लेखक परिचय

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

‘नेटजाल.कॉम‘ के संपादकीय निदेशक, लगभग दर्जनभर प्रमुख अखबारों के लिए नियमित स्तंभ-लेखन तथा भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष।

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक

संघ लोग सेवा आयोग ही सरकार की भर्ती-परीक्षाओं का सबसे बड़ा केंद्र है। इसका नाम है- लोक सेवा आयोग लेकिन इसकी मुख्य परीक्षाएं किसी भी लोक भाषा में नहीं होती हैं। वे एक विदेशी भाषा में होती है, जिसका नाम अंग्रेजी है। सरकार से कोई पूछे कि अफसर बनने के बाद ये लोग किसकी सेवा करेंगे? भारतीयों की या अंग्रेजों की? यह लोक सेवा आयोग है या परलोक सेवा आयोग है? अपने लोगों पर पराई भाषा थोपने का यह आयोग सबसे बड़ा कारखाना है। यदि सरकार की भर्ती परीक्षाओं में अंग्रेजी अनिवार्य न हो तो क्या हमारे सारे पब्लिक स्कूल दीवालिए नहीं हो जाएंगे? अपने बच्चों को उंची नौकरियां दिलाने के लालच के कारण ही अंग्रेजी माध्यम के स्कूल धड़ाधड़ खुलते जा रहे हैं। लोग अपना पेट काटकर हजारों रु. महिना फीसें आखिर क्यों भरते हैं? लोक सेवा आयोग की भाषा-नीति किसी भी स्वाधीन राष्ट्र के लिए बेहद शर्म की बात है। यह ऐसी नीति है, जो देश के करोड़ों ग्रामीणों, गरीबों और पिछड़ों के बच्चों के लिए सरकारी नौकरियों के द्वार बंद कर देती है।

इस नीति के विरुद्ध कुछ प्रबुद्ध सांसदों ने कल राज्यसभा में आवाज उठाई है। उनमें से कुछ सांसद मेरे पुराने साथी हैं। उन्हें मैं बधाई देता हूं। अब से लगभग 25 साल पहले मैंने इस भाषा नीति के विरुद्ध एक जोरदार आंदोलन चलाया था। पुष्पेंद्र चौहान के नेतृत्व में कई नौजवानों ने इस आयोग के दरवाजे पर दस साल तक लगातार धरना भी दिया था। एक दिन मेरे निवेदन पर अटलजी, विश्वनाथप्रताप सिंह, ज्ञानी जैलसिंह, नीतिशकुमार, शरद यादव आदि कई नेताओं ने भी वहां धरना दे दिया था। प्रधानमंत्री नरसिंहरावजी ने खुद फोन करके मुझे कहा था कि यह तो जरुरी काम है। यह देशहितकारी है। इसके लिए इतने बड़े-बड़े नेताओं को धरना दिलवाने आप क्यों ले आए? लेकिन फिर भी कुछ नहीं हुआ। कुछ दिन बाद अटलजी खुद प्रधानमंत्री बन गए। उनके घर पर हमने सभा की। वे खुद बोले। कुछ नहीं हुआ। श्रोताओं की अगली पंक्ति में कई मंत्री भी बैठे थे। वे अब भी मंत्री हैं। मनमोहनसिंहजी हमारे अच्छे मित्र हैं लेकिन इस बारे में उनसे क्या बात करते? वे तो स्वयं इस सड़ी-गली व्यवस्था की उपज हैं। हमें आशा थी, नरेंद्र मोदी से लेकिन ढाई साल निकल गए। इस मुद्दे पर सरकार चुप्पी मारे बैठी है। अपने आप को राष्ट्रवादी कहनेवाले लोग और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का ढिंढौरा पीटनेवाले लोग यदि इस मुद्दे पर थोड़ी-सी ढोलक भी पीट दें तो शायद सरकार की नींद खुल जाए।

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