विमर्श का केन्द्र बनता संघ

 आशीष रावत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को हम सभी जानते हैं और मुझे नही लगता कि किसी को संघ की पहचान बताने की आवश्यकता है। आज यह कहना ही उचित होगा कि इसके आलोचक ही इसकी मुख्य पहचान हैं। जब आलोचक संघ की कटु आलोचना करते नजर आते हंै तब-तब संघ और मजबूत होता हुआ दिखाई पड़ता है। छद्म धर्मनिरपेक्षवादी लोगांे को यही लगता है कि भारत उन्हीं के भरोसे चल रहा होता है किन्तु जानकर भी पागलों की भांति हरकत करते हैं जैसे उन्हंे पता ही न हो कि संघ की वास्तविक गतिविधियां क्या हैं? राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की संगठनात्मक उपलब्धि और विस्तार की चर्चा करना इस समय बेहद प्रासंगिक है। कभी अनाम, अनजान, उपेक्षित और घोर विरोध का शिकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आज भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में चर्चा एवं उत्सुकता का विषय बना हुआ है। संघ का नाम आज सर्वत्र चर्चा में है। संघ कार्य का बढ़ता व्याप देखकर संघ विचार के विरोधक चिंतित होकर संघ का नाम बार-बार उछाल रहे हैं। अपनी सारी शक्ति और युक्ति लगाकर संघ विचार का विरोध करने के बावजूद यह राष्ट्रीय शक्ति क्षीण होने के बजाय बढ़ रही है, यह उनकी चिंता और उद्वेग का कारण है। संघ जहां धर्म, अध्यात्म, विश्व कल्याण और मानवीय मूल्यों की रक्षा करने वालों के लिए शक्ति स्थल है, वहीं वह हिन्दू या भारत विरोधी शक्तियों के लिए चिन्ता और भय कम्पित करने वाला संगठन भी है। संघ को रोकने के लिए विरोधी पग-पग पर कांटे बोते रहे पर वे संघ की संगठन शक्ति को रोक नहीं पाए। आज देश-विदेश के अनेक विश्वविद्यालयों में संघ पर शोध हो रहा है। आखिर, संघ के मूल में ऐसी कौन सी शक्ति छिपी है जिसने उसे इतना बड़ा कर दिया कि आज वह दुनिया के बुद्धिजीवियों के ध्यानाकर्षण का केन्द्र बन गया है। यही प्रश्न संघ के प्रशंसकों, विरोधियों और शोधकर्ताओं के मन में उठता है। इसलिए इन प्रश्नों के उत्तर यदि चाहिए तो सबको संघ संस्थापक एवं आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के विचारों को उचित परिप्रेक्ष्य में समझना होगा, क्योंकि उन्होंने ही संघ की स्थापना की और उसका लक्ष्य निर्धारित किया। वास्तव में डॉ. हेडगेवार के संदेशों में ही छिपा है संघ के शक्तिशाली और विस्तारित होने का रहस्य।

डॉ. हेडगेवार ने 13 अक्टूबर, 1937 को विजयादशमी के दिन अपने प्रबोधन में संघ की स्थापना के उद्देश्य को निरुपित करते हुए कहा था “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना केवल अपने स्वयं के उद्धार के लिए ही किया गया है। संघ का कोई दूसरा-तीसरा उद्देश्य न होकर केवल स्वयं का उद्धार करना, यही उसकी इच्छा है। परन्तु स्वयं का उद्धार कैसे होगा, पहले हमें इस पर विचार करना होगा। स्वयं का उद्धार करने के लिए जीवित रहना पड़ता है, जो समाज जीवित रहेगा वही समाज स्वयं का और अन्यों का उद्धार कर सकता है और संघ की स्थापना इसी के लिए हुई है। हिन्दू समाज जीवित रहे इस उद्देश्य से ही संघ का जन्म हुआ है।” डॉ. हेडगेवार के इस आह्वान को स्वीकार कर अनेकों ने संघ कार्य के लिए अपने जीवन को समर्पित किया। जिनमें श्रीगुरूजी गोलवलकर, बालासाहब देवरस, एकनाथ रानडे, भाउराव देवरस, यादवराव जोशी, दादा परमार्थ तथा बाबासाहेब आपटे आदि प्रमुख थे। इन सभी के अनथक प्रयत्नों से संघ संख्यात्मक, गुणात्मक और संगठनात्मक दृष्टि से बढ़ता ही गया। संघ के संगठन संरचना में अधिकारी के निर्देशों का स्वयंसेवकों द्वारा अक्षरशः पालन करने की अदभुत अनुशासित परम्परा है। संघ के प्रचारक राष्ट्र पुनरुत्थान के संकल्प को जीते हैं और अपने आचरण व व्यवहार से अपने सम्पर्क में आने वाले लोगों को राष्ट्रोत्थान के लिए कार्य करने की प्रेरणा देते हैं। राष्ट्र को समर्पित प्रचारकों व स्वयंसेवकों के व्यवहार और चरित्र के बल पर संघ आज देश के प्रत्येक क्षेत्र में हरेक तबकों में कार्यरत है। उल्लेखनीय है कि विश्व के अन्य देशों में भी संघ का कार्य चलता है, पर यह कार्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नाम से नहीं चलता। कहीं पर ‘भारतीय स्वयंसेवक संघ’ तो कहीं ‘हिन्दू स्वयंसेवक संघ’ के रूप में संघ कार्य चलता है। 16 सितम्बर, 1947 को महात्मा गांधी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों से मिलने की इच्छा व्यक्त की और स्वयंसेवकों को सम्बोधित करते हुए कहा “बरसों पहले मैं वर्धा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक शिविर में गया था। उस समय इसके संस्थापक डाॅ. हेडगेवार जीवित थे। स्व. जमनालाल बजाज मुझे शिविर में ले गए थे और वहां मैं उन लोगों का अनुशासन, सादगी और छुआछूत की पूर्ण समाप्ति देखकर अत्यन्त प्रभावित हुआ था। तब से संघ काफी बढ़ गया है। मैं तो हमेशा से मानता आया हूं कि जो भी सेवा और आत्मत्याग से प्रेरित है उसकी ताकत बढ़ती ही है। संघ एक सुसंगठित एवं अनुशासित संस्था है। संघ के खिलाफ जो भी आरोप लगाए जाते हैं उनमें कोई सच्चाई है या नहीं, यह मैं नहीं जानता। यह संघ का काम है कि वह अपने सुसंगत कार्यों से इन आरोपों को झूठा साबित कर दे।“ 12 जुलाई, 1949 को सरकार द्वारा संघ पर लगा हुआ प्रतिबंध बिना शर्त हटाया गया। 13 जुलाई को श्रीगुरुजी कारावास से मुक्त हुए और पूरे भारत की परिक्रमा में जनता ने उनका स्थान-स्थान पर भव्य स्वागत किया। 1966 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने भी कठिन परिश्रम और कार्यकुशलता के लिए संघ की तारीफ की थी।

संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार से लेकर वर्तमान सरसंघचालक डाॅ. मोहनराव भागवत तक ने भारत को शिखर पर पहुंचाने के लिए लोगों को निरंतर प्रेरित करने का काम किया है। भ्रम फैलाने की तमाम कोशिशों के बावजूद संघ का कार्य बढ़ता गया। संघ स्वयं में न केवल विश्व का सबसे बड़ा और प्रगतिशील संगठन है, बल्कि उसके स्वयंसेवकों ने राजनीति समेत अन्य सभी क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। आज संघ का एक स्वयंसेवक देश का प्रधानमंत्री है और वसुधैव कुटुम्बकम् की भारतीय आकांक्षा के अनुरूप दुनिया को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए आशा का केन्द्र बना हुआ है। सर्वे भवंतु सुखिनः की भारतीय अवधारणा आज विश्व के लिए अस्तित्व बनाए-बचाए रखने के लिए एकमात्र राह के रूप में दिख रही है। अक्सर वामपंथी और तथाकथित सेक्युलर लेखकों द्वारा दुष्प्रचार किया जाता है कि संघ मुसलमानों और ईसाईयों के विरुद्ध है। जबकि यह पूर्णतया असत्य और बुनियाद हीन है। संघ का लक्ष्य सम्पूर्ण समाज को संगठित कर हिन्दू जीवन दर्शन के प्रकाश में समाज का सर्वांगीण विकास करना है। भारत में रहने वाले मुसलमानों और ईसाइयों के बारे में संघ की सोच और समझ क्या है वह 30 जनवरी, 1971 को प्रसिद्ध पत्रकार सैफुद्दीन जिलानी और गुरुजी गोलवलकर से कोलकाता में हुए वार्तालाप, जिसका प्रकाशन 1972 में हुआ, से पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है। सच तो यह है कि कांग्रेस, तथाकथित सेक्युलर दल और छद्म बुद्धिजीवियों का एक वर्ग साजिश के तहत संघ को मुस्लिम व ईसाई विरोधी करार देता आ रहा है। यह वही गिरोह है जिसे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में लगने वाले देशविरोधी नारों से ऐतराज नहीं और वे भारत की बर्बादी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मानते हैं। अगर ऐसे लोग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तुलना आतंकी संगठन से करते हैं तो यह उनकी राष्ट्रविरोधी धारणाओं को ही पुष्ट करता है।

 

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