१-असहाय मनु
तन्नु सत्यं पवमानस्यास्तु यत्र विश्वे कारवः संनसन्त।
ज्योतिर्यद आकृणादु लोकं प्रावन्मनुं दस्यवे कर भीकम।।
ऋग्वेदः9.92.5
अर्थात, मान्यता है कि पवमान सोम देवता ने दस्युओं यानी अनार्यों से मनु की रक्षा की। दासों और दस्युओं के साथ हुए संघर्ष में सफलता प्राप्त करने पर ही मनु की महिमा लोकव्यापी हुई। वह सोम ही था, जिसके सेवन के प्रभाव से मनु शत्रु अनार्यों के लिए विनाशक सिद्ध हुए थे। महाप्रलय में इकलौते बचे मनु ने जब उड़ान भरते पक्षी के पंखों के फड़फड़ाने की ध्वनि सुनी, तब उन्होंने जीवन की नूतन आशा में सरस्वती नदी में आई प्रलय की लहरों में स्वयं को समाप्त करने की आत्मघाती इच्छा त्याग दी। मनु क्यों मरे ? वीरपत्नी नदी के किनारे कुयव और अयु जैसे अनार्यों को उनके ही दुर्गों में मार डालने वाला मनु क्यों मरे ? वह मनु क्यों मरे, जिसने सदाशृण ऋषि के आग्रह पर अनार्य शत्रु विशिशिप्र को पराजित कर दिया था। वह मनु क्यों मरे, जिसने सरस्वती नदी के किनारों पर खड़ी कुयव, अनु और अयु के सैनिकों को पलक झपकते ही मौत के घाट उतार दिया था। कुटुंब के परिजनों के साथ शरणागत हुए मत्स्यराज अंडक से मित्रता कर ली थी। इसी समय अग्नि को साक्षी मानकर मछली के मुख से निकलते मनुष्य की लकड़ी की मूर्ति के समक्ष दोस्ती की शपथ ली थी। तब पूछने पर अंडक ने ही बताया था कि हमारी ज्ञान-परंपरा में ब्रह्म ने पहले मछली बनाई और फिर मछली की योनि से मनुष्य जन्मे! इस मित्रता के निर्विकार भाव से प्रभावित होकर मत्स्यराज अंडक ने यकायक वचन दिया था कि प्रजापति मनु जब भी तुम्हें आवश्यकता पड़ेगी,तब मैं सहायता के लिए प्राण हथेली पर लिए तैयार रहूंगा। तदुपरांत वास्तव में जब दृशद्वती-सरस्वती नदी जलग्रहण क्षेत्र में एक बड़ा हिमखंड टूटकर अचानक गिर गया तो दोनों नदियों का जल ओघ (बाढ़) में बदलता चला गया। इसी बीच अपने वचन के पालन में एक बड़ी नौका लिए अंडक उनके सामने था। अंडक समेत जो सप्त-ऋषि नाव में सवार होकर मनु के साथ चले थे, वे सब तो प्रलय के काल में छिटकते चले गए,बचे रह गए केवल मनु! मनु ने इस घटनाक्रम का स्मरण करने के बाद बिना कोई प्रश्न के हुंकार भरी, ‘जब ब्रह्म ने पक्षी के जीने का प्रबंध दे रखा है तो मनु की भूख का प्रबंध भी उपलब्ध होगा ही?’
जीवन की इस प्रेरणा ने मनु में जीवन के प्रति मोह जगा दिया। वह मोह और महत्वाकांक्षा ही है, जो जीवन में जीने की जिजीविषा बनाए रखती है। जीवन को भ्रम और माया नहीं मानने देती। सांसारिक वस्तुओं में मानवीय रिश्तों के प्रति सतत आकर्षण बनाए रखती है। अतएव लोग भले ही कहें कि जगत भ्रम है, वह नहीं मानते। वह जिएंगे! जब वे इस प्रलय में बचे हैं तो अवश्य अन्यान्य स्थलों पर भी लोग बचे होंगे ? ब्रह्म की यह प्रलयलीला सभी देव और असुरों को नहीं लील सकती ? संभव है, उनके अपने भ्राता भ्राताओं की पत्नियां, उनके पुत्र-पुत्रियां शेष हों? सब याद आ रहे हैं। सप्त सिंधु क्षेत्र में रहने वाले वे भरत भी याद आ रहे हैं, जिनके शासक दिवोदास और उनके पुत्र सुदास थे। इंद्र के नेतृत्व में उन्होंने अनार्य असुरों के नेता शंबर से बड़ा युद्ध घर में घुसकर लड़ा और शंबर को परास्त किया। शंबर के साथ पश्चिमी क्षेत्र के दस राजाओं ने मिलकर युद्ध लड़ा था। किंतु दिवोदास को देवों की मिली सहायता से वे सब खेत रहे। उन देवों में यह मनु भी सम्मिलत रहा था।
अनार्यों का नेतृत्व विश्वामित्र ने किया था। संभव है, विश्वामित्र भी बचा हो ? भरतों में भी संभव है कि कुछ का अस्तित्व बचा हो ? यहीं वे स्थल थे, जहां से इंद्र और उनके सहयोगियों ने वैदिक असुरों को पश्चिमी क्षेत्र (एशिया) गांधार (अफगानिस्तान) आर्याना (ईरान) सुमेरू (ईराक) कपादेश (टर्की) और और्व (अरब) की ओर भाग खड़े हुए थे। इनके साथ कुछ इनके आर्य समर्थक भी चले गए थे। यह युद्ध इतना भीषण था कि पश्चिम से किसी ने आर्यावर्त में घुसने का साहस नहीं दिखाया। मनु सोच रहे हैं, ये सब के सब प्रलय की भंवर में नहीं समा सकते ? कुछ न कुछ तो बचे होंगे ? उनकी तरह पृथ्वी के इस गोलाकार भूगोल में वे एक न एक दिन अवश्य टकराएंगे!
जीवन क्षणिक भले ही है, परंतु उल्लास और आनंद के साथ जीने के लिए है। अतएव तत्काल के इस एकाकी जीवन को व्यतीत करने के लिए चिंता के ऐसे मनोविकारों से मुक्त होना आवश्यक है, जो इंद्रियों में निराशा का संचार करके शरीर को अवसाद के विचारों से भरते हैं। अतःचिंता की इस व्यथा से उबरने की जरूरत है। अपने परिजनों और शुभचितकों का स्मरण करते हुए मनु उस स्थल का इतनी गहराई से अवलोकन करने लगे कि उसके भूगोल का मानचित्र एवं परिवेश स्मृति में उत्कीर्ण हो जाए। मनु की जहां नाव ठहरी थी, वह हिमालय का उच्च शिखर है। यहाँ कुष्ठ रोग निवारण की औषधि की खूब पैदावार होती है। यह औषधि अनेक रोगों का उपचार करती है। मनु भी इसकी पत्तियों को चबाकर स्वस्थ हैं। उत्तरगिरि हिमालय पर्वत की यह सोम समान वनस्पति न केवल ज्वर को दूर करती है, अपितु काया को पीड़ा पहुंचाने वाले रोगों को भी दूर करती है। मनु संपूर्ण विनीत भाव से जीवन को संरक्षण देने वाले स्थल मनोरवसर्पण को नमन करते हुए कहते हैं, ‘‘आपदा के मारे, मुझ असहाय को शरण देने वाले आश्रयस्थल तुझको प्रणाम !‘‘
यत्र नावप्रभरणष्णं यत्र हिमवतः शिरः। तत्रामृतस्य चक्षणं
ततः कुष्ठो अजायर्त।
स कुष्ठो विश्वभेषजः साकं सोमेन तिष्ठति। तक्मानं सर्व
नाशय सर्वाश्च यातुधान्यः।।
अथर्ववेदः19.39.8
तदप्येतदुत्तरस्य गिरेर्मनोरवसर्पण मिति।
शतपथ ब्राह्मण : 8.1
अर्थात, मनु जिस स्थान पर उतरे उसे मनोरवसर्पण स्थान के नाम से जानते हैं।