लेखक परिचय

अरुण तिवारी

अरुण तिवारी

समाज, प्रकृति और विज्ञान

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समाज का प्रकृति एजेण्डा जगाती एक पुस्तक समीक्षक: अरुण तिवारी   पुस्तक का नाम: समाज, प्रकृति और विज्ञान लेखक: श्री विजयदत्त श्रीधर, श्री राजेन्द्र हरदेनिया, श्री कृष्ण गोपाल व्यास, डाॅ. कपूरमल जैन, श्री चण्डी प्रसाद भट्ट संपादक: श्री राजेन्द्र हरदेनिया प्रकाशक: माधवराव सप्रे स्मृति समाचारप संग्रहालय, एवम् शोध संस्थान, माधवराव सप्रे मार्ग (मेन रोड नंबर… Read more »

पर्यावरण और विकास

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05 जून – विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष पर्यावरणीय समृद्धि की चाहत, जीवन का विकास करती है, विकास की चाहत, सभ्यताओं का। सभ्यता को अग्रणी बनाना है, तो विकास कीजिए। जीवन का विकास करना है, तो पर्यावरण को समृद्ध रखिए। स्पष्ट है कि पर्यावरण और विकास, एक-दूसरे का पूरक होकर ही इंसान की सहायता कर… Read more »



उत्सव मनायें या रुदन गायें ?

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चार जून – गंगा दशहरा 2017 अरुण तिवारी कहते हैं कि प्रधानमंत्री श्री मोदी जी जब बोलते हैं, तो उनकी बोली में संकल्प दिखाई देता है। गंगा को लेकर कहे उनके शब्दों को सामने रखें। स्वयं से सवाल पूछें कि गंगा को लेकर यह बात कितनी सत्य है ? गौर कीजिए कि मोदी जी ने… Read more »

अब छोड़ भी दीजिये न तम्बाकू

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तंबाकू कंपनियों के कचरे और आपराधिक विश्लेषण बताते हैं तंबाकू के दुष्प्रभाव सिर्फ शारीरिक नहीं है, पर्यावरणीय और सामाजिक भी है। भारत में ज्यादातर किशोर जिज्ञासावश, बङों के अंदाज से प्रभावित होकर, दिखावा अथवा दोस्तों के प्रभाव में पङकर तंबाकू के शिकार बनते हैं। कम उम्र में तंबाकू के नशे में फंसने वाले नियम-कायदों को तोङने से परहेज नहीं करते। ऐसे किशोर मन में अपराधी प्रवृति के प्रवेश की संभावना अधिक रहती है। ऐसे चौतरफा दुष्प्रभाव…चौतरफा रोकथाम की मांग करते हैं। ऐसे प्रयास हुए भी हैं, लेकिन नतीजे अभी भी नाकाफी ही हैं ।

बिहार गाद संकट: समाधान, पहल और चुनौतियां

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जब तक भगीरथी पर टिहरी बांध, गंगा पर भीमगौड़ा, नरोरा जैसे ढांचे नहीं थे, तब तक यह बैक्टीरियोफाॅज हिमालय में पैदा होकर बिहार और बंगाल तक आते थे। बहुत संभव है कि इनके कारण उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड और बंगाल के गंगा किनारे के भूजल की निर्मलता भी सुनिश्चित होती रही हो। नीरी की एक रिपोर्ट बताती है कि अब मात्र 10 प्रतिशत बैक्टीरियोफाॅज ही नीचे आते हैं। शेष 90 प्रतिशत टिहरी की झील में बंधकर रह जाते हैं। जाहिर है कि टिहरी बांध द्वारा पैदा की रुकावट के कारण अब यह बैक्टीरियोफाॅज और हिमालय से निकली विशिष्ट गुणों वाली सिल्ट अब बिहार तक नहीं पहुंचती।

नर्मदा कार्ययोजना : कुछ विचारणीय सुझाव

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किसी भी कार्ययोजना के निर्माण से पहले नीति बनानी चाहिए। नीतिगत तथ्य, एक तरह से स्पष्ट मार्गदर्शी सिद्धांत होते हैं। एक बार दृष्टि साफ हो जाये, तो आगे विवाद होने की गुंजाइश कम हो जाती है। इन सिद्धांतों के आलोक में ही कार्ययोजना का निर्माण किया जाना चाहिए। कार्ययोजना निर्माताओं और क्रियान्वयन करने वालों को किसी भी परिस्थिति में तय सिद्धांतों की पालना करनी चाहिए। ऐसा करने से कार्ययोजना हमेशा अनुकूल परिणाम लाने वाली होती है।

एकमात्र तैरती झील लोकटक

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वनस्पतियों की वृद्धि को स्थानीय लोकटक पनबिजली परियोजना ने एक और तरह से दुष्प्रभावित किया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, पहले जब स्थानीय नदी – खोरदक तथा अन्य धाराओं में बाढ़ आती थी, तो उनका प्रवाह उलट जाता था। वह उलटा प्रवाह आकर लोकटक की सतह पर फैल जाता था। नदियों से आया यह जल कई ऐसे पोषक और धातु तत्व अपने साथ लाता था, जो सूखे मौसम में नीचे जमकर उर्वरा क्षमता बढ़ाते थे। वनस्पतियों की वृद्धि अच्छी होती थी; अब कम होती है।

धरती बेहद उदास है..

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२२ अप्रैल – पृथ्वी दिवस पर विशेष कहते हैं, इन दिनों धरती बेहद उदास है इसके रंजो-गम के कारण कुछ खास हैं। कहते हैं, धरती को बुखार है; फेफङें बीमार हैं। कहीं काली, कहीं लाल, पीली, तो कहीं भूरी पङ गईं हैं नीली धमनियां। कहते हैं, इन दिनों…. कहीं चटके… कहीं गादों से भरे हैं… Read more »

आइये, संजो लें विरासत के ये निशां

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आंकङों से इतर विरासत का वैश्विक पक्ष चाहे जो हो, भारतीय पक्ष यह है कि विरासत सिर्फ कुछ परिसंपत्तियां नहीं होती। बाप-दादाओं के विचार, गुण, हुनर, भाषा, बोली और नैतिकता भी विरासत की श्रेणी में आते हैं। संस्कृृृृृति को हम सिर्फ कुछ इमारतों या स्थानों तक सीमित करने की भूल नहीं कर सकते। भारतीय संास्कृतिक विरासत का मतलब ‘अतिथि देवो भवः’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ से लेकर ‘प्रकृति-माता, गुरु-पिता तक है। गौ, गंगा, गीता और गायत्री आज भी हिंदू संस्कृति के प्रमुख निशान माने जाते हैं।

घर-घर शौचालय पर बहस ज़रूरी

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समझने की बात है कि एकल होते परिवारों के कारण मवेशियों की घटती संख्या और परिणामस्वरूप घटते गोबर की मात्रा के कारण जैविक खेती पहले ही कठिन हो गई है। कचरे से कंपोस्ट का चलन अभी घर-घर अपनाया नहीं जा सका है। अतः गांधी जयंती पर स्वच्छता, सेहत, पर्यावरण, गो, गंगा और ग्राम रक्षा से लेकर आर्थिकी की रक्षा के चाहने वालों को पहला संदेश यही है कि गांवों में ‘घर-घर शौचालय’ की बजाय, ‘घर-घर पानी निकासी गड्ढा’ और ‘घर-घर कंपोस्ट’ के लक्ष्य पर काम करें।