लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

प्रवक्‍ता ब्यूरो

Posted On by &filed under लोकसभा चुनाव.


y20vote2020091भीषण गर्मी की वजह से 15वीं लोकसभा चुनाव का जुनून अब हांफने लगा है। इसका असर गुरुवार आम चुनाव के तीसरे चरण के मतदान के दौरान आम लोगों पर साफ नजर आया।

नौ राज्यों व दो केंद्र शासित प्रदेशों की 107 लोकसभा सीटों पर संपन्न हुए मतदान में औसतन 50 फीसदी मतदाताओं ने अपने मताधिकार का उपयोग किया। इसकी वजह चिलचिलाती धूप मानी जा रही है।

निर्वाचन आयोग की ओर से मतदान के बाबत जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार बिहार में 48 फीसदी वोट डाले गए, जबकि गुजरात में करीब 49 प्रतिशत। इसके अलावा दादरा एवं नगर हवेली में 60, दमन एवं दीव में 60, कर्नाटक में 57, मध्य प्रदेश में 44, महाराष्ट्र में 43 से 45, सिक्किम में 65, उत्तर प्रदेश में 45 और पश्चिम बंगाल में 64 प्रतिशत मतदान हुआ। जम्मू एवं कश्मीर में 25 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया।

गुरुवार को हुए मतदान में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, जनता दल (युनाइटेड) के नेता शरद यादव सहित 1567 उम्मीदवारों के किस्मत का फैसला वोटिंग मशीनों में बंद हो गया।

मतदान के दौरान पश्चिम बंगाल, गुजरात, मध्य प्रदेश के कुछ स्थानों से चुनावी हिंसा की खबरें भी आई हैं। कई मतदान केंद्रों पर मतदाताओं की ओर से चुनाव बहिष्कार का भी मामला सामने आया है। हालांकि, तीसरे चरण का मतदान संपन्न होने के साथ ही लोकसभा की 543 सीटों में से 372 सीटों पर मतदान संपन्न हो गया है।

तीसरे चरण के तहत महाराष्ट्र की 10, बिहार और कर्नाटक की 11-11, पश्चिम बंगाल की 14, उत्तर प्रदेश की 15, गुजरात की 26, जम्मू और कश्मीर की एक, मध्य प्रदेश की 16, सिक्किम की एक, दादरा तथा नगर हवेली व दमन एवं दीव की एक-एक संसदीय सीट के लिए मतदान हुआ। सिक्किम में लोकसभा के साथ विधानसभा की 32 सीटों के लिए भी वोट डाले गए।

मतदान के दौरान पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले के बलरामपुर इलाके में बारुदी सुरंग में विस्फोट होने से एक जवान घायल हो गया।

One Response to “तीसरा चरण का मतदान भीषण गर्मी की चपेट चढ़ा, 50 प्रतिशत मतदान हुआ”

  1. JAVED USMANI

    चुनाव २००९ के तीन चरण पूरे हो चुके है चुनाव मे कम मतदान चिन्तनीय है ,मतदान मे कमी की वजह केवल गर्मी को मानना उपयुक्त नही होगा क्योकि इस गरमी मे भी लोग अपने निजि दायित्व का निर्वाह कर ही रहे है ,नौकरी और कारोबार के अलावा शादी विवाह ,सैर- सपाटा सभी आराम के साथ चल रहा है ,इससे साफ लगता है कि , मतदान मे लोगो की घटती रुचि का कारण लोगो का राजनैतिक दलो और राजनेताओ के प्रति विश्वास की कमी है ,पहले जब आवागमन के सन्साधन कम थे तब भी मतदान का प्रतिशत ज्यादा बेहतर था गौर-तलब बात यह भी है कि आज आबादी एक अरब से ज्यादा है और तकरीबन ७० करोड से ज्यादा मतदाता है ऐसी स्थिति मे मतदान ,पचास प्रतिशत के आस-पास रहना बताता है कि , लगभग पच्चीस करोड मतदाताओ ने अपने मताधिकार का प्रयोग नही किया है और यही दशा आगे के मतदान की बनी रहेगी तो इसका मतलब होगा कि , पैतीस करोड लोगो ने अपने मतो का इस्तेमाल करने के बजाए घर मे रहना पसन्द किया है .यहा भी याद रखाना होगा कि आजादी के समय देश की कुल आबादी जो लगभग चौतीस करोड के आस-पास थी उससे ज्यादा मतदाताओ ने अपने मताधिकार का प्रयोग नही किया है ,किसी भी लोकतन्त्रीय व्यवस्था का इससे बडा अभाग्य और क्या हो सकता है कि लोग सरकार बनने के काम मे हिस्सेदारी करने से जी चुराये , आधे – अधूरे मतदान से प्रतीत होता है कि आने वाली सरकार भी प्रर्याप्त जनसमर्थन के अभाव मे आधी -अधूरी ही होगी और ऐसा होना समग्र लोकतन्त्र के लिए शुभ सकेत नही माना जा सकता है .राजनतिक दलो और राजनेताओ को विचार करना चाहिए कि उनकी अवसरवदिता और स्वार्थ ने मतदाताओ को इतना ज्यादा आहत किया है कि मतदाताओ का आधे से ज्यादा हिस्सा राजनीति से कन्नी काटने पर मजबूर है ,चुनाव आयोग को भी मतदाताओ की पीडा समझनी चाहिए और ऐसे चुनावी कायदो का निर्माण करना चाहिए जो राजनैतिक दलो और राजनेताओ को लोकतन्त्र के प्रति और अधिक जबाबदह बनाये , इसके लिए चुनाव आयोग को खुद आगे आकर चुनावी वादा खिलाफी करने वाले दलो और नेताओ पर चुनावी प्रतिबन्ध लगाने और चुनावी जीत के लिए , मतदान का प्रतिशत निर्धारित करना चाहिए जिस तरह से चुनाव मे प्रत्याशी की जमानत बचने के लिए मत – प्रतिशत निश्चित है उसी तरह चुनाव मे विजयी होने के लिए भी मत-प्रतिशत तय किये जाने चाहिए इससे राजनैतिक दल ,राजनेता और उम्मीदवार अपनी जीत और सत्ता -सुख , सुनिश्चित करने के लिए ,मतदताओ को मतदान करने के लिए प्रेरित करने के उदेश्य से भले और जनकल्याण के कार्य करने पर मजबूर हो सकते है ,और उनका यह बदला हुआ स्वरुप लोगो को कम से कम इतन जरुर भायेगा कि मतदाता एक बार फिर मतदान केन्द्रो की रुख करने का मन बनायेगा . पर यह तभी सभव है जब चुनाव आयोग और कानून इसके लिए पहल करे . अनिवार्य मतदान का कानून भी एक हल हो सकता है पर भारत जैसे दुनिया के सबसे बडे लोकतन्त्र मे यह कायदा सफल हो पायेगा यह कहा नही जा सकता .

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *