क्या आम आदमी की पहुंच में रहेगी रेल ?

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प्रमोद भार्गव

भारतीय रेल विश्व का सबसे बड़ा व्यावसायिक प्रतिष्ठान है,लेकिन इस ढांचे को किसी भी स्तर पर विश्वस्तरीय नहीं माना जाता। गोया इसकी सरंचना को विश्वस्तरीय बनाने की दृष्टि से कोशिशें हैं कि देश में सुविधा संपन्न तेज गति की प्रीमियम और बुलेट ट्रेनों का जाल बिछा दिया जाए। रेलवे को घाटे से उबारने के लिए सेवा-भाव से छुटकारा दिलाया जाए। नरेंद्र मोदी सरकार जब से सत्तारूढ़ हुई तब से रेलवे में गति और भोगवादी सुविधाओं को कुछ ज्यादा ही हवा दी जा रही है। रेल बजट यदि विसंगति की ऐसी ही धारणा से जुड़ा हुआ आज पेश होता है तो तय है,रेल आम आदमी ही नहीं,निम्न मध्यवर्गीय व्यक्ति की पहुंच से भी दूर होती चली जाएगी ? जबकि हमें संतुलित विकास की जरूरत है,जिससे रेलवे से सभी वर्ग के लोगों की जरूरतें पूरी हों और समावेषी विकास की आवधारणा को बल मिले ?

देश में आज भी रेल सार्वजनिक छोटी व लंबी यात्रा का सबसे सस्ता माध्यम है। देश में एक कोने से दूसरे कोने की यात्रा का इससे सुगम दूसरा कोई माध्यम नहीं है। आर्थिक उदारवादी नीतियों के लागू होने के बाद मध्यवर्गीय युवा आजीविका के लिए दूरांचलों में रोजगार करने को विवश हुआ है। इसलिए रेलों में आवाजाही के लिए भीड़ बढ़ने के साथ उच्च स्तरीय मांगें भी बढ़ी हैं। ऐसा इसलिए भी हुआ है,क्योंकि चीन व जापान समेत पूरी दुनिया में रेलवे में विस्तार,गति और सुविधाएं हैरतअंगेज हैं। इनकी तुलना में हम वाकई पिछड़े हैं। बावजूद इस होड़ में हम शामिल होते हैं और केवल खास आदमी की जरूरतों का ख्याल बजट में रखते है तो आम आदमी को रेलवे से बहिष्कृत कर देने की शर्त पर ही संभव होगा। जबकि सुविधा और सुरक्षा की जरूरत आम आदमी को भी है।

आम आदमी रेल का टिकट ले भी ले तो उसे सीट की बात तो छोडि़ए,ठीक से खड़े होने अथवा गलियारे में बैठने की जगह भी नहीं मिलती। इस आपूर्ति के लिए ४५,००० डिब्बों की अतिरिक्त जरूरत है। जिससे हरेक रेल में अतिरिक्त डिब्बे जोड़े जा सकें। अतिरिक्त रेल लाइंने बिछाने के साथ इकहरी लाइनों का दोहरीकरण भी जरूरी है,जिससे रेलगाडि़यों की संख्या बढ़ाई जा सके। इन बुनियादी सुविधाओं को जमीन पर उतारने की बजाय हमारे यहां अहमदाबाद से मुबंई बुलेट ट्रेन चलाने की बात हो रही है। ज्ञात हो,साधारण यात्री गाडि़यों के लिए औसतन एक किलोमीटर लंबी पटरी बिछाने पर १० करोड़ रूपए प्रति किमी का खर्च आता है,जबकि द्रुत गति की बुलेट ट्रेन पर १०० करोड़ रूपय प्रति किमी का खर्च आएगा। जाहिर है,इन दो शहरों के बीच ५०० किमी पटरी बिछाने पर जितना खर्च आएगा,उतनी राशि में ५००० किमी लंबी पटरी बिछाई जा सकती है। जो २० करोड़ यात्रियों की आवाजाही का साधन बनेगी ?

यात्री गाडि़यों को लेकर अकसर रोना रोया जाता है कि ये रेलें केवल आम आदमी की सुविधा एवं सेवा की दृष्टि से घाटे में चलाई जा रही हैं। नतीजतन इन्हें नियमित चलाने के लिए एक यात्री रेल पर दो मालगाडि़यां चलानी पड़ती हैं। इन गाडि़यों का घाटा बढ़ा’-चढ़ाकर इसलिए जताया जाता है,जिससे नई यात्री रेलें चलाने का दबाव न बनाया जाए। फिलहाल रेलवे के पास ६० हजार सवारी डिब्बे हैं,जिनमें करीब डेढ़ करोड़ मुसाफिर रोजाना सफर करते हैं। इनमें से वातानुकूलित डिब्बों में महज २ फीसदी यात्रियों की आवाजाही होती है। ऐसे में यह कैसे विश्वास कर लिया जाए की सामान्य शयनयान और डिब्बों में सफर करने वाले ९८ फीसदी यात्रियों का घाटा २ फीसदी कूलीन यात्री पूरा कर रहें हैं ? क्यों नहीं रेल बजट में सामान्य और विशेष डिब्बों से होने वाली आय और खर्च का लेखा-जोखा अलग से दिया जाता ? यहां गौरतलब यह भी हैं कि सामान्य सवारी और शयनयानों में क्षमता से कई गुना यात्री सफर करते हैं। इस आय को यदि वातानुकूलित यान की आय से जोड़ा जाए तो लगभग बराबर बैठती है। यही नहीं टिकट निरीक्षक लाचारी के मारे इन्हीं यात्रियों से अवैध वसूली करते हैं। इस रिश्वतखोरी को रोकने के उपाय किसी रेल बजट में दिखाई नहीं देते ?

सवारी गाडि़यों को चलाने में यदि घाटा है भी तो उसकी भरपाई पास की सुविधा प्रतिबंधित करके क्यों नहीं की जाती ? रेलवे में विशिष्ट व अति विशिष्ट लोगों को २८ प्रकार के निशुल्क और रियायती पास दिए जाते हैं। देश के सभी वरिष्ठ नागरिकों को खैरात में यात्रा के लिए ३० प्रतिषत की छूट लंबे समय से जारी है। यह छूट हर दर्जे के यात्री किराए में तो है ही,करोड़पतियों को भी मिल रही है। उन पेंशनधारियों को भी मिल रही है,जो बिना कुछ किए धरे ५०-६० हजार रूपए बतौर पेंशन ले रहे हैं। अधिमान्य पत्रकारों को भी ५० फीसदी छूट दी जा रही हैं। किसलिए ? ये मुफ्त यात्री रेलवे पर बोझ होने के साथ घाटे का सबब भी बन रहे हैं। इन मुफ्तखोरियों को बंद करके एक हद घाटे को पटाने के उपाय किए जा सकते हैं।

रेलवे सुरक्षा इंतजामों के प्रति भी भेदभाव बरत रही है। रेलवे में ११,४६३ बिना चौकीदार के पार-पथ हैं। इन पर आए दिन दुर्घटनाएं होती रहती हैं। जनहानि के साथ बड़ी मात्रा में धनहानि भी होती है। अनेक रेलवे स्टेशनों पर एक से दूसरे प्लेटफॉर्म पर आवागमन के लिए पैदल पार-पुल नहीं हैं। इससे जल्दबाजी में यात्री पटरियों से गुजरते हैं और रेल या मालगाड़ी की चपेट में आ जाते हैं। ये बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने की बजाय रेलवे देश के प्रमुख स्टेशनों पर विद्युत स्वचलित सीढि़यां ;एक्सेलेटरद्ध का जंजाल बुनने में लगी है। एक ऐक्सेलेटर की स्थापना में करोड़ों रूपय खर्च होते हैं और बड़ी मात्रा में बिजली की जरूरत पड़ती है। जबकि इतनी ही राशि में कम से ५ पार-पथों को मानव व बैरियर युक्त बनाया जा सकता है। इससे कम पढ़े-लिखे लोगों को बड़ी संख्या में रोजगार भी मिलेगा। मोदी सरकार के पिछले रेल बजट में २१ हजार सुरक्षाकर्मियों की भर्ती का ऐलान किया गया था। इनमें ४००० महिला सुरक्षाकर्मियों की भर्ती की बात भी कही गई थी,लेकिन बीते आठ माह के कार्यकाल में इस दिशा में कोई पहल नहीं की गई। इससे सरकार का कथनी और करनी में फर्क नजर आता है।

दिसंबर २०१४ को वारणसी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रेलवे का निजीकरण नहीं करने की बात पुरजोरी से कही थी। लेकिन इस कथ्य के परिप्रेक्ष्य में मोदी सफेद झूठ बोल रहे हैं। रेलवे में एकमुश्त निजीकरण करने की बजाय टुकड़े-टुकड़े कई विभागों को निजी हाथों में सौंपने का सिलसिला शुरू हो गया है। जलपान,स्वछता,माल ढुलाई,निजी कोच खरीद जैसे १७ क्षेत्रों में १०० फीसदी एफडीआई की मंजूरी दी जा चुकी है। संकेतक प्रणाली के आधुनिकीकरण और रख-रखाव,लॉजिस्टीक पार्क निर्माण,लोकोमोटिव और कोच के निर्माण से लेकर द्रुत गति की प्रीमीयम व बुलेट रेलों का ताना-बाना विदेशी पूंजी निवेष और निजीकरण के बल पर ही बुना गया है। इन लक्ष्यों की पूर्ति के लिए ही रेल मंत्रालय की कमान प्रभु जोषी को सौंपी गई है। उन्हें विदेशी पूंजी निवेष का विशेषज्ञ माना जाता है। ऐसे पक्षपातपूर्ण उपायों के चलते ही रेलवे में १९८० के पहले तक करीब ४० लाख कर्मचारी हुआ करते थे,जिनकी अब संख्या घटकर १३.५ लाख रह गई है। जबकि इस कालखंड में रेल व मालगाडि़यों की संख्या बढ़ी है और रेलवे संरचना का विस्तार हुआ है। ऐसे में छोटे कर्मचारियों की संख्या घटना एक बड़ा सवाल है ? ऐसे विषमतापूर्ण विकास को लेकर रेलवे से जुड़े श्रम संगठन लगातार विरोध जता रहे हैं,लेकिन आला अफसर कानों में अंगूली ठूंसे हुए हैं। बरहहाल रेलवे में आम आदमी से जुड़ी सुविधाओं को घाटे का सौदा बताकर खास आदमी को सुविधाएं उपलब्ध कराने का भेद-भाव जारी है। जिस पर लगाम लगाने की जरूरत है।

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