डॉ. नीरज भारद्वाज
21वीं सदी विश्व के एकीकरण की बात कर रही है। यह विश्व का एकीकरण मानवता से दूर केवल व्यापार और राजनीतिक हानि-लाभ पर टिका ज्यादा लगता है। व्यापार में शुद्ध व्यापार होता है और वहां कोई किसी का सगा नहीं। विचार करें तो आज व्यापार की दृष्टि से ही लोगों का व्यवहार भी बना हुआ है। जहां लाभ है, वहां प्रेम ज्यादा दिखाई देता है और जहां हानि है, उससे दूरी बना ली जाती है। रिश्तों में भी कुछ अब ऐसा ही दिखाई देने लगा है। परिवार से लेकर देश-विदेश तक यह सभी रिश्तों में यह बातें हमारे सामने उभर कर आ रही हैं।
विचार करें तो प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध उपनिवेशों पर विजय प्राप्त करने, उन्हें आपस में बांटकर, उन पर अपना शासन करने को लेकर हुआ। शासन करने वाले देश अपने लाभ के लिए संधियाँ करते रहें। कच्चा माल वे देश देंगे जिन पर शासन हुआ है अर्थात गुलाम देश, उस वस्तु पर लाभ अर्थात मलाई वे देश खायेंगे जो शासन कर रहे हैं। गुलाम देश की जनता को अपने हाल पर मरने के लिए छोड़ दिया जाता था। व्यापार की दृष्टि से आई कंपनियों ने व्यापार के साथ-साथ फिर राजनीतिक हस्तक्षेप कर सारी हदें ही पार कर दी। लोगों को कभी भी किसी भी जुर्म में अंदर कर देना, उन्हें मार देना, उन्हें फांसी पर लटका देना, वहां कभी भी किसी भी समय गोली चला देना, लाठीचार्ज कर देना, आम बात लगती थी। यह सभी बातें अंग्रेजों की शासन व्यवस्था में रही।
दूसरी ओर दृष्टि डालें तो मुस्लिम राज व्यवस्था भी ऐसी ही थी। उन्होंने लूटमार कर मंदिरों को तोड़ा, वहां से सोना-चांदी लूटा, औरतों की इज्जत को तार-तार किया, बंदी बनाकर लोगों को जेल में डाल दिया, यह सब सामान्य बात थी। एक दूसरे के रक्त के प्यासे मुस्लिम साम्राज्य में रिश्तों का कत्ल करके सत्ता का रास्ता हाथ लगा। इन दोनों ही प्रकार की राजसत्ताओं ने भारत पर राज किया। हमें आर्थिक रूप से कमजोर किया, हमारी संस्कृति, समाज और व्यवस्था को पूर्ण रूप से भंग करने का यहां भरसक प्रयास किया गया। इन दोनों ही प्रकार के शासनकारों ने भारतवर्ष में अपनी-अपनी दृष्टि से अपना-अपना लाभ कमाया।
इन दोनों ही प्रकार के शासनकारों ने देश में अपने-अपने धर्म का प्रचार प्रसार करने का प्रयास किया। तलवार और बंदूक के बल पर लोगों को अपने धर्म का अनुनायी बना लिया। लोगों का तेज गति से धर्म परिवर्तन किया गया। मुस्लिम शासन के समय हिंदुओं पर जजिया नाम का कर भी लगा दिया गया था। आर्थिक रूप से कमजोर लोगों ने तो मुस्लिम धर्म को सरलता से ही स्वीकार कर लिया क्योंकि जब खाने को ही नहीं है तो वह कर के रूप में पैसा कैसे देते। अंग्रेजों ने भी कुछ ऐसे ही किया और जगह-जगह अपने धर्म के प्रचार में जुट गए। धर्म के नाम पर लड़ाई-झगडें, धर्म परिवर्तन करवाना आदि सभी इन शासन कालों में रहे, जो आज तक विश्व में जिंदा है।
अब चलते हैं वर्तमान भारतवर्ष के पड़ोसी देशों की ओर जहां कहने को तो प्रजातंत्र है लेकिन वहां धर्म के नाम पर कितना कुछ हो रहा है, इसे भी देख लेना चाहिए। धर्म के नाम पर बांग्लादेश में जो मार-धाड़, हत्या हो रही हैं, यह राजनीतिक हानि-लाभ को लेकर हो रही हैं। सत्ता में आने का रास्ता बनाया जा रहा है। बांग्लादेश में हिंदुओं को चुन-चुन कर मारना, उनके घरों में आग लगा देना, उनकी बहू-बेटियों की इज्जत तार-तार कर देना, कहां की शासन व्यवस्था है? यह कौन सा लोकतांत्रिक देश है? ऐसा तो कभी आदिम युग की सभ्यता में भी नहीं हुआ जो अब बांग्लादेश में हो रहा है। धर्म के नाम पर केवल हिंदुओं को ही निशाना बनाया जा रहा है। कट्टरपंथी लोग इन हत्याओं और दंगों में अपना लाभ खोज रहे हैं। लोगों के झुंड के झुंड अल्पसंख्यक हिंदुओं को मार रहे हैं। वहां की सत्ता मौन धारण किए हुए है. वैश्विक मंच पर भी कोई आवाज नहीं उठा रहा है. इतना ही नहीं भारत में सत्ता से दूर विपक्षी दल भी मौन धारण किए हुए हैं।
बिना वजह, बिना कारण बांग्लादेश में हिंदुओं को निशाना बनाना, कहां की शासन व्यवस्था का काम है। वहां रह रहे कुछ गिने-चुने हिंदू सड़कों पर विरोध के लिए आते हैं तो अगले दिन उन्हें भी निशाना बना लिया जाता है। बांग्लादेश में चुनाव को ध्यान में रखकर यह सभी कुछ अकारण हो रहा है। राजनीतिक उठा-पटक के चलते यह घटनाएं किसी को भी सोचने पर आतुर कर रही हैं । अकारण ही बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे हमले, किसी भी सूरत में ठीक नहीं हैं । इस पर देश-दुनिया और मानवता पर चिंतन करने वाले सभी को सोचने की जरूरत है।
डॉ. नीरज भारद्वाज