विश्ववार्ता

छह दिन की जंग में इजरायल -अमेरिका – ईरान लड़ाई में कौन मजबूत ?


सौरभ वार्ष्णेय


पश्चिम एशिया में ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ता सैन्य टकराव केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रहा बल्कि इसका असर पूरी दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था पर दिखाई देने लगा है। बीते छह दिनों में हालात इतने तेजी से बदले हैं कि खाड़ी क्षेत्र के कई देश भी इसकी चपेट में आ गए हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि इस अल्प समय में इन देशों को कितना नुकसान हुआ और आगे इसका असर कितना व्यापक हो सकता है।
सबसे पहले यदि इजरायल की बात करें तो उसे सुरक्षा और आर्थिक दोनों स्तरों पर भारी दबाव का सामना करना पड़ा है। मिसाइल और ड्रोन हमलों के कारण कई सैन्य ठिकानों और नागरिक इलाकों को नुकसान पहुंचा है। युद्ध के माहौल ने पर्यटन, व्यापार और निवेश को भी प्रभावित किया है। इजरायल को अपने रक्षा तंत्र को लगातार सक्रिय रखना पड़ रहा है, जिससे उसकी आर्थिक लागत तेजी से बढ़ रही है।
दूसरी ओर ईरान भी इस संघर्ष में आर्थिक और सैन्य दबाव झेल रहा है। पहले से ही अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का सामना कर रहे ईरान के लिए युद्ध जैसी स्थिति उसकी अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ डाल रही है। तेल निर्यात, व्यापारिक मार्ग और आंतरिक सुरक्षा पर दबाव बढ़ा है। यदि यह संघर्ष लंबा खिंचता है तो ईरान की आर्थिक स्थिति और कमजोर हो सकती है।
अमेरिका इस संघर्ष में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में शामिल है। पश्चिम एशिया में अपने सैन्य ठिकानों की सुरक्षा और सहयोगी देशों की रक्षा के लिए उसे भारी सैन्य संसाधन लगाने पड़ रहे हैं। इससे न केवल रक्षा खर्च बढ़ रहा है बल्कि वैश्विक कूटनीतिक दबाव भी अमेरिका पर बढ़ रहा है। अमेरिका के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह इस संघर्ष को नियंत्रित रखे ताकि यह व्यापक क्षेत्रीय युद्ध में न बदल जाए।
खाड़ी देशों जैसे सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कतर पर भी इस संकट का असर स्पष्ट दिख रहा है। इन देशों की अर्थव्यवस्था तेल और व्यापार पर निर्भर है, इसलिए क्षेत्र में अस्थिरता से निवेश और व्यापारिक गतिविधियां प्रभावित हो रही हैं। तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव ने वैश्विक बाजारों को भी अस्थिर किया है। साथ ही सुरक्षा जोखिम बढऩे से इन देशों को अपने रक्षा इंतजाम मजबूत करने पड़ रहे हैं।
दरअसल, इस संघर्ष का सबसे बड़ा नुकसान केवल इन देशों तक सीमित नहीं है। वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था पर भी इसका असर पड़ रहा है। तेल और सोने जैसी वस्तुओं की कीमतों में तेजी, शेयर बाजारों में अस्थिरता और वैश्विक कूटनीतिक तनाव इस बात का संकेत हैं कि यह संकट व्यापक रूप ले सकता है।
अंतत: यह स्पष्ट है कि छह दिनों का यह टकराव ही सभी पक्षों के लिए महंगा साबित हो रहा है। यदि समय रहते कूटनीतिक प्रयास नहीं किए गए तो यह संघर्ष लंबा खिंच सकता है और इसका नुकसान केवल पश्चिम एशिया ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को उठाना पड़ सकता है। इसलिए आवश्यक है कि सभी पक्ष संयम बरतें और संवाद के रास्ते समाधान खोजने की कोशिश करें, क्योंकि युद्ध किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं होता।
कौन देश किस पर भारी-
इजरायल -अमेरिका  ईरान के बीच संभावित युद्ध में किसके पास कितनी ताक़त और लंबी लड़ाई में किसे ज़्यादा नुकसान होगा, इसे कुछ मुख्य पहलुओं से समझा जा सकता है। जैसे अगर सैन्य ताक़त की बात करें तो अमेरिका दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेना है जिसका रक्षा बजट लगभग 800-900 अरब डॉलर/वर्ष है। अत्याधुनिक हथियार, स्टील्थ विमान, परमाणु हथियार सहित वैश्विक सैन्य ठिकाने और नौसैनिक बेड़े है। रक्षा विशेषज्ञों की बात करें तो अगर अमेरिका सीधे युद्ध में उतरे, तो सैन्य ताक़त के मामले में वह सबसे भारी पड़ता है।वहीं इजऱाइल तकनीकी रूप से बेहद उन्नत सेना वाला देश है।आयन डम डविड स्लिंग जैसी मजबूत मिसाइल डिफेंस है। आधुनिक एयरफोर्स और साइबर क्षमता का विस्तार है।  अनुमानित 90 के आसपास परमाणु हथियार क्षेत्रीय स्तर पर इजऱाइल बहुत मजबूत है। इसके बाद ईरान बड़ी सेना और बैलिस्टिक मिसाइलों का विशाल भंडार सहित  ड्रोन टेक्नोलॉजी में तेजी से प्रगति करते हुए क्षेत्रीय सहयोगी समूह (जैसे लेबनान, इराक, यमन में प्रभाव) लेकिन पारंपरिक हथियार तकनीक इजऱाइल/अमेरिका से कमजोर हालांकि ईरान की ताक़त मिसाइल, ड्रोन और क्षेत्रीय नेटवर्क है। लेकिन दोनों देशों के मुकाबले कमजोर दिखाई दे रहा है लेकिन हौसले बुलंद हैं।
अगर हम इन तीनों देशों के आर्थिक ताकत की बात करें तो  आर्थिक ताक़त में अमेरिका: दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। इजऱाइल छोटी अर्थव्यवस्था है लेकिन बेहद मजबूत है। ईरान पहले से ही प्रतिबंधों के कारण दबाव में हैं औी इसकी लंबी लड़ाई में ईरान की अर्थव्यवस्था सबसे जल्दी प्रभावित हो सकती है।
वहीं  भौगोलिक और रणनीतिक स्थिति की बात करें तो ईरान का क्षेत्र बहुत बड़ा है, इसलिए उसे पूरी तरह हराना आसान नहीं। इजऱाइल छोटा देश है, इसलिए मिसाइल हमलों से जल्दी नुकसान हो सकता है। अमेरिका दूर से युद्ध लड़ सकता है (एयरपावर और नौसेना के जरिए)। अगर लंबी लड़ाई में किसे ज़्यादा नुकसान ईरान अर्थव्यवस्था और इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी दबाव। इजऱाइल छोटा क्षेत्र और लगातार मिसाइल खतरा । अमेरिका सैन्य और आर्थिक रूप से सबसे कम प्रभावित लेकिन अगर युद्ध पूरे पश्चिम एशिया में फैल गया तो तेल सप्लाई, वैश्विक व्यापार और पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है। यह कहना अतिश्योक्ति होगी कि सैन्य तकनीक और संसाधनों में अमेरिका-इजऱाइल का पलड़ा भारी है।