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संयुक्त राष्ट्र की साख पर सवाल, सुधार से ही बचेगी प्रतिष्ठा

संयुक्त राष्ट्र दिवस (24 अक्टूबर 2026) पर विशेषः
-ः ललित गर्ग:-

संयुक्त राष्ट्र दिवस केवल एक अंतरराष्ट्रीय संगठन की स्थापना का उत्सव नहीं, बल्कि विश्व शांति, मानवाधिकारों, न्याय, समानता और राष्ट्रों के बीच सहयोग के उन संकल्पों को याद करने का अवसर है, जिनके आधार पर द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका के बाद इस संगठन की स्थापना हुई थी। 24 अक्टूबर, 1945 को संयुक्त राष्ट्र चार्टर लागू होने के साथ दुनिया ने एक ऐसी व्यवस्था की उम्मीद की थी, जिसमें युद्ध की जगह संवाद, टकराव की जगह सहयोग और शक्ति के स्थान पर न्याय को प्राथमिकता मिलेगी। किंतु आज, जब दुनिया अनेक युद्धों, आतंकवाद, भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और मानवीय संकटों से जूझ रही है, तब संयुक्त राष्ट्र की भूमिका, निष्पक्षता और प्रभावशीलता पर गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं। जिस संगठन से विश्व समुदाय को न्याय की अपेक्षा थी, उसकी कार्यप्रणाली ही संदेह के घेरे में आने लगे तो आत्ममंथन अनिवार्य हो जाता है। संयुक्त राष्ट्र की उपलब्धियों को नकारना उचित नहीं होगा। उसने अंतरराष्ट्रीय संवाद के लिए एक साझा मंच उपलब्ध कराया, मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा के माध्यम से मानवीय गरिमा के वैश्विक मानक स्थापित किए और अनेक देशों में शांतिरक्षा अभियानों के जरिए स्थिरता बहाल करने का प्रयास किया। विश्व स्वास्थ्य, बाल कल्याण, शिक्षा, शरणार्थियों की सहायता तथा सतत विकास के क्षेत्रों में उसकी विभिन्न संस्थाओं ने उल्लेखनीय योगदान दिया है। इसके बावजूद मूल प्रश्न यह है कि क्या संयुक्त राष्ट्र अपने सबसे महत्वपूर्ण दायित्व-युद्ध रोकने, आतंकवाद पर प्रभावी अंकुश लगाने और सभी राष्ट्रों के साथ समान व्यवहार करने में अपेक्षित सफलता प्राप्त कर पाया है? आज का अनुभव इस प्रश्न का संतोषजनक उत्तर नहीं देता।
संयुक्त राष्ट्र की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी सुरक्षा परिषद की संरचना में दिखाई देती है। अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन को प्राप्त वीटो अधिकार कई बार वैश्विक शांति से अधिक उनके राष्ट्रीय हितों की रक्षा का माध्यम बन जाता है। जब किसी युद्ध या मानवीय त्रासदी पर प्रभावी निर्णय भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के कारण रुक जाता है, तब संयुक्त राष्ट्र की घोषणाएं और अपीलें अपनी नैतिक शक्ति खोने लगती हैं। गाजा, यूक्रेन और सीरिया जैसे संघर्षों ने यह प्रश्न तीखा किया है कि क्या विश्व शांति का दायित्व निभाने वाला संगठन वास्तव में निर्णायक भूमिका निभाने में सक्षम है? विडंबना यह है कि दुनिया बदल गई, लेकिन संयुक्त राष्ट्र की निर्णय व्यवस्था काफी हद तक उसी पुराने शक्ति-संतुलन में बंधी हुई है। संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता पर उठते प्रश्नों का ताजा उदाहरण दाऊद इब्राहिम और उसके गिरोह डी-कंपनी से जुड़ा विवाद है। आतंकवाद और मानवाधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिवेदक बेन साल की रिपोर्ट में डी-कंपनी को ‘भारत आधारित’ आपराधिक गिरोह बताया गया। भारत ने 21 अक्टूबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति में इस विवरण पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे तथ्यात्मक रूप से गलत और संगठन की साख को नुकसान पहुंचाने वाला बताया। भारतीय प्रतिनिधि रघु पुरी ने दाऊद के आतंकवादी गतिविधियों से जुड़े इतिहास और संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबंध सूची में दर्ज तथ्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि दाऊद भारत में वांछित अपराधी है और भारत के अनुसार पाकिस्तान में रह रहा है।
यह प्रकरण इसलिए गंभीर है कि आतंकवाद जैसे संवेदनशील विषय पर तथ्यात्मक शुद्धता और निष्पक्षता सर्वोपरि होनी चाहिए। किसी आतंकवादी गिरोह की भौगोलिक पहचान को लेकर गलत या अधूरी जानकारी सामने आना केवल एक रिपोर्ट की त्रुटि नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी प्रयासों की विश्वसनीयता का प्रश्न है। हालांकि किसी एक रिपोर्ट की गलती से पूरे संगठन के प्रत्येक कार्य को खारिज नहीं किया जा सकता, लेकिन ऐसी त्रुटियों की जांच, सुधार और जवाबदेही सुनिश्चित करना आवश्यक है। विशेष प्रतिवेदकों की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, किंतु स्वतंत्रता का अर्थ तथ्यों और उत्तरदायित्व से मुक्त होना नहीं है। इसी प्रकार मानवाधिकारों के मामले में भी संयुक्त राष्ट्र को संतुलित दृष्टिकोण अपनाना होगा। मानवाधिकार किसी राष्ट्र की सीमाओं में कैद विषय नहीं हैं, लेकिन उनकी रक्षा के नाम पर किसी देश के विरुद्ध निष्कर्ष निकालने से पहले प्रमाणों, परिस्थितियों और आतंकवाद से प्रभावित नागरिकों के अधिकारों को समान गंभीरता से देखना चाहिए। आतंकवाद के पीड़ितों के मानवाधिकार भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं, जितने आतंकवाद से निपटने के दौरान किसी निर्दोष व्यक्ति के अधिकार। यदि आतंकवाद के प्रायोजकों, हिंसा के जिम्मेदार लोगों और पीड़ितों के प्रति दृष्टिकोण में असमानता दिखाई देती है, तो निष्पक्षता पर संदेह स्वाभाविक है।
संयुक्त राष्ट्र के सामने एक दूसरी बड़ी चुनौती प्रतिनिधित्व की असमानता है। भारत, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्रों की बढ़ती वैश्विक भूमिका के बावजूद सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता और वीटो व्यवस्था में व्यापक सुधार नहीं हो पाया है। दुनिया की वर्तमान राजनीतिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करने वाली व्यवस्था के बिना संयुक्त राष्ट्र को अधिक लोकतांत्रिक और प्रतिनिधिक बनाना कठिन है। आतंकवाद के विरुद्ध साझा रणनीति, युद्धविराम की प्रभावी व्यवस्था, मानवीय सहायता की निर्बाध उपलब्धता और अंतरराष्ट्रीय कानून के समान अनुपालन को भी प्राथमिकता देनी होगी। संयुक्त राष्ट्र दिवस पर आत्ममंथन का वास्तविक अर्थ केवल उसकी उपलब्धियों का गुणगान करना नहीं, बल्कि उसकी कमियों को स्वीकार कर सुधार का संकल्प लेना है। संगठन को अपने निर्णयों में पारदर्शिता, रिपोर्टों में तथ्यात्मक शुद्धता, अधिकारियों की जवाबदेही और सभी देशों के प्रति निष्पक्षता सुनिश्चित करनी होगी। वीटो अधिकार के दुरुपयोग पर अंकुश लगाने, सुरक्षा परिषद के विस्तार और आतंकवाद के विरुद्ध दोहरे मानदंड समाप्त करने की दिशा में ठोस पहल करनी होगी।
आज जब दुनिया युद्ध, आतंकवाद, हिंसा, मानवीय संकट और राष्ट्रों के बीच बढ़ते अविश्वास के दौर से गुजर रही है, तब संयुक्त राष्ट्र दिवस की प्रासंगिकता और जिम्मेदारी पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। यह दिवस केवल एक अंतरराष्ट्रीय संगठन की स्थापना का स्मरण नहीं, बल्कि विश्व शांति, सह-अस्तित्व, मानवीय गरिमा और वैश्विक सहयोग के संकल्प को दोहराने का अवसर है। संयुक्त राष्ट्र को अपनी निष्पक्षता, विश्वसनीयता और प्रभावशीलता के माध्यम से यह सिद्ध करना होगा कि वह शक्तिशाली राष्ट्रों के हितों का नहीं, बल्कि समूची मानवता के न्याय और सुरक्षा का प्रहरी है। उसका वास्तविक दायित्व युद्ध रोकना, आतंकवाद पर अंकुश लगाना और शांति का मार्ग प्रशस्त करना है। संयुक्त राष्ट्र का उद्देश्य दुनिया पर शासन करना नहीं, बल्कि दुनिया को युद्ध, अन्याय और विनाश से बचाने में सहयोग देना है। उसकी प्रतिष्ठा केवल उसके घोषणापत्रों से नहीं, बल्कि संकट की घड़ी में किए गए निष्पक्ष और प्रभावी कार्यों से तय होगी। 24 अक्टूबर का संदेश तभी सार्थक होगा, जब यह संगठन अपनी मूल भावना की ओर लौटे और शक्तिशाली तथा कमजोर, छोटे तथा बड़े, सभी राष्ट्रों के लिए समान न्याय का भरोसेमंद मंच बने। संयुक्त राष्ट्र को केवल अस्तित्व नहीं, अपनी प्रासंगिकता भी बचानी है और इसके लिए पक्षपात से मुक्ति, जवाबदेही तथा आमूलचूल सुधार अब विकल्प नहीं, अनिवार्यता हैं।