नदी-तालाबों की अहमियत कब समझेगा प्रतापगढ़ प्रशासन

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rivers and ponds in pratapgarhप्रतापगढ़ का पानी और प्रशासन

बुंदेलखण्ड का सूखा, एक नजीर बन चुका है। सो, स्थानीय संगठनों की पहल पर उत्तर प्रदेश का शासन कुछ नजीर पेश करने के मूड में आता दिखाई दे रहा है। उसने वहां 100 परंपरागत तालाबों के पुनर्जीवन की घोषणा की है; 50 तालाब महोबा में और 50 उत्तर प्रदेश के हिस्से वाले शेष बुंदेलखण्ड में। खेत-तालाबों को लेकर एक घोषणा वह पहले कर ही चुका है। मनरेगा के तहत् बुंदेलखण्ड में 4,000 हजार अन्य तालाबों के पुनर्जीवन की भी घोषणा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कर आये हैं। कहा जा रहा है कि मानसून आने से पूर्व यह काम पूरा कर लिया जायेगा। इन घोषणाओं को लेकर स्थानीय स्वयंसेवी संगठन भी अपनी पीठ ठोक रहे हैं और उत्तर प्रदेश शासन भी। घोषणा यदि बिना भ्रष्टाचार और समय पर ज़मीन पर उतरती है, तो यह पीठ ठोकने का काम है भी।
ये प्रयास, यह आभास दे सकते हैं कि उत्तर प्रदेश शासन ने नीतिगत तौर पर मान लिया है कि वर्षा जल संचयन ढांचे ही बुंदेलखण्ड जल समस्या का मूल समाधान हैं। किंतु केन-बेतवा नदी जोङ को लेकर जो सहमति उत्तर प्रदेश शासन ने प्रकट की है, उसे देखकर आप यह नहीं कह सकते। उत्तर प्रदेश के ज़िला प्रतापगढ़ में जो रवैया राज्य शासन और स्थानीय प्रशासन ने अख्तियार किया है, उसे देखकर तो शायद आप तालाबों और नदियों के प्रति उनकी समझ पर ही सवाल खङा कर दें।
विषम जल परिस्थितियां
गौरतलब है कि प्रतापगढ़, पानी की विषम परिस्थितियों वाला ज़िला है। जिले के कुण्डा, बाबागंज और बिहार विकास खण्ड के कई इलाके जल प्लावन से हलकान रहता है, तो सदर तहसील का इलाका भूजल स्तर के लगातार नीचे जाने के खतरे से । शिवगढ़ विकास खण्ड, भूजल में बढ़ते फ्लोराइड और इसके कारण फ्लोरीसिस बीमारी से प्रभावित गांवों की बढ़ती संख्या वाला विकास खण्ड है। ज़िला प्रतापगढ़ के कई गांवों के भूजल स्त्रोत खारे हो चुके हैं। कई में भारी धातु तत्व सीमा लांघ गया है। प्रतापगढ से गुजरने वाली मुख्य नदी-सई, प्रदूषण से जूझ रही है। बकुलाही नदी का मूल स्त्रोत जलाभाव के संकट से ग्रस्त है। इस व्यापक जल विषमता के बीच प्रतापगढ़ के पौरुष को भीतर से जीवित करने की सामाजिक कोशिशें अंगङाई लेती भी दिखाई दे रही हैं, किन्तु उनके कारण स्थानीय प्रशासन कुछ चेता हो; ऐसा दिखाई नहीं दे रहा।
सई नदी के प्रदूषण को लेकर कई सजग कार्यकर्ताओं ने चेतना यात्रायें की। फ्लोरीसिस प्रभावित गांवों की सूची ज़िलाधीश को सौंपी। समाज शेखर की पहल पर ’बकुलाही नदी पुनरोद्धार अभियान’ और ’तालाब बचाओ अभियान’ चलाया गया। तालाबों के रकबे का राजस्व रिकाॅर्ड और मौजूद रकबे का अंतर प्रशासन के सामने रखा गया। क्या प्रशासन चेता ? स्थिति देखिए।
चैतन्य समाज: शिथिल प्रशासन
बदर बीर बाबा तालाब: कुण्डा तहसील का गांव शेखपुर चैरासी में एक तालाब है -बदर बीर बाबा तालाब। बदर बीर का रकबा राजस्व रिकाॅर्ड में भी कम पाया गया और मौके पर भी। बदर बीर बाबा तालाब का वर्तमान राजस्व रिकाॅर्ड नौ बीघे है, जबकि पूर्व रिकाॅर्ड में रकबा 18 बीघे है। तहसील दिवस पर आशुतोष शुक्ला के आवेदन से चेते उप जिलाधिकारी (कुण्डा) जे पी मिश्र ने तालाब को पुनः 18 बीघे के रकबे पर कायम करने का आदेश दिया भी, तो बदले में आवेदक को प्रधानपति की धमकी मिली। तालाबों पर कब्जा करने वालों पर रासुका तक लगाने की मांग की गई, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। धमकी और रकबा… दोनो जस के तस हैंै।
चनौरा तालाब: देल्हूपुर बाजार से सटी ग्रामसभा खरवई 20 बीघा रकबे वाले प्राचीन चनौरा तालाब की गाद निकासी का काम समाज ने तो शुरु कर दिया, लेकिन अपील के बावजूद प्रशासन सहयोग को आगे नहीं आया। राजस्व रिकाॅर्ड में इसका रकबा 55 बीघा है। मौके पर मात्र 22 बीघा ही बचा है; शेष पर दबंगों का कब्जा है। स्थानीय पानी कार्यकर्ता और ’मुख्यमंत्री जल बचाओ समिति’ के सदस्य समाज शेखर कहते हैं कि तहसील रानीगंज के स्थानीय अधिकारियों से लेकर मण्डलायुक्त को इसकी जानकारी दी गई है। चनौरा तालाब से संबंधित आराजी संख्या 1129, 1302, 1372 और 1872 दिखाई गई है। गत् दो वर्षों में कई बार चनौरा तालाब की पैमाइश कराकर सीमांकन कराने का अनुरोध किया गया है, किंतु प्रशासन चुप है। क्यों ?
शिवगंगा तालाब: तहसील सदर के गांव पूरे तोरई के राजस्व ग्राम पूरे वैष्णव में स्थित भयहरणनाथ धाम की धार्मिक मान्यता व्यापक है। इससे सटे शिवगंगा तालाब का रकबा दस एकङ है। खाता संख्या 226 में खसरा संख्या 493 ड पर दर्ज रकबा 0120 हेक्टेयर है। इस दर्ज रकबे पर अतिक्रमण की आशंका से भयहरणनाथ धाम की विकास समिति ने प्रशासन को अवगत कराया है। क्या कोई कार्रवाई हुई ? नहीं, धाम पर शीश नवाने और प्रसाद खाने तो कई प्रशासनिक अधिकारी आये, लेकिन शिवगंगा तालाब की स्थिति यथावत है।
आयुक्त की भी नहीं सुनता जिला प्रशासन
गौरा गांव के तालाब: तहसील सदर के ही गौरा गांव के राजस्व रिकाॅर्ड में 10 तालाबों के होने की जानकारी प्रशासन को दी; बताया कि वर्तमान राजस्व रिकाॅर्ड में भले ही पांच तालाब हों, लेकिन 1359 फसली वर्ष के रिकाॅर्ड में 10 तालाब दर्ज थे। बाकी तालाब कहां गये ? इस बाबत् स्थानीय पानी कार्यकर्ता समाज शेखर ने जिलाधिकारी व आयुक्त को कई पत्र लिखे। बताया कि इससे बकुलाही नदी के पुनरोद्धार में भी मदद मिलेगी। गांव के लोगों ने जिलाधिकारी को ज्ञापन भी सौंपा। इस पर जांच व नियमानुसार कार्यवाही का पहला आदेश देते हुए आयुक्त महोदय ने जिलाधिकारी, प्रतापगढ़ के नाम पहली चिट्ठी नौ सितम्बर, 2015 को लिखी। दूसरी चिट्ठी, एक जनवरी, 2016 को भेजी। 20 मई, 2016 को अधिवक्ता श्री बाल कृष्ण पाण्डेय ने जिलाधिकारी को इसे बारे में बाकायदा विविध नोटिस भी दिया। इसका संज्ञान लेते हुए आयुक्त श्री राजन शुक्ला ने 25 मई, 2016 को जिलाधिकारी के नाम पुनः तीसरी चिट्ठी रवाना की, लेकिन जिलाधिकारी ने कोई तेजी नहीं दिखाई।
नेताओं की समझ
नदियों पर समाज द्वारा जगाई संवेदना का हाल देखिए। सई आज भी प्रदूषणयुक्त है। सई किनारे के निवासी आज भी प्रदूषित भूजल पीने को अभिशप्त हैं। सई नदी की प्रदूषण मुक्ति की गुहार आज भी कायम है।

स्थानीय लोगों को याद है कि पूर्व सांसद स्व. राजा श्री दिनेश सिंह के कार्यकाल में प्रतापगढ़ में भयानक बाढ़ आई थी। उस बाढ़ से निजात के लिए स्थानीय तालाबों का पानी काटकर नदी में बहाने के लिए उनमें निकास नाले बना दिए गये थे। गांवों को बाढ़ से बचाने के लिए बकुलाही नदी का लूप संपर्क काटकर सीधे बहा दी गई थी। बाढ़ तो चली गई, लेकिन तालाबों के निकास नाले आज भी कायम है। इन निकास नालों के चलते तालाबों में क्षमता के अनुरूप पानी आगे कभी नहीं रुक पाया; परिणामस्वरूप, अधिकांश तालाब फरवरी आते-आते सूखने लगे। इस सूख का फायदा उठाकर कई तालाबों पर स्थानीय दबंगों ने कब्जा कर लिया। उत्तर प्रदेश राजस्व विभाग की अधिसूचना और उत्तर प्रदेश हाईकोर्ट के प्रयास के बावजूद कब्जे आज भी बरकरार हैं। एक समय आये जिलाधिकारी ने कुछ कब्जे हटवाये भी, इससे पहले कि कब्जामुक्त भूमि का पुनरोद्धार होता, उन्हे हटा दिया गया। उनके जाने के बाद कब्जामुक्त तालाबों का फिर कोई पुरसाहाल नहीं बचा; लिहाजा, उनके जाने के बाद कब्जामुक्त ज़मीन मे से काफी पर फिर कब्जा हो गया।
प्रतापगढ़ के नदी कार्यकर्ता जानते हैं कि नदी, नहर या नाले में फर्क होता है। यह बात गंगा बाढ़ आयोग भी जानता है, पर उत्तर प्रदेश शासन स्थानीय प्रशासन और स्थानीय नेता नहीं जानते। वे एक बार फिर राजा दिनेश सिंह जी जैसी ही गलती दोहराने जा रहे हैं।
बकुलाही को 12 मीटर में समेटने की तैयारी
ताजा संदर्भ पर गौर कीजिए। जिला प्रतापगढ़ के विकास खण्ड – कुण्डा, बाबागंज और बिहार में जल प्लावन की स्थिति रहती है। निदान के रूप में स्थानीय राजनीतिज्ञ राजा भैया और अक्षय प्रताप सिंह को स्थानीय नदी बकुलाही की खुदाई का विकल्प समझ में आया। इनके प्रयास से वर्ष 2006 में तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री मुलायम सिंह यादव ने 16 करोङ की एक परियोजना को मंजूरी भी दे दी थी। परियोजना के तहत् 80 लाख रुपये खर्च करके भयहरणनाथ धाम से कमासिन धाम की 13 किलोमीटर लंबाई में नदी खोद भी दी गई थी। फिर गंगा बाढ़ आयोग (पटना) ने प्रतिकूल मानते हुए खुदाई पर परियोजना पर रोक लगा दी थी। मायावती शासन काल में इस रोक की पालना की गई।

उलट समझ देखिए कि गंगा बाढ़ आयोग द्वारा रोक के आधार को नजरअंदाज करके उत्तर प्रदेश शासन ने कई हजार लाख के नये बजट के साथ यह परियोजना अब पुनः शुरु कर दी है। सुनते हैं कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पर्यावरण के छात्र रहे हैं। ताज्जुब है कि उनके शासन काल में तीन स्थानीय विकास खण्डों के जल प्लावन के समाधान पूरी 114 किलोमीटर लंबी बकुलाही को 12 मीटर की चैङाई में खोदने की योजना के तौर पर मंजूर किया गया है ! खबर है कि बीती नौ मई को इस परियोजना की पट्टिका का शिलान्यास भी कर दिया गया है।
निर्मूल नहीं आशंका
स्थानीय राजनेता दावा कर रहे हैं कि इससे 10 लाख लोगों को लाभ होगा। नदी सिमट जायेगी, तो बची जमीन लोगों की खेती के काम आयेगी। मेरा प्रश्न है कि क्या इससे नदी को लाभ होगा ? इस प्रश्न के उत्तर में बकुलाही नदी पुनरोद्धार अभियान प्रमुख समाज शेखर ने आशंका जताई है कि गहरीकरण के इस काम के कारण कहीं हमारे गांवों का पानी नदी में बहकर न चला जाये।
यह आशंका सत्य है। बगल के जिला अमेठी की मालती नदी में खुदाई का नतीजा स्थानीय भूजल में गिरावट के रूप में सामने आया है। लोग सूखते कुएं और नकाम होते ट्युबवैलों से परेशान हैं। आगे चलकर बकुलाही किनारे के लोग भी होंगे। गौर कीजिए कि निदान के रूप में मालती नदी पर फिर ठेके हुए। नदी में ’स्टाॅप डैम’ बनाने के ठेके दिए गये। यह नदी पुनर्जीवन का तरीका है या नदी के नाम पर बजट, भूजल गिरावट और भूमि हङपने का तरीका ? समाजशेखर मानते हैं कि यदि गहरीकरण का अपरिहार्य ही हो, तो नदी के गहरीकरण सपाट न करके तरंगाकार में हो। पाठकगण सोचें कि उचित क्या है और अनुचित क्या ?

क्या मुख्यमंत्री जी गौर करेंगे ?
मेरा मानना है कि स्थानीय नेताओं को समझना चहिए कि नदी जल के कारण आई बाढ़ नुकसान नहीं करती। नुकसान करती है बाढ़ की तीव्रता और टिकाऊपन। असल में तो बाढ़ खेत को उर्वरा बनाती है। यदि कुण्डा में मिर्च और गोभी की खेती अच्छी रही, तो इसमें कुछ योगदान इस नदी का भी है। फिर भी यदि जल प्लावन यदि एक स्थाई समस्या ही बन गई है, तो समझना चाहिए कि जल निकासी मार्गों को बाधारहित बनाना, छोटी वनस्पति वाले क्षेेत्रों का विकास तथा जल संचयन ढांचों के रूप में तालाबों का पुनर्जीवन करना जल प्वालन का भी समाधान हैं और जलाभाव का भी। नदी गहरीकरण, उचित समाधान नहीं है।
उन्हे याद रखना चाहिए कि हर नदी का गहरीकरण उचित नहीं होता। इसका उचित-अनुचित नदी के एक्युफर की बनावट पर निर्भर करता है। उन्हे यह भी समझना चाहिए कि नदी के तल की रेत एक ऐसे स्पंज की तरह होती है, जिसमें पानी सोखकर रखने की बङी क्षमता होती है। यदि तल की वह रेत निकाल बाहर की जाये, तो नदी यह क्षमता खो बैठती। क्या नदी की इस क्षमता का खो जाना किसी भी नदी किनारे के वासियों को मंजूर करना चाहिए ??

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव बंुदेलखण्ड में चन्द्रावल और लखेरी नदी के पुनर्जीवन के काम में तेजी लाने की बात कर रहे हैं, लेकिन प्रतापगढ़ की बकुलाही गहरीकरण की यह परियोजना तो नदी को नाला बनाने का काम है। क्या मुख्यमंत्री जी गौर करेंगे ?

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