लेखक परिचय

जयराम 'विप्लव'

जयराम 'विप्लव'

स्वतंत्र उड़ने की चाह, परिवर्तन जीवन का सार, आत्मविश्वास से जीत.... पत्रकारिता पेशा नहीं धर्म है जिनका. यहाँ आने का मकसद केवल सच को कहना, सच चाहे कितना कड़वा क्यूँ न हो ? फिलवक्त, अध्ययन, लेखन और आन्दोलन का कार्य कर रहे हैं ......... http://www.janokti.com/

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घर में शिशु संगोपन और शिशु संस्कार अत्यन्त उपेक्षित विषय बन गए हैं , जो आने वाली पीढी के लिए प्रतिकूल परिणामदायक होगी । आज की आधुनिक शिक्षा ने उपभोगवादी मानसिकता को इतना बढावा दिया है कि युवक-युवतियां अपने परम्परा और समाज से संवाद करना भूलते जा रहे हैं । अधिकाधिक सुख पाने की लालसा में संयुक्त परिवार टूटा जब यह नारे दिए गए ” छोटा परिवार सुखी परिवार ” और अब धीरे-धीरे परिवार भी टूट रहा है । आज का युवा वर्ग अधिकारों , सुविधाओं की मांग तो करता है पर कर्तव्य की बात उनके लिए बेमानी है । गृह कार्यों , व्यवस्था और वातावरण से कटे रहते हुए उनमें परिवार जैसी संस्था के प्रति आस्था नही रह जाती । व्यक्तिवादी सोच का जो बीज संयुक्त परिवार व्यवस्था को तोड़ने के समय एकल परिवार के रूप में (मियां , बीबी और बच्चा) उगाया गया था आज वटवृक्ष की शाखाओंकी भांति बढ़ता जा रहा है । बढती भौतिकतावादी प्रवृति और बाह्यसंसार की चमक-दमक में युवा परिवार- समाज -देश आदि की बातों को पिछडापन मानने लगा है । हर क्षेत्र में अर्थ की प्रधानता हावी है इस कारण परिवार के सदस्य भी संवेदनाशून्य हो गए हैं । फैलते बाजारवाद और वैश्वीकरण की वजह से नवयुवतियों की सोच भी बदल रही है । वे परिवार तथा सामाजिक दबाव में वैवाहिक बंधन स्वीकार तो कर लेती है किंतु करियर की चिंता उन्हें कुशल और समर्पित गृहणी बनने में बाधा पहुंचाती है । वास्तव में बचपन में उचित संस्कार पोषित न किए जाते , माता -पिता बच्चों को अपेक्षित समय नही दे पाते जो उन्हें प्यार दुलार देने और भावनात्मक सुरक्षा प्रदान करने का होता है उसमे वे अपने करियर बनने में जुटे रहते हैं । जिस कारण बच्चों में विलगाव की भावना आती है , उनके मन में परिवार के प्रति वह ममत्व नही रह जाता जो स्वाभाविक होता है । इसी प्रकार कहते हैं बच्चे जो देखते हैं हुबहू सीख जाते हैं । अपने माँ-बाप को दादा-दादी की उपेक्षा करते देखते हैं तो वो भी अपने समय में अपना कर्तव्य बोध भूल कर उदासीन हो जाते हैं । आज परिवार में बढ़ता एकाकीपन ही परिवार के नाश का भविष्य लिख रहा है । संस्करोंं के अभाव में भौतिक भोगलिप्सा के कारण लोग स्वार्थी और स्वकेंद्रित होते जा रहा हैं । बहरहाल , चिंता के इस विषय पर कई लोग, कई संस्थाएं और सरकार भी काम कर रही है । अभी हाल में ही गुजरात सरकार ने बुजुर्गों की अनदेखी करने वालों के विरुद्ध कड़े प्रस्ताव पारित किए हैं । इससे पूर्व केन्द्र सरकार भी ऐसे विधेयक लाती रही है । सामाजिक संस्थाओं और कई आध्यात्मिक गुरुओं द्वारा परिवार को बचाने की पहल भी जारी है लेकिन क्या कारण है कि अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पा रहा है ?

2 Responses to “क्या हम परिवार को बचा पाएंगे ?”

  1. sunil patel

    In present situation it is very difficult to maintain the family values. Britishers had played a game to finish Indian culture, now the results are coming. If our present education system is changed, not totally but according to our culture, tradition the situation can be controlled.

    sunil patel
    9406930400
    http://www.suntel.110mb.com

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  2. श्‍यामल सुमन

    shyamalsuman

    आपकी चिन्ता जायज और सकारात्मक है। लेकिन आज के भागम भाग जिन्दगी में तो न्यूकिलियर फेमिली की ओर हम सब लगातार अग्रसर हैं जिसमें अब मियां बीबी में भी साप्ताहिक देखा देखी होती है छुट्टी के दिन। सब अपने अपने काम में मस्त हैं वर्तमान के सुख का त्याग कर भबिष्य में अधिक सुख सुविधा जुटाने के लिए।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    http://www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

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