय और गर्वनर जनरल सर आर्चीबाल्ड वेवेल ने 12 जनवरी 1946 में हाई करेंसी वाले बैंक नोट बंद करने को लेकर अध्यादेश प्रस्तावित किया था. इसके 13 दिन बाद यानी 26 जनवरी रात 12 बजे के बाद से ब्रिटिश काल में जारी 500, 1000 और 10000 रुपए के नोट चलन से बाहर हो गए थे।

1978 में हुई थी नोटबंदी 

इसके बाद नोटबंदी का फैसला 16 जनवरी 1978 को लिया गया था। उस समय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार ने काले धन को खत्म करने के लिए 1,000 रुपए, 5,000 रुपए और 10,000 रुपए के नोट को चलन से बाहर किया था। नोटबंदी के इस फैसले से लोगों को काफी परेशानी झेलनी पड़ी थी. सरकार ने इस नोटबंदी की घोषणा के अगले दिन यानी 17 जनवरी को लेनदेन के लिए सभी बैंकों और उनकी ब्रांचों के अलावा सरकारों के अपने ट्रेजरी डिपार्टमेंट को बंद रखने को कहा गया था।

2016 की नोटबंदी

1978 के बाद 2016 में पीएम मोदी की सरकार ने नोटबंदी का फैसला लिया और इस फैसले ने देशभर में अफरा-तफरी मचा दी। 8 नवंबर 2016 की  रात 12 बजे से 500 और 1000 के नोट चलन से बाहर हो गए थे। लोगों को पुराने नोट जमा करने और नए नोट हासिल करने के लिए बैंकों में लंबी लाइनों में लगना पड़ा। हालांकि इस बार 2000 रुपए की नोटबंदी में लोगों को उस तरह से परेशानी नहीं झेलनी होगी क्‍योंकि बैंक ने इसे बदलने के लिए लोगों को अच्‍छा-खासा समय दिया है।जो लोग इस निर्णय को लेकर देशवासियों को भड़काकर अपना राजनीतिक उल्लू सीधा करने का प्रयास कर रहे हैं उन्हें समझना चाहिए कि देश ने न केवल आर्थिक सामरिक रूप से उन्नति की है बल्कि देशवासियों का बौद्धिक स्तर भी बहुत बेहतर हो चुका है। अब वह किसी भी विषय के नकारात्मक पक्ष के साथ सकारात्मक प्रभाव को भी समझ रहे हैं। यही वजह है कि अब ढपली बजाओ टुकड़े टुकड़े गैंग हो या फिर वामी,कांगी, लिब्राडू अथवा पदक लोटाऊ षड्यंत्री मानसिकता के कथित बुद्धिजीवी देश का वातावरण प्रदूषित करने में कामयाब नहीं होंगे।

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