“वैदिक धर्म और स्त्री-पुरुष के अधिकार”

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मनमोहन कुमार आर्य-

पं0 लोकनाथ तर्कवाचस्पति जी के नाम से सभी स्वाध्यायशील आर्यबन्धु परिचित हैं। आपने यज्ञ-प्रार्थना ‘यज्ञरूप
प्रभु हमारे भाव उज्जवल कीजिये छोड़ देवे छल कपट को मानसिक बल दीजिये’ लिखी है
जो देश व विदेश की सभी आर्यसमाजों एवं आर्य परिवारों में यज्ञ के पश्चात प्रतिदिन गाई
जाती है। पंडित जी ने शहीद भगत सिंह जी की बाल्यावस्था में यज्ञोपवीत संस्कार कराया
था। यह बता दें कि शहीद भगतसिंह जी के दादा श्री अर्जुन सिंह जी ऋषि दयानन्द और
आर्यसमाज के अनुयायी थे। वह दैनिक यज्ञ किया करते थे। हमने सुना है कि वह रेल यात्रा
में भी यज्ञकुण्ड, समिधायें, घृत तथा सामग्री साथ में रखते थे। श्री अर्जुन सिंह जी ने
आर्यसमाज की मान्यताओं पर गुरुमुखी लिपि में एक पुस्तक लिखी थी। आश्चर्य है कि
इसका अभी तक हिन्दी अनुवाद प्रकाशित नहीं हो पाया है। जिस व्यक्ति के पास श्री अर्जुन
सिंह जी की लिखी हुई पुस्तक उपलब्ध है उसका पता आर्य प्रकाशक श्री प्रभाकरदेव आर्य
जी, हिण्डोनसिटी को है। हमने एक बार उनसे इसके अनुवाद व प्रकाशन के लिये सम्पर्क
किया था परन्तु वह बात आगे नहीं बढ़ी। शहीद भगतसिंह जी का पूरा परिवार आर्यसमाजी था। हमें लगता है कि पंजाब में
राजनैतिक कारणों से आर्यसमाज के प्रचार व प्रसार में बाधायें उपस्थित हुई हैं। इसका कारण हम यह समझते हैं कि आजकल
के शिक्षित लोग भी धार्मिक विषयों में सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग करना अपना कर्तव्य नहीं मानते। हमने अपने ही
परिवारों में अनेक पौराणिक बन्धुओं को देखा है जो मूर्तिपूजा, मृतक श्राद्ध, जन्मनाजाति प्रथा, फलित ज्योतिष आदि की
निरर्थकता को जान लेने के बाद भी उसका त्याग नहीं करते और वैदिक मत के सत्य सिद्धान्तों की उपेक्षा करते है।
अन्तरिक्ष यात्री श्री राकेश शर्मा जी ऋषिभक्त पं0 लोकनाथ जी के ही पौत्र हैं जो अमेरिका के चन्द्रयान में चन्द्रमा की
भूमि पर उतरे थे। हमने वर्षों पूर्व उनकी अन्तरिक्ष यान में चन्द्रमा की यात्रा के समय पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी से
रेडियो पर वार्ता सुनी थी। इन्दिरा जी ने पूछा था कि अन्तरिक्ष से भारत कैसा दीखता है? राकेश शर्मा जी ने उत्तर में कहा था
‘सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा’। वर्तमान में श्री राकेश शर्मा जी दक्षिण भारत के कोयम्टूर नगर में सेना के
अधिकारियों की एक कालोनी में निवास करते हैं और आर्यसमाज से जुड़े हुए हैं।
वैदिक धर्म का महत्व बताते हुए पं0 लोकनाथ तर्कवाचस्पति जी ने अपने एक लेख में लिखा है कि धर्म का दूसरा नाम
न्याय भी है। मेरा (वैदिक) धर्म मुझे इसलिए भी प्यारा है कि वह मुझे न्याय करना, न्याय मानना और न्याय परखना सिखाता
है। एक समय में एक से अधिक पति बनाने या मानने से यदि एक स्त्री व्यभिचारिणी कही जा सकती है, तो निश्चय ही एक
मनुष्य भी एक समय में एक से अधिक स्त्रियां बनाने या मानने पर उसी प्रकार से दोषी समझा जाना चाहिए। यह बहुत बड़ा
अन्याय है कि उपर्युक्त व्यवहार से स्त्री को अधम व पुरुष को भला माना जाये। इस प्रकार के सिद्धान्तों को मानने वाले
सम्प्रदाय बुद्धिमान् व्यक्ति के लिए कभी स्वीकार करने योग्य नहीं हो सकते। मेरा धर्म इस दृष्टि से स्त्री व पुरुष को समान
अधिकार देता है। मनुष्य स्वतन्त्रतापूर्वक विचरे और स्त्रियां घर की चारदीवारी में बन्द रहें-यह कैसा धर्म हुआ? मनुष्य तो खुले
मुंह फिरे, वायु सेवन करें तथा स्त्रियां मुंह पर कपड़ा डालकर फिरे-यह अनुचित हैं।
मेरा धर्म यह भी नहीं सिखाता कि मृत्यु के पश्चात् पुरुषों को तो किसी स्थान-विशेष पर निश्चित संख्या में कुछ
वस्तुएं प्राप्त होंगी, परन्तु स्त्री उनसे वंचित रखी जायेगी। मेरा धर्म न्याय के अनुसार यह बताता है कि यदि स्त्री के मर जाने

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पर पुरुष के लिए दूसरी स्त्री का विधान शास्त्र के अनुसार उचित है, तो पति के मर जाने पर स्त्री के लिए भी दूसरे पति का
विधान उचित है। जो विधि एक के लिए है वही दूसरे के लिए भी। स्त्री और पुरुष में भेद नहीं है।
हमने पं0 लोकपति तर्कवाचस्पति जी के उपर्युक्त जो विचार दिये हैं, वह आर्यसमाज के पत्र ‘आर्य मुसाफिर’ उर्दू
मासिक के जुलाई सन् 1931 के अंक में प्रकाशित हुए थे। लेख का शीर्षक था ‘मेरा वैदिक धर्म मुझे क्यों प्यारा है?’ हमें आज
इस पूरे लेख जिसे प्रवचन भी कह सकते हैं, पढ़ने वा सुनने का अवसर मिला और इससे हमें ज्ञानवृद्धि सहित सुख लाभ हुआ।
पं0 लोकनाथ जी का यह लेख ‘विजयकुमार गोविन्दराम हासानन्द, नई सड़क, दिल्ली’ द्वारा सन् 1995 में प्रकाशित ‘वैदिक-
ज्ञान-धारा’ पुस्तक में प्रकाशित हुआ है। पुस्तक का मूल्य 80 रुपये था तथा पुस्तक की कुल पृष्ठ संख्या 160 है। पुस्तक में
आर्यसमाज के पुराने अनेक प्रसिद्ध विद्वानों के लेख प्रकाशित किये गये हैं। हम उन लेखकों के नामों का वर्णन कर रहें हैं
जिनके लेख इस पुस्तक में प्रकाशित हुए हैं। स्वामी दर्शनानन्द जी, महात्मा हरिराम वानप्रस्थी, महात्मा नारायण स्वामी, श्री
शान्तस्वामी अनुभवानन्द जी, पं0 शान्ति प्रकाश जी, सवामी सर्वदानन्द जी, डॉ0 दीवानचन्द जी, स्वामी वेदानन्द तीर्थ,
महात्मा आनन्द स्वामी जी, स्वामी सर्वानन्द जी, आचार्य भद्रसेन जी, आचार्य चमूपति जी, पं0 रामचन्द्र देहलवी जी, पं0
बिहारीलाल शास्त्री जी, पं0 लेखराम जी, श्री सन्तराम अजमानी जी, पं0 गंगाप्रसाद उपाध्याय जी, पं0 बुद्धदेव विद्यालंकार
जी, पं0 लोकनाथ तर्कवाचस्पति जी, पं0 आत्माराम अमृतसरी जी, पं0 मनसाराम वैदिक तोप जी एवं स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी
आदि विद्वानों के लेख पुस्तक में हैं।
‘वैदिक-ज्ञान-धारा’ पुस्तक के सम्पादक आर्यजगत् के प्रसिद्ध वयोवृद्ध विद्वान प्रा0 राजेन्द्र जिज्ञासु जी हैं। इस
पुस्तक के प्रकाशन से यह सम्भव हुआ है कि उपर्युक्त सभी प्रसिद्ध विद्वानों के विचारों, वचनों व ज्ञान-गंगा का लाभ हम ले
सकते हैं। ईश्वर की कृपा है कि 87 वर्ष की आयु में भी प्रा0 राजेन्द्र जिज्ञासु जी की लेखनी गतिशील है। प्रा0 जिज्ञासु जी से
निरन्तर नये-नये उपयोगी ग्रन्थ मिल रहे हैं। उनके ग्रन्थों की कुल संख्या लगभग 300-400 है। पिछले दिनों आपने विशाल
ग्रन्थ ‘कुलियाते आर्य मुसाफिर’ का दो खण्डों में सम्पादन किया है। जिज्ञासु जी के लेख भी परोपकारी एवं वेदप्रकाश आदि
पत्रिकाओं में पढ़ने को मिलते रहते हैं। हम ईश्वर से जिज्ञासु जी के स्वस्थ जीवन एवं दीर्घायु की कामना करते हैं। उन्होंने
आर्यसमाज की लेखन द्वारा जो सेवा की है, उसके कारण वह आर्यसमाज के इतिहास में सदा अमर रहेंगे। प्रा0 जिज्ञासु जी
आर्यसमाज के ऐसे विद्वान हैं जिन्होंने सबसे अधिक आर्यसमाज के विद्वानों की जीवनियां लिखी हैं। आर्यसमाज आपकी
सेवा पाकर धन्य हुआ है। इसके साथ ही हम वैदिक-ज्ञान-धारा पुस्तक के प्रकाशक यशस्वी श्री अजय आर्य जी को भी साधुवाद
देते हैं। आपने, आपके पिता श्री विजय कुमार और पितामह श्री गोविन्दराम हासानन्द जी ने ‘गोविन्दराम हासानन्द प्रकाशन’
के द्वारा आर्यसमाज की जो सेवा की है, वह गौरवपूर्ण एवं अविस्मरणीय हैं। आपके द्वारा आर्यसमाज का दिग्दिगन्त प्रचार-
प्रसार हुआ है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि आपका प्रकाशन उन्नति करता रहे और इसमें कभी शिथिलता व अवरोध न
आये। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य
पताः 196 चुक्खूवाला-2
देहरादून-248001
फोनः09412985121

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