हम काम से नहीं डरते 

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शर्मा जी बहुत दुखी हैं। बेटे का विवाह सिर पर है और मोहल्ले की सड़क है कि ठीक ही नहीं हो रही। छह महीने पहले पानी की लाइन टूट गयी। सारा पानी सड़क पर बहने लगा। भीषण गरमी के मौसम में पूरे मोहल्ले में तीन दिन तक हाहाकार मचा रहा।

छुट्टियों के कारण अधिकांश लोगों के यहां रिश्तेदार आये हुए थे। सब गरमी में झुलसते रहे। पीने और खाना बनाने के लिए भी पानी खरीदना पड़ रहा था। ऐसे में नहाने की बात कौन कहे। कुछ लोग तो पांच कि.मी. दूर नदी में जाकर नहाते-धोते थे। नहाना भी हुआ और पिकनिक भी। पुरुष और बच्चों के लिए तो ये ठीक था; पर महिलाओं को तीन दिन बड़ी परेशानी हुई।

जैसे-तैसे पानी की लाइन ठीक हुई। शर्मा जी तो उस दिन छह बार नहाये; पर उस लाइन के कारण जो सड़क टूटी, उसे ठीक से पाटा नहीं गया। इस चक्कर में कई लोग चोट खा गये। शर्मा जी ठहरे स्कूटर चलाने वाले। इस धक्का परेड में उनकी कमर का दर्द फिर उभर आया। अतः कई दिन तक सिकाई और दवाई करनी पड़ी।

लेकिन शर्मा जी जिसे मुसीबत का अंत समझ रहे थे, वह वास्तव में मुसीबतों की शुरुआत थी। थोड़े दिन बाद सीवर लाइन वाले किसी समस्या को लेकर सड़क तोड़ने लगे। इस बार काम हफ्ते भर चला। बाद में फिर वही झंझट। वे लोग कुछ पाइप भी वहीं छोड़ गये। इससे बार-बार जाम लगने लगा। कई बार शिकायत की, तब जाकर पाइप हटे।

इस प्रकरण को दस ही दिन बीते थे कि टेलिफोन वाले आ धमके। वे अपनी लाइनें अंडरग्राउंड कर रहे थे। उन्होंने फिर सड़क तोड़नी शुरू कर दी। हर विभाग अपने हिसाब से सड़क तोड़ता था। इस चक्कर में पूरी सड़क का सत्यानाश हो गया। इसके बाद नंबर बिजली वालों का था। उन्हें भी कुछ पुराने खंभे बदलकर नये लगाने थे। बीच की सड़क तो खुद ही चुकी थी। किनारे का क्रियाकर्म उन्होंने कर दिया। पूरा मोहल्ला मानो खुदा का मैदान बन गया। बच्चों को स्कूल जाना मुश्किल, तो बड़ों को दुकान और दफ्तर। शर्मा जी जैसे बुजुर्ग टहलने को तरस गये।

जब पानी सिर के ऊपर से निकलने लगा, तो मोहल्ले वालों ने पंचायत की। इसमें निर्णय हुआ कि शर्मा जी के नेतृत्व में सब नगर पंचायत के अध्यक्ष से मिलने चलें। फोन मिलाया, तो उन्होंने अगले दिन दस बजे आने को कहा।

सब लोग समय से नगर पंचायत पहुंच गये। दो घंटे बाद अध्यक्ष जी आये। आते ही उन्होंने खेद व्यक्त करते हुए बताया कि एक वार्ड मेंबर की नानी मर गयी। उनके साथ शमशान जाना पड़ा। वहां से सीधे चला आ रहा हूं। शर्मा जी सबसे आगे थे ही। उन्होंने विस्तार से सारी बात बतायी।

अध्यक्ष जी ने अपनी समस्या बता दी कि जैसे ही किसी काम का पैसा ऊपर से आता है, हमें उसे खर्च करना पड़ता है। यदि खर्च न करें, तो एक ओर वार्ड के प्रतिनिधि शोर मचाते हैं, दूसरी ओर उसके वापस चले जाने का भी खतरा रहता है।

‘‘लेकिन सर, आप सारे काम एक साथ क्यों नहीं कराते; बार-बार की तोड़फोड़ से खर्चा भी अधिक होता है और परेशानी अलग ?’’ शर्मा जी ने थोड़ा तेज आवाज में कहा।

‘‘शर्मा जी, खाली बैठना हमारी आदत नहीं है। हम तो काम को पूजा समझते हैं। यदि सारे काम एक साथ हो गये, तो फिर साल भर हम क्या मक्खी मारेंगे ?’’

पूरा प्रतिनिधिमंडल बैरंग वापस लौट आया। शाम को शर्मा जी मिले, तो मैंने उन्हें अपने कार्यालय में दो साल पूर्व हुए एक निर्माण कार्य की बात बतायी।

उस काम के समय मैंने देखा कि अधिकांश मजदूर एक साथ सात-आठ ईंटें उठा रहे हैं, जबकि दो मजदूर एक बार में सिर्फ दो ही ईंटें ले जा रहे थे। मैंने इसका कारण पूछा, तो उन्होंने कहा कि बाकी मजदूर निकम्मे हैं। वे काम को जल्दी खत्म करना चाहते हैं; पर हम काम से नहीं डरते। हम तो शाम तक काम करते रहेंगे।

शर्मा जी ने सिर पर हाथ मारा। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि वे नगर पंचायत के अध्यक्ष को काबिल मानें या काहिल; वे काम की इस गति को प्रगति कहें या दुर्गति; वे मोहल्ले में लगातार हो रही तोड़फोड़ को व्यवस्था कहें या अव्यवस्था; इसे जनता के धन का सदुपयोग कहें या दुरुपयोग ?

आपके पास इस प्रश्न का कोई उत्तर हो तो बताएं। क्योंकि शर्मा जी के बेटे का विवाह निकट है और वे सड़क की हालत से बहुत दुखी हैं।

– विजय कुमार

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