कैसी और कितनी उच्च शिक्षा

शिक्षा पर बात करने का हक यों तो शिक्षाविदों को ही है; पर कभी-कभी कुछ प्रसंग बाकी लोगों को भी सोचने को बाध्य कर देते हैं। गत 19 अगस्त, 2017 को ‘उत्कल एक्सप्रेस’ के 14 डिब्बे उ.प्र. के खतौली नगर में पटरी से उतर गये। इस दुर्घटना में 23 लोगों की मृत्यु हुई और सैकड़ों घायल हुए। स्टेशन के पास होने से यात्रियों को चिकित्सा सुविधा शीघ्र मिल गयी, अन्यथा मृतकों की संख्या और अधिक होती।

दुर्घटना के बाद जांच के दौरान दो लोगों की फोन पर हुई वार्ता अखबारों में छपी है। उनमें से एक रेलवे फाटक पर तैनात कर्मचारी था, तो दूसरा कोई पूर्व कर्मचारी। वार्ता का निष्कर्ष यह था कि लाइन पर कार्यरत गैंगमैन कुछ देर काम करके फिर कमरे में आराम करने लगते हैं। बेरोजगारी के कारण इस काम में अब उच्च शिक्षित युवा भी आ रहे हैं, जबकि खराब पटरी के नट-बोल्ट खोलना, उसे काटना और जोड़ना साधारण सा काम है। इसे कम शिक्षा और सामान्य प्रशिक्षण प्राप्त लोग भी कर सकते हैं। अब तक ऐसा ही होता था; पर उच्च शिक्षित लोग अधिक परिश्रम नहीं कर पाते। अतः निर्धारित समय में पटरी की मरम्मत नहीं हो सकी।

यह प्रसंग हमें शिक्षा व्यवस्था पर पुनर्विचार करने का अवसर देता है। शिक्षा प्रगति का द्वार है। अतः आजादी के बाद शिक्षा विस्तार पर बहुत जोर दिया गया; पर शिक्षा कैसी और कहां तक हो, इस पर ध्यान नहीं दिया। पिछली सरकार ने तो शिक्षितों के आंकड़े बढ़ाने के लिए कक्षा आठ तक परीक्षा ही बंद कर दी। यह अनुभव सभी का है कि सरकारी अध्यापक दुर्गम क्षेत्र में जाना नहीं चाहते। कई जगह तो सब अध्यापक मिलकर सप्ताह में दो-दो दिन बांट लेते हैं। या फिर वे किसी बेरोजगार युवक को पांच-सात हजार पर नियुक्त कर देते हैं। वह बच्चों को घेर कर बैठा रहता है। परीक्षा न होने से पढ़ाने का दबाव भी नहीं रहा। अतः प्राथमिक शिक्षा चौपट हो गयी।

पिछले दिनों कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने ग्रामीण विद्यालयों की जांच की। उन्होंने पाया कि कक्षा आठ के बच्चे कक्षा दो या तीन की पुस्तक भी नहीं पढ़ पाते। दोपहर भोजन योजना की लाभ-हानि भी विचारणीय है। सर्वव्यापी भ्रष्टाचार तो इसमें है ही; पर कई अध्यापक पढ़ाने की बजाय इसी में लगे रहते हैं। इसके साथ ही उन्हें और भी कई सरकारी काम करने होते हैं। अतः जो पढ़ाना चाहते हैं, वे भी मजबूर हैं कि कब और कैसे पढ़ायें ?

यहां से निकले छात्रों को जब हाई स्कूल और इंटर की बोर्ड परीक्षा देनी पड़ती है, तो उनके हाथ-पैर फूल जाते हैं। अतः वे नकल का सहारा लेते हैं। प्रायः इस घपले में उनके अभिभावक, विद्यालय के प्राचार्य और प्रबंधक भी शामिल रहते हैं। अभिभावक चाहते हैं कि बच्चे पास हो जाएं, जिससे उनके विवाह में सुविधा हो तथा कोई सरकारी नौकरी मिल जाए। प्राचार्य और प्रबंधक विद्यालय का अच्छा परिणाम चाहते हैं, जिससे उन्हें सरकारी सहायता मिलती रहे। इस दुष्चक्र में शिक्षा बर्बाद हो रही है।

इसके साथ ही शासन ने दूर-दूर तक लाखों डिग्री कॉलिज खोल दिये हैं। यहां से भी बड़ी संख्या में डिग्रियां बंट रही हैं। शिक्षा के निजीकरण से लाखों अयोग्य युवा अपने मां-बाप के पैसे के बलपर बी.टेक, एम.टेक, एम.बी.ए, एम.सी.ए. जैसी व्यावसायिक डिग्रियां पा लेते हैं; पर इससे जहां एक ओर वे अपनी पुश्तैनी खेती या कारोबार से कट जाते हैं, वहां योग्यता के अभाव में उन्हें कोई ढंग की नौकरी नहीं मिलती। अतः वे त्रिशंकु की तरह बीच में लटक जाते हैं। सम्पन्न युवा तो दो-चार साल धक्के खाकर कारोबार में लग जाते हैं; पर बाकी मजबूरी में गैंगमैन, फिटर, माली या चपरासी जैसी नौकरी स्वीकार कर लेते हैं, जहां के लिए निर्धारित योग्यता दसवीं या बारहवीं ही है।

आजकल सरकारी नौकरियों में वेतन तो बहुत अच्छे हैं; पर कम्प्यूटर के कारण नौकरियां घटी भी हैं। शासन भी इन कामों में पक्की नौकरी की बजाय ठेकेदारी प्रथा को प्रश्रय दे रहा है। ठेकेदार के पास नौकरी मिलने पर भी उन तथाकथित शिक्षित युवाओं के सिर पर तलवार लटकी रहती है। अतः वे पूरे मन से काम नहीं कर पाते और स्थायी काम की तलाश करते रहते हैं। सामाजिक प्रतिष्ठा धूमिल होने के भय से वे घर से दूर रहना पसंद करते हैं। अतः वे गांव और परिवार से भी कट जाते हैं। उच्च शिक्षा के बावजूद ढंग का काम न होने से उनके विवाह में देरी होती है। अतः कई युवा नशे और अवसाद में फंसकर आत्महत्या जैसा घातक कदम भी उठा लेते हैं।

शिक्षा बहुत जरूरी है; पर उच्च शिक्षा कितनी और कहां तक हो ? बिना योग्यता के ही ऊंची डिग्री लेकर सड़क पर धक्के खाते युवाओं की फौज से देश का कितना भला होगा, यह सोचना भी जरूरी है। इस बारे में भारत तथा अमरीका में छात्र एवं प्राध्यापक रहे गाजियाबाद (उ.प्र.) निवासी अभियंता, वैज्ञानिक एवं उद्योगपति स्वर्गीय डा. जगमोहन जी जापान का उदाहरण देते थे। वहां 15-16 साल तक हर बच्चे को शिक्षा प्राप्त करना जरूरी है। उसके बाद उतने बच्चों को ही आगे पढ़ने दिया जाता है, जितनों की देश को जरूरत है। बाकी को हाथ के काम सिखाये जाते हैं, जिससे वे अपने घर में ही कोई छोटा उद्योग लगा सकें या फिर किसी बड़े उद्योग में काम पा सकें। इसी के बल पर द्वितीय विश्व युद्ध में पूरी तरह नष्ट होने के बाद भी जापान 50 साल तक दुनिया के इलैक्ट्रोनिक बाजार में राजा बना रहा। अब इन्हीं कारणों से यह स्थान चीन ले रहा है।

भारत के संदर्भ में सोचें, तो हाई स्कूल तक की शिक्षा डा. राममनोहर लोहिया के चार सूत्रों (अनिवार्य, निकट, समान और मातृभाषा में शिक्षा) पर आधारित हो। फिर शिक्षा का स्तर जैसे-जैसे ऊंचा हो, पढ़ने वालों की संख्या क्रमशः नियन्त्रित होती जाए। आखिर हाई स्कूल या इंटर में 50 प्रतिशत अंक पाने वाले छात्र एम.ए. या पी.एच-डी. के बाद भी अपना या देश का क्या भला कर सकेंगे ?

इसलिए प्राथमिक से लेकर हाई स्कूल स्तर तक के विद्यालय इतने अधिक हों कि सब बच्चे अपने घर से आसानी से पहुंच सकें। इसके बाद के विद्यालय क्रमशः न्याय पंचायत, विकास खंड, तहसील और जिला केन्द्रों पर हों। विद्यालय के साथ ही लड़के और लड़कियों के लिए अलग छात्रावास भी हों, जिससे वे ठीक से पढ़ सकें। यहां क्षेत्र की जनसंख्या और विद्यालयों की संख्या में उचित संतुलन जरूरी है।

यह सच है कि शिक्षा से प्रगति के द्वार खुलते हैं; पर उच्च शिक्षा किसे, कितनी और कहां तक मिले, इस पर भी विचार होना चाहिए। शिक्षित युवा देश की रीढ़ हैं। इसीलिए शिक्षा विभाग की गणना मानव संसाधन मंत्रालय के अन्तर्गत की जाती है; पर वे लोग भी मानव ही हैं, जो रेल दुर्घटनाओं में मर रहे हैं। इसका कारण कहीं अनावश्यक और अत्यधिक उच्च शिक्षा तो नहीं है ?

खतौली और उसके बाद दस ही दिन में हुई चार रेल दुर्घटनाएं इस विषय की समीक्षा की मांग कर रही हैं।

– विजय कुमार

2 thoughts on “कैसी और कितनी उच्च शिक्षा

  1. यदि रेल दुर्घटना को लेकर आप विद्या पर आवश्यक समीक्षा करते हैं तो हाल ही में समाचार पत्रों की सुर्खियों में आई गुरमीत राम रहीम सिंह संबंधित चर्चा भारतीयों में अभिज्ञता व अनुशासन का आवाहन करती है| विद्या-ग्रहण किये कॉल सेंटर में काम करते सात सौ भारतीय युवाओं द्वारा संयुक्त राष्ट्र अमरीका स्थित करदाताओं से धोखाधड़ी हमारे चरित्र का खोखलापन दर्शाती है| कभी कभी सोचता हूँ कि नीति निर्माताओं द्वारा नक़ल पीट कर अथवा किसी दूसरे गोरखधंधे से प्राप्त किये प्रमाणपत्र पर नियामक कार्यविधि के अंतर्गत नियंत्रण रखने की प्रक्रिया बनाई जानी चाहिए| जैसे कि पेशेवर नौकरी के लिए विषय-अनुकूल शिक्षा अथवा सफलतापूर्वक प्रशिक्षण का प्रमाणपत्र होते किसी व्यावसायिक संस्था अथवा शासकीय नियामक संस्था द्वारा दिया अनुज्ञापत्र होना आवश्यक माना जाना चाहिए|

    मैं चाहूँगा कि लेखक व पाठक अभिव्यक्ति के इस मंच, प्रवक्ता.कॉम पर किसी एक सामाजिक विषय पर विचार-विमर्श करते एक विशेष-गोष्ठी का आयोजन करें जो अपने निर्णायक विचारों को व्यावसायिक संस्थाओं अथवा शासकीय नीति निर्माताओं के साथ साँझा कर समाज व शासन को लाभान्वित करे|

  2. निष्क्रियता खतम हो, और कम से कम, तीन स्तर की सुरक्षा जाँच का क्रियान्वयन होना चाहिए। (Critical Path Method..का आयोजन करो।)

    **कर्मचारी अंग्रेज़ी (मॆनुअल) का अज्ञान छिपाने के लिए सवाल भी पूछता नहीं–और दुर्घटना घत जाती है।**
    **डिग्रियों की नहीं विशेष जिम्मेदारी और ड्यूटी आधारित प्रशिक्षा परमावश्यक है। जिसको पूरी गम्भीरता से संचालित किया जाए।**

    (१) किसी भी पद पर नियुक्ति के पूर्व, प्रशिक्षा आवश्यक है। और ऐसी प्रशिक्षा हिन्दी और प्रादेशिक भाषा में ही होनी चाहिए। (अंग्रेज़ी की मॆनुअल सामान्य कर्मचारी को समझ नहीं आती। और *अपना अज्ञान छिपाने की कोशिश करने में वह प्रश्न भी पूछता नहीं* है।)
    (२) आरक्षण से सहानुभूति पूर्वक कहता हूँ; कि नियुक्ति में * आरक्षण बिलकुल खतम होना चाहिए।* परीक्षा की तैयारी में सहायता हो, पर पास होने में ना हो।
    (३) अपनी ड्यूटी का बुरा परिणाम (नतिजा) भी सोचने की क्षमता होनी चाहिए।
    (४) डिग्री कोई भी हो, पर विशेष पद की नियुक्तियाँ बहुत सावधानी पूर्वक होनी चाहिए।
    अकस्मात (एक्सिडन्ट) घटते हैं, सामान्य कर्मचारी की निष्क्रियता के कारण!!!

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