जब जीने की उम्मीद न हो तो क्या करें?

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– ललित गर्ग –

जीने की इच्छा जब साथ छोड़ने लग जाए तो क्या किया जाना चाहिए है? जिसके जीने की इच्छा खत्म हो रही हो वह क्या करे और उसके आसपास के लोग क्या करें? आज इच्छा मृत्यु को वैध बनाने का मुद्दा न केवल हमारे देश में बल्कि दुनिया में प्रमुखता से छाया हुआ है। हाल ही में भारत में सुप्रीम कोर्ट ने एक दूरगामी असर वाले फैसले में लोगों को इच्छा मृत्यु की अनुमति दे दी है।  कोर्ट ने कहा सम्मान से मरना व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। 
इच्छामृत्यु या मृत्यु की संभावना को देखते हुए जीवन को बचाने के प्रयत्न पर विराम लगाना क्या उचित है? कुछ ऐसा ही मैसूर में 10 साल की नन्हीं-सी बच्ची के साथ हुआ, जिसको लेकर फेसबुक, व्हाट्सअप, सोशल मीडिया और पूरे जैन समाज में एक ही चर्चा हो रही है कि आखिर 10 साल की बच्ची ने क्यों लिया ’संथारा?’ संथारा यानी मृत्यु का वरण। मैसूर निवासी कैलाशचंद बोहरा की सुपौत्री एवं दीपक बोहरा की सुपुत्री तृप्ति ने सचेतन अवस्था में संथारा लेने का कारण ’ब्रेन ट्यूमर केंसर था। जिसका अंतिम पड़ाव मृत्यु ही था। डॉक्टर ने कहा इस बच्ची के जीने की अब कोई उम्मीद नहीं है, जब हॉस्पिटल से घर लेकर आये तो तृप्ति ने इच्छा व्यक्त की कि मैं अपने जिंदगी के अंतिम पड़ाव में जैन धर्म को समर्पित होना चाहती हूं और मैं संथारा लेना चाहती हूं। तृप्ति ने अपने मुख से संथारा के स्वीकार कर लिया और तकरीबन 4 घंटे संथारे के पश्चात रात तृप्ति जैन ने जैन धर्म के संथारा परम्परा के अन्तर्गत मृत्यु का वरण करके इतिहास में अपना नाम दर्ज करवा कर अपने परिवार को अलविदा कह गयी। 
जैन परम्परा ही नहीं बल्कि हिन्दू धर्म में भी जब किसी बुजुर्ग की मौत निकट दिखने लगती है तो उसके मुंह में परिवारजनों के हाथों से तुलसी गंगाजल दिलवाने का चलन है। माना जाता है कि इससे उसकी मृत्यु ही नहीं बल्कि मृत्यु के बाद उसकी यात्रा सुगम होगी। कुछ ऐसा ही मुंबई के मीरा रोड स्थित एक बड़े से अस्पताल में होता है। एक बड़े धार्मिक संप्रदाय से जुड़े ट्रस्ट द्वारा संचालित इस अस्पताल में प्रचलन यह है कि जब किसी मरीज की हालत ज्यादा बिगड़ जाती और लगता कि यह नहीं बचेगा तो उसे भजन या धर्मग्रंथों के अंश सुनाए जाने लगते थे। अस्पताल प्रबंधन से जुड़े लोग इसका जिक्र अपनी विशिष्टता के रूप में करते थे जैसा कि जैन धर्म में समाधिमरण के अन्तर्गत किया जाता है। लेकिन इसके विपरीत मुंबई के चिकित्सा हलकों में अच्छा नाम कमा चुके एक युवा डॉक्टर ने इस अस्पताल से मिले अच्छे पैकेज वाला ऑफर इसी वजह से ठुकरा दिया। उसका कहना था कि यह चलन डॉक्टरी पेशे की मूल भावना के खिलाफ है और मैं ऐसे किसी अस्पताल से नहीं जुड़ सकता जो जिंदगी की जंग को कुछ पल भी पहले अधूरा छोड़ दे।
इसके पीछे मौजूद सोच पर उस डॉक्टर ने कई तरह से सवाल उठाए। मसलन, यह कोई कैसे तय कर सकता है कि कोई मरीज अब मर ही जाएगा? और जैसे ही आपने उसे गीता के उपदेश सुनाने शुरू किए, इससे तो जो भी थोड़ी बहुत उम्मीद उसमें बाकी होगी, वह टूट जाएगी। तो फिर वह अपना संघर्ष कैसे जारी रखेगा? बतौर डॉक्टर हमारा काम है कि आखिरी दम तक जीवन को बचाने की कोशिश करते रहें। जब भी यह कोशिश नाकाम होती है, वह प्रफेशनली हमारी हार होती है। उस पर हम उदास होते हैं। यह कैसे हो सकता है कि हम कुछ पल पहले ही लड़ाई छोड़ दें? यह एक दृष्टिकोण है, लेकिन दूसरा दृष्टिकोण जैन धर्म के मृत्यु महोत्सव एवं कलात्मक मृत्यु का है। जिसे समझना न केवल जैन धर्मावलम्बियों के लिये बल्कि आम जनता के लिये उपयोगी है। यह समझना भूल है कि संथारा लेने वाले व्यक्ति का अन्न-जल जानबूझकर या जबरदस्ती बंद करा दिया जाता है। संथारा स्व-प्रेरणा से लिया गया निर्णय है। विद्वानों का मानना है कि आज के दौर की तरह वेंटिलेटर पर दुनिया से दूर रहकर और मुंह मोड़कर मौत का इंतजार करने से बेहतर है मृत्यु का सम्मापूर्वक वरण करना। यहाँ धैर्यपूर्वक अंतिम समय तक जीवन को पूरे आदर और समझदारी के साथ जीने की कला को आत्मसात किया जाता है।
  मेरे पिताजी स्व. श्री रामस्वरूपजी गर्ग ने भी आचार्य विनोबा भावे और वीर सावरकरजी जैसे लोगों की ही भांति जैन धर्म की इस साधना पद्धति को अपनाकर मृत्यु का वरण किया था। जब हमारे पारिवारिक डॉक्टर ने मुझे सलाह दी थी, ‘अगर इनकी इच्छा स्वैच्छा से होशपूर्वक मृत्यु का वरण करने की है तो आप जबरन जिलाए रखने की कोशिश मत करो। यह जीवन का अपमान है। गरिमापूर्ण मौत भी जीवन की गरिमा का ही हिस्सा होती है। मैंने डाॅक्टर से पूछा कि उनका जीवन कितना शेष है? उन्होंने आवश्यक जांच के बाद कहा कि दो-तीन दिन निकल सकते हैं? लेकिन जब वे करीब पन्द्रह दिन बाद फिर आये तो मैंने कहा कि आपने तो कहा था कि दो-तीन दिन निकल जाये तो बड़ी बात है। लेकिन पन्द्रह दिन तो निकल गये? डाॅक्टर ने कहा कि यह चमत्कार ही है, मेडिकल साइंस भी ऐसे लोगों की दिव्यता के आगे असफल है? मैंने देखा कि उन्होंने मृत्यु का वरण बिना वेदना एवं दर्द के शांति से किया।
मेरी दृष्टि में स्वाभाविक मृत्यु से पूर्व की सभी मौतें आत्महत्या नहीं होती। जो लोग असंतोष, निराशा और दुर्भाग्य से घबराकर जीने की इच्छा होते हुए भी भली-भांति जी नहीं सकते अतः घोर निराशा में स्वयं को समाप्त कर देते हैं, वे आत्महंता होते हैं। लेकिन जो लक्ष्यपूर्ति की पूर्ण संतुष्टि से, आत्मकाम से, प्रसन्नता से अपना प्राण त्याग करते हैं वे ईश्वर के चरणों में आत्मनिवेदक कहे जाते हैं।
दुनिया में अनेक देशों में इच्छामृत्यु के कानून बने हैं। दिसंबर 2013 में बेल्जियम की संसद ने बच्चों को इच्छा मृत्यु का अधिकार देने के बारे में सहमति जताई। 50 सांसदों ने इसके समर्थन में मत दिया। विरोध में सिर्फ 17 थे। 2002 से बेल्जियम, नीदरलैंड्स में और 2009 से लक्जम्बर्ग में यह कानून लागू हुआ है कि वयस्क मरीज की इच्छा पर डॉक्टर जीवन रक्षक दवाइयां रोक सकते हैं। अब संसद में अल्पवयस्कों को भी इच्छा मृत्यु देने का बिल पास कर दिया है। 2012 में स्विस मेडिकल वकीलों के कराए गए एक सर्वे के मुताबिक लोग बहुत अलग प्रतिक्रिया देते हैं। जर्मनी में 87 फीसदी लोग इच्छा मृत्यु पर सहमति जताते हैं जबकि ग्रीस में सिर्फ 52 फीसदी इसके समर्थन में हैं। फ्रांस के कानून के मुताबिक लाइलाज बीमारी से ग्रस्त रोगी की जीवन रक्षक प्रणाली मरीज के अनुरोध पर डॉक्टर हटा सकते हैं। दुनिया में इच्छामृत्यु को लेकर भले ही भिन्न-भिन्न मत हो, लेकिन इसके माध्यम से या संथारा द्वारा मृत्यु को गले लगाकर हम मृत्यु को मुस्कान बना सकते हैं।
प्रेषकः

 (ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92

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