-अशोक “प्रवृद्ध”
सुनिए, और जरा कान खोलकर सुनिए! इस देश में गजब हो रहा है। सदियों से जो जहर ब्रिटिश ईसाई हुकूमत ने हमारी रगों में भरा, जिसे इतिहास का नाम देकर स्कूल- कॉलेजों की किताबों में ठूसा गया, आज भी उसी फेक नैरेटिव की आरती उतारी जा रही है। ताज्जुब तो देखिए, गोरे चले गए, लेकिन उनकी दी हुई वह अशिक्षा और जातीय विद्वेष की घुट्टी आज भी हमारे सिस्टम के गले के नीचे उतर रही है। सच तो यह है कि अंग्रेजों ने भारत को सिर्फ लूटा नहीं, बल्कि भारत की आत्मा को खंडित करने के लिए जाति और अज्ञानता का वह जाल बुना, जिसमें हम आज भी फँसे हैं। यह कोई इत्तेफाक नहीं था, यह एक सोची-समझी ईसाई मिशनरी और ब्रिटिश शासन की चाल थी ताकि सनातनी समाज खुद को हीन समझे। और विडंबना देखिए? आजादी के अमृत काल में भी वही सड़ा-गला नैरेटिव सच्चा इतिहास बनकर सीना ताने खड़ा है। क्या यह बौद्धिक गुलामी नहीं है?
क्या यह सरकार की मौन सहमति और जनभावना का अपमान नहीं है? बिहार, उत्तरप्रदेश, असम आदि विधानसभा चुनावों में चुनाव लड़ चुकी और आगे भी चुनाव लड़ने की इच्छुक एक नई राजनितिक दल राष्ट्रीय सनातन पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष विश्वजीत सिंह अनंत ने पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर जब सरकार से कहा कि इस ऐतिहासिक पाप के लिए सार्वजनिक क्षमा मांगी जाए, तो उम्मीद थी कि सत्ता के गलियारों में हलचल होगी। लेकिन हुआ क्या? ढाक के वही तीन पात। सरकार ने जनभावनाओं को रद्दी की टोकरी में डाल दिया। यह उपेक्षा सिर्फ एक पार्टी की नहीं, बल्कि उस हर सनातनी की, है जो अपनी जड़ों की तलाश में है। सवाल यह है कि आखिर दिल्ली की सत्ता को किन आकाओं का डर है कि वे इस झूठ को झुठलाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे? हद हो गई है, आखिर स्वतंत्रता विरोधियों का महिमामंडन करने की मानसिकता पर रोक लगाने के लिए कार्रवाई करने से कौन रोक रहा है? अब तो पराकाष्ठा हो गई है। शिक्षण संस्थानों में उन चेहरों को चमकाया जा रहा है जिन्होंने कभी देश की आजादी की राह में रोड़े अटकाए थे। जो भारत की एकता के खिलाफ थे, उन्हें नायक बनाया जा रहा है। स्कूल-कॉलेजों के सिलेबस में ऐसे लोगों का महिमामंडन दरअसल आने वाली पीढ़ियों के साथ किया जा रहा, सबसे बड़ा विश्वासघात है। यह शिक्षा नहीं, बल्कि वैचारिक जहर की खेती है।
राष्ट्रीय सनातन पार्टी ने साफ कर दिया है- अब यह बर्दाश्त नहीं होगा। इतिहास के पृष्ठों पर जमी धूल झटकनी ही होगी। अगर सरकार अपनी शुतुरमुर्गी चाल से बाहर नहीं आती, तो याद रखिए, चुनाव करीब हैं। भारतीय जनता भले ही चुप दिखे, लेकिन जब वह वोट की चोट करती है, तो बड़े- बड़े सिंहासन रेत के महल की तरह ढह जाते हैं। जो इतिहास का अपमान करेगा, जनता उसे भविष्य के कूड़ेदान में डाल देगी। इसलिए अब फैसला सत्ता को करना है- वह मैकाले की औलादों के साथ खड़ी है या इस देश की सनातन चेतना के साथ? ऐसे में हुल्लफाड़ सच है कि मैकाले के मानसपुत्रों की विदाई का वक्त आ गया है। बात सीधी है और उतनी ही कड़वी। जिसे हम स्वतंत्र भारत का इतिहास कहते हैं, वह असल में लंदन के पुस्तकालयों में बैठकर बुना गया एक ऐसा मकड़जाल है, जिसका मकसद सिर्फ और सिर्फ सनातनी समाज को आपस में लड़ाना था। अंग्रेजों ने डिवाइड एंड रूल का जो फार्मूला जातियों के नाम पर तैयार किया, उसे आज के सत्ताधीश सामाजिक न्याय और इतिहास का मुलम्मा चढ़ाकर बेच रहे हैं।
इसके लिए वे आर्यन इन्वेजन की थ्योरी का सहारा ले रहे हैं, जो सांप का जहर है।
सबसे बड़ा झूठ तो वहीं से शुरू हुआ- जब हमें सिखाया गया कि हम अपनी ही जमीन पर बाहर से आए हमलावर हैं। ब्रिटिश ईसाई हुकूमत ने आर्यन इन्वेजन का जो फर्जी नैरेटिव गढ़ा, उसका एक ही लक्ष्य था- हिन्दुओं को उनकी जड़ों से काटना और ईसाइयत के लिए रास्ता साफ करना। ताज्जुब देखिए, विज्ञान ने इसे नकार दिया, डीएनए ने इसे झुठला दिया, लेकिन हमारे सरकारी सिलेबस में आज भी यह फेक नैरेटिव सच बनकर बैठा है। क्यों? क्योंकि सरकार को डर है कि अगर सच सामने आया, तो उनका बनाया हुआ जातिगत वोट बैंक ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा।
हद तो तब हो जाती है जब स्वतंत्रता के विलेन को नायक बताया जाता है। कॉलेजों में उन लोगों के नाम पर विभाग बनाए जाते हैं और उनकी मूर्तियां लगती हैं, जिन्होंने खुल्लमखुल्ला विभाजन का समर्थन किया था या जो ब्रिटिश हुकूमत के वफादार बनकर देशभक्तों की मुखबिरी करते थे। जिन्होंने सनातन धर्म को गाली देना ही अपना बौद्धिक विमर्श मान लिया, उन्हें आज का मसीहा बनाया जा रहा है। राष्ट्रीय सनातन पार्टी का गुस्सा वाजिब है- क्या इस देश के असली नायकों, ऋषियों और महान राजाओं के लिए इतिहास में सिर्फ दो पृष्ठ भी नहीं हैं? राष्ट्रीय सनातन पार्टी के द्वारा सरकार से सार्वजनिक माफी की मांग किया जाना कोई राजनीतिक स्टंट नहीं था। यह करोड़ों लोगों की उस पीड़ा की अभिव्यक्ति थी, जो हर रोज अपने बच्चों को स्कूलों में अपना अपमान पढ़ते देखते हैं। सरकार का मौन रहना यह बताता है कि लुटियंस दिल्ली की आत्मा आज भी औपनिवेशिक दासता की बेड़ियों में जकड़ी है। उन्हें जनभावना की फिक्र नहीं, उन्हें सिर्फ अपने इंटरनेशनल नैरेटिव की चिंता है। राष्ट्रीय सनातन पार्टी और इस सनातनी विचार के समर्थकों का कहना है -सियासतदानों, कान खोलकर सुन लो! भारत अब वह देश नहीं रहा जो चुपचाप अपमान पी जाए। शिक्षा के नाम पर बौद्धिक आतंकवाद और इतिहास के नाम पर फेक नैरेटिव की उम्र अब खत्म हो चुकी है। आगामी चुनावों में जनता यह नहीं देखेगी कि किसने कितनी सड़कें बनाईं, बल्कि यह देखेगी कि किसने भारत की सांस्कृतिक अस्मिता का सौदा किया। राष्ट्रीय सनातन पार्टी ने बिगुल फूंक दिया है। जो सनातन का नहीं, वह अब सत्ता का भी नहीं। जनता अब उन लोगों को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाएगी जो विदेशी चश्मे से भारत को देखते हैं।
सीधा सा सवाल है-क्या हम एक आजाद मुल्क हैं या आज भी मैकाले की उसी वैचारिक लेबोरेटरी में पैदा हुए चूहे हैं, जिन्हें जैसा सिखाया जा रहा है, वैसा ही बोल रहे हैं? ब्रिटिश ईसाई हुकूमत ने भारत को लूटने के लिए उसे अनपढ़ और जातिवादी घोषित किया। उन्होंने नैरेटिव गढ़ा कि भारत तो कबीलों का देश था, जिसे ईसाइयत और अंग्रेजों ने सभ्य बनाया। और हमारे आजाद भारत के हुक्मरानों ने इसी जहरीले झूठ को सच्चा इतिहास बताकर पीढ़ियों के खून में घोल दिया। साजिश का असली चेहरा है- वेदों से नफरत और आक्रमणकारियों से प्रेम।
जरा सोचिए, जिन मदरसों और चर्च-प्रेरित शिक्षा पद्धतियों ने भारतीय ज्ञान परंपरा को अंधविश्वास कहा, उन्हें तो सिर-आंखों पर बिठाया गया। लेकिन जिन्होंने इस धरती के लिए रक्त बहाया, उन्हें इतिहास के हाशिए पर धकेल दिया गया। यह मौलिक सच है कि आज भी स्कूलों में पढ़ाया जा रहा है कि भारत की जाति व्यवस्था अंग्रेजों से पहले सिर्फ शोषण का जरिया थी, जबकि हकीकत यह थी कि हमारी जाति व्यवस्था ही वह अभेद्य किला थी, जिसने भारत को पूरी तरह इस्लामिक और ईसाई होने से बचाए रखा। अंग्रेजों ने इसी किले को तोड़ने के लिए इसे विद्वेष का नाम दिया, और आज की सरकारें उसी दरार में अपनी राजनीति की फसल उगा रही हैं। आजादी के गद्दारों की आरती और सनातनियों का तिरस्कार कर रही हैं। राष्ट्रीय सनातन पार्टी ने जब सरकार से माफी की मांग की, तो वह मांग नहीं, बल्कि इस राष्ट्र के स्वाभिमान की दहाड़ थी। लेकिन सत्ता का अहंकार देखिए, उन्हें फर्क नहीं पड़ता। आज भी विश्वविद्यालयों में उन लोगों का महिमामंडन हो रहा है, जो भारत तेरे टुकड़े होंगे की मानसिकता के वैचारिक पूर्वज थे। जिन लोगों ने 1947 में विभाजन की जमीन तैयार की, जो अंग्रेजों के जी हजूर बने रहे, उनके नाम पर सड़कों और इमारतों के नाम आज भी सीना ताने खड़े हैं। क्या यह उन क्रांतिकारियों का अपमान नहीं है जिन्होंने सनातन स्वराज के लिए फांसी के फंदों को चूमा था? लेकिन दुखद यह है कि सत्ता के गलियारों में आज भी औपनिवेशिक भूत बैठे हैं। सरकार कहती है कि हम बदल रहे हैं। लेकिन क्या बदला? सिर्फ पेंट? अंदर का ढांचा तो आज भी वही है। वही नौकरशाही, वही शिक्षा नीति और वही हिन्दू व मुस्लिम फोबिया से ग्रस्त पाठ्यक्रम। जब तक भारत सरकार सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार नहीं करती कि पिछले 75 सालों में इतिहास के नाम पर बौद्धिक नरसंहार किया गया है, तब तक कोई भी सुधार बेमानी है।