लेख

जब व्यवस्था से सवाल पूछती है अदालत

कुमार कृष्णन

किसी परिवार का नवजात बच्चा अस्पताल से गायब हो जाए और उसकी तलाश शुरू होने से पहले ही दो महीने गुजर जाएं तो यह केवल एक बच्चे के गायब होने की कहानी नहीं रहती। यह उस व्यवस्था की संवेदनशीलता की परीक्षा बन जाती है, जिसके पास नागरिक अपनी सबसे बड़ी पीड़ा लेकर जाता है। और जब उसी जिले में किसी व्यक्ति को पर्याप्त सत्यापन के बिना ‘असामाजिक तत्व’ मानकर उसकी आवाजाही पर रोक लगा दी जाए, तो सवाल और बड़ा हो जाता है—क्या कानून का इस्तेमाल नागरिक की सुरक्षा के लिए हो रहा है या कभी-कभी नागरिक पर ही नियंत्रण का औजार बन रहा है?
सितंबर 2026 में पटना उच्च न्यायालय के दो फैसलों ने नालंदा के संदर्भ में प्रशासन और पुलिस की कार्यप्रणाली के इसी विरोधाभास को सामने रखा है। एक मामले में अस्पताल से नवजात के कथित गायब होने पर प्राथमिकी दर्ज करने में लगभग दो महीने की देरी को अदालत ने गंभीरता से लिया और संबंधित थानाध्यक्ष को विशेष जांच दल से अलग कर दूसरे स्थान पर स्थानांतरित करने का निर्देश दिया। दूसरे मामले में अदालत ने बिहार अपराध नियंत्रण अधिनियम, 2024 के तहत दो लोगों पर लगाए गए प्रतिबंधों को रद्द कर दिया और राज्य को प्रत्येक को एक लाख रुपये मुआवजा तथा दस हजार रुपये मुकदमे का खर्च देने का आदेश दिया।
दोनों मामले अलग हैं। आरोप अलग हैं। कानून की धाराएं अलग हैं लेकिन दोनों के बीच एक साझा प्रश्न है—सत्ता को मिले अधिकारों का इस्तेमाल कितनी सावधानी, पारदर्शिता और कानूनी प्रक्रिया के साथ किया जा रहा है?
नवजात के मामले में अदालत के सामने जो तस्वीर आई, वह विशेष रूप से चिंताजनक है। बच्चे के पिता ने अदालत के समक्ष आरोप लगाया कि शिकायत दर्ज कराने के लिए उन्हें इधर-उधर भटकना पड़ा और प्राथमिकी करीब दो महीने बाद दर्ज हुई। उन्होंने पुलिस पर डीएनए जांच के दौरान धमकी देने और शुरुआती जांच में साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ की आशंका भी जताई। ये आरोप अभी जांच के विषय हैं, इसलिए इन्हें अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता लेकिन अदालत ने पुलिस अधीक्षक को इन आरोपों की जांच करने और यह पहचानने को कहा कि प्राथमिकी दर्ज करने या शुरुआती कार्रवाई में किस अधिकारी की भूमिका रही।
अदालत की चिंता केवल इस मामले तक सीमित नहीं थी। सुनवाई के दौरान पुलिस महानिदेशक द्वारा एक राज्य स्तरीय सम्मेलन में बताए गए आंकड़े का उल्लेख हुआ कि बिहार में एक वर्ष में 14,500 से अधिक बच्चों के लापता होने की रिपोर्ट आई थी। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में शुरुआती समय बेहद महत्वपूर्ण होता है। उसने थानों की कमान संवेदनशील अधिकारियों को देने और अधिकारियों की संवेदनशीलता की जांच करने की जरूरत पर भी जोर दिया।
यह टिप्पणी पुलिस व्यवस्था के एक बुनियादी प्रश्न की ओर ले जाती है। पुलिस स्टेशन केवल अपराध दर्ज करने की जगह नहीं है। वह नागरिक और राज्य के बीच पहला संस्थागत संपर्क है। किसी गरीब, ग्रामीण, महिला, बच्चे या हाशिये के परिवार के लिए थाना ही अक्सर न्याय की पहली सीढ़ी होता है। अगर वहीं शिकायत को गंभीरता से नहीं लिया जाता, तो कानून की बाकी सीढ़ियां उसके लिए बहुत दूर हो जाती हैं।
नवजात के मामले में अदालत ने ‘गोल्डन आवर’ की अहमियत बताई। अपराध की जांच में शुरुआती घंटे और दिन इसलिए महत्वपूर्ण होते हैं क्योंकि सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल लोकेशन, अस्पताल के रिकॉर्ड, गवाहों की स्मृति और अन्य डिजिटल या भौतिक साक्ष्य समय के साथ कमजोर हो सकते हैं। किसी बच्चे के गायब होने के मामले में यह देरी केवल जांच की गति को प्रभावित नहीं करती, बल्कि बच्चे को सुरक्षित वापस पाने की संभावना से भी जुड़ जाती है।
इसीलिए प्राथमिकी को पुलिस की महज एक प्रशासनिक औपचारिकता मानना खतरनाक है। प्राथमिकी जांच की औपचारिक शुरुआत का द्वार है। उस द्वार को देर से खोलने का अर्थ कई बार यह हो सकता है कि जांचकर्ता उस समय पहुंचा जब महत्वपूर्ण निशान पहले ही मिट चुके थे।
अब दूसरे मामले पर आइए। पटना हाई कोर्ट ने 11 सितंबर को नालंदा के दो निवासियों—शशि कुमार उर्फ फूकन और अजय सिंह—के खिलाफ बिहार अपराध नियंत्रण अधिनियम के तहत लगाए गए प्रतिबंधों को रद्द कर दिया। अदालत के अनुसार जिला प्रशासन ने कानून की अपेक्षित प्रक्रिया और आवश्यक संतोष के आधार पर आदेश पारित नहीं किया था। अदालत ने पाया कि आदेशों की भाषा और आधार इतने समान थे कि वे ‘कट एंड पेस्ट’ जैसे प्रतीत होते थे।
मामला केवल इतना नहीं था कि प्रशासन ने दो व्यक्तियों की गतिविधियों पर रोक लगा दी। अदालत ने यह भी देखा कि पुलिस रिपोर्ट में जिन आरोपों का उल्लेख था, उनके सत्यापन की सामग्री रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं थी। अदालत ने कहा कि पुलिस अधीक्षक, अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी और संबंधित थाना प्रभारी ने आरोपों के सत्यापन के बिना जल्दबाजी में कार्रवाई की। दोनों व्यक्तियों को तीन महीने तक ऐसे प्रतिबंध झेलने पड़े, जिनमें सप्ताह के तीन दिन दूर स्थित थाने में हाजिरी देने और क्षेत्र से बाहर जाने पर पाबंदी जैसी शर्तें थीं।
यहां कानून और प्रशासनिक विवेक के बीच की महीन रेखा दिखाई देती है। किसी राज्य को ऐसे कानूनों की जरूरत हो सकती है जो सार्वजनिक व्यवस्था के गंभीर खतरे से निपटने में सक्षम हों। लेकिन जितनी बड़ी शक्ति होगी, उतनी ही बड़ी प्रक्रिया संबंधी सावधानी भी जरूरी होगी। क्योंकि एहतियाती कार्रवाई में अदालत का सामान्य आपराधिक मुकदमे जैसा पूरा परीक्षण पहले नहीं होता। इसलिए प्रशासनिक संतोष को ठोस सामग्री, सत्यापन और कानून की निर्धारित प्रक्रिया पर आधारित होना चाहिए।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक व्यवस्था एक ही चीज नहीं हैं। हर अपराध या हर झगड़ा अपने आप सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा नहीं बन जाता।
यहीं पुलिस और प्रशासन के चरित्र की असली परीक्षा होती है। अपराध रोकना पुलिस का दायित्व है, लेकिन अपराध रोकने के नाम पर प्रक्रिया को दरकिनार करना पुलिस की शक्ति को कमजोर करता है। प्रशासन को अधिकार इसलिए दिए जाते हैं कि उनका विवेकपूर्ण इस्तेमाल हो, न कि इसलिए कि वे सत्यापन से मुक्त हो जाएं।
इन दोनों मामलों को एक साथ देखने पर व्यवस्था की दो तस्वीरें सामने आती हैं। एक तरफ एक परिवार अपने बच्चे की तलाश में थाने के चक्कर लगाता है और प्राथमिकी दर्ज कराने में लंबा समय लग जाता है। दूसरी तरफ किसी व्यक्ति पर कार्रवाई के लिए पुलिस रिपोर्ट प्रशासन तक पहुंचती है और अदालत को बाद में पूछना पड़ता है कि उस रिपोर्ट का सत्यापन कहां है।
इससे पुलिस के चरित्र पर एक गंभीर बहस जरूरी हो जाती है। पुलिस का चरित्र केवल अपराधियों को पकड़ने की संख्या से नहीं बनता। वह इस बात से बनता है कि पुलिस शिकायतकर्ता के साथ कैसा व्यवहार करती है, प्राथमिकी कब दर्ज करती है, साक्ष्यों को कैसे सुरक्षित रखती है, जांच कितनी निष्पक्षता से करती है और अपने ही स्तर पर हुई गलती को स्वीकार कर सुधारने की कितनी क्षमता रखती है।
इसी तरह प्रशासन का चरित्र केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने से नहीं बनता। वह इस बात से भी बनता है कि किसी नागरिक की स्वतंत्रता पर रोक लगाने से पहले अधिकारी कानून पढ़ते हैं या नहीं, पुलिस की रिपोर्ट को आंख मूंदकर स्वीकार करते हैं या उसकी स्वतंत्र पुष्टि करते हैं, और नागरिक के जवाब को वास्तव में सुनते हैं या केवल कागज पर दर्ज कर देते हैं।
पटना हाई कोर्ट का नालंदा वाला फैसला इसी कारण महत्वपूर्ण है। अदालत ने राज्य पर मुआवजे का भार डालने के साथ यह भी कहा कि जिम्मेदार अधिकारियों से लागत और मुआवजे की राशि वसूलने की प्रक्रिया अपनाई जाए।  यह संदेश प्रशासनिक जवाबदेही के लिए महत्वपूर्ण है—गलत शक्ति-प्रयोग की कीमत अंततः जनता के खजाने से ही क्यों चुकाई जाए?
हालांकि, न्यायिक हस्तक्षेप को पुलिस सुधार का विकल्प नहीं माना जा सकता। हर नागरिक को न्याय पाने के लिए हाई कोर्ट तक पहुंचना संभव नहीं है। लोकतांत्रिक व्यवस्था की सफलता इसी में है कि थाना स्तर पर ही कानून की पहली कसौटी पूरी हो जाए।
इसके लिए कुछ बुनियादी बदलाव जरूरी हैं। थानाध्यक्षों की नियुक्ति में केवल प्रशासनिक अनुभव नहीं, संवेदनशीलता और शिकायत निस्तारण की क्षमता भी देखी जानी चाहिए। प्राथमिकी की निगरानी के लिए डिजिटल प्रणाली प्रभावी हो। गंभीर मामलों में शुरुआती साक्ष्य सुरक्षित करने की जिम्मेदारी तय हो। वैज्ञानिक जांच और फोरेंसिक क्षमता बढ़ाई जाए और जहां पुलिस की भूमिका ही सवालों के घेरे में हो, वहां जांच की स्वतंत्रता पर विशेष ध्यान दिया जाए।
सबसे महत्वपूर्ण है पुलिसकर्मी को यह समझाना कि नागरिक उसके अधिकार क्षेत्र का विषय नहीं, कानून के संरक्षण का अधिकारी है। वर्दी राज्य की शक्ति का प्रतीक है, लेकिन वही वर्दी नागरिक के भरोसे की भी जिम्मेदार है।
नालंदा के दोनों मामलों में अदालत ने अलग-अलग परिस्थितियों में प्रशासनिक शक्ति की सीमाओं की ओर ध्यान दिलाया है। एक मामले में सवाल था—शिकायत पर कार्रवाई में इतनी देर क्यों? दूसरे में सवाल था—कार्रवाई करने से पहले आरोपों का सत्यापन क्यों नहीं?
इन दोनों सवालों के बीच ही सुशासन की असली कसौटी छिपी है।
पुलिस की ताकत केवल गिरफ्तारी में नहीं, समय पर प्राथमिकी में भी है। प्रशासन की ताकत केवल प्रतिबंध लगाने में नहीं, कानून के भीतर रहकर निर्णय लेने में है। और लोकतंत्र की ताकत केवल कानून बनाने में नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने में है कि कानून का इस्तेमाल नागरिक की गरिमा और स्वतंत्रता के साथ हो।
अदालतें जब ऐसी टिप्पणियां करती हैं तो उनका उद्देश्य केवल किसी एक अधिकारी को कटघरे में खड़ा करना नहीं होता। वे व्यवस्था को यह याद दिलाती हैं कि कानून से मिली शक्ति, कानून से ही बंधी होती है।
और शायद पुलिस सुधार का सबसे पहला प्रश्न यही है—थाने में बैठा अधिकारी नागरिक को शिकायत लेकर आया व्यक्ति समझता है या अपने अधिकार क्षेत्र में आया कोई बोझ?
इस सवाल का जवाब ही अंततः पुलिस और प्रशासन में जनता के भरोसे का भविष्य तय करेगा।

कुमार कृष्णन