लेखक परिचय

कुलदीप सिंह "राघव"

कुलदीप सिंह "राघव"

युवा पत्रकार एवं लेखक अमर उजाला समाचार पत्र से जुडे हैं

Posted On by &filed under जन-जागरण.


कुलदीप सिंह राघव

देश के भीतर 12 राज्यों में गुटखा प्रतिबंधित होने के बावजूद स्थिति सुधरने का नाम नहीं ले रही है। फूड सेफ्टी एंड रेगुलेशन एक्ट 2011 के अनुसार देश के सभी राज्यों में गुटखा के सेवन पर प्रतिबंध लगाने का सभी राज्य सरकारों को निर्देश दिए थे। लेकिन फिर भी गुटखे के प्रयोग में कमी आती नहीं दिख रही है। सवाल खडा़ होता है कि इसके लिए मुख्य दोषी कौन है।

आगरा से लगभग 80 किलोमीटर आगे राजस्थान की सीमा से सटे जगनेर विकास खंड में लगभग 90 प्रतिशत लोग गुटखे का सेवन करते हैं। पुरुषों की तुलना में गुटखा प्रयोग करने में यहां महिलाएं भी पीछे नहीं हैं। यहां गुटखा खाने वालों में मात्र तीन साल का बच्चा भी शामिल है और 80 साल का बुजुर्ग भी। महिलाएं भी गुटखा खाती है और लड़कियां भी। स्थिति इस कदर बनी हुई है कि भूख लगने पर रोटी नहीं गुटखे की दरकार होती है। छोटे बच्चे के रोने पर औरतें बच्चे के मुंह में दूध के बजाय गुटखे के दाने डा़ल देती हैं। लोग एक दूसरे से पुड़िया (गुटखे को स्थानीय स्तर पर यहां पुड़िया कहते हैं) मांगते नजर आते है और अक्सर गुटखा न देने के ऊपर छिट पुट हिंसा भी हो जाती हैं। बाप बेटे के सामने पुड़िया मुंह में डालता है तो बेटी मां के सामने पुड़िया खाती है। हद तो तब हो जाती है जब मां- बाप, बाप बेटे, मां बेटी सभी रिश्तों की मर्यादा को भूलकर एकदूसरे से पुड़िया साझा करके चाव से खाते हैं। इंडियन डेंटल एसोसिएशन के द्वारा किए गए सर्वे के अनुसार 10 से 40 प्रतिशत स्कूली छात्र और 70 प्रतिशत कालेज छात्र गुटखे का सेवन करते हैं।

आपने लिखा देखा होगा कि धूम्रपान निषेध है फिर प्रतिबंध क्यों नहीं। इस सबके पीछे सवाल यह खड़ा होता है कि इस स्थिति के लिए दोषी कौन है। क्या ये मानें कि साक्षरता का अभाव या जागरूकता की कमी इसके लिए गुनहगार हैं। या फिर माना जाए राज्य सरकारें इसके लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं। फूड एंड सेफ्टी रेगुलेशन एक्ट 2011 के तहत सभी राज्यों को गुटखे पर जल्द से जल्द प्रतिबंध लगाने के निर्देश दिए गए थे। निर्देश के बाद सबसे पहले 30 मई 2011 को बिहार ने गुटखे पर प्रतिबंध लगाया। उसके बाद छत्तीसगढ, दिल्ली, गोवा, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, झारखण्ड, केरल, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र ने गुटखे पर रोक लगाई। अभी हाल ही में राजस्थान, पंजाब और मिजोरम ने गुटखे के सेवन और बिक्री को प्रतिबंधित किया है। हांलांकि इन राज्यों ने गुटखे की बिक्री पर रोक जरूर लगाई लेकिन गुटखे के प्रयोग में कमी अभी देखने को नहीं मिल रही है। भिवाड़ी के ताजा उदाहरण ने राजस्थान को कटघरे में खड़ा किया है। भिवाडी की एक महिला ने गुटखा खाने पर पाबंदी लगाने पर गुटखे की बजाया पति को छोड़ना उचित समझा। इससे यह चीज साफ होती है कि महिलाओं में भी गुटखे की लत किस कदर हावी है।

उत्तर प्रदेश ने अभी तक गुटखे पर रोक नहीं लगाई है। पिछले 12 सितंबर को इंडियन डेंटल एसोसिएशन की जनहित याचिका पर विचार करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि उप्र सरकार गुटखे पर प्रतिबंध को लेकर गंभीर नहीं है। वास्तव में एसा ही है। उप्र सरकार ने गुटखे पर प्रतिबंध लगाने के बजाय गुटखे की बिक्री पर लगने वाले टैक्स में कमी की है। सरकार को इस मामले में गंभीरता दिखानी चाहिए। एक रिपोर्ट के अनुसार 2011 में देश में गुटखे और तंबाकू से 1,43,141 मौत हुई जिनमें से 22,899 मौत अकेले उत्तरप्रदेश में हुई थीं। गंभीर विषय यह है कि विभिन्न जागरूकता कार्यक्रम चलाने और तरह- तरह से चेतावनी देने के बावजूद भी सुधार क्यों नहीं हो रहा है। लोग गुटखे के प्रभाव को जानते हुए भी अनजान बने हुए हैं। रासायनिक तौर पर गुटखा मैंग्नीशियम कार्बोनेट और फिनायल इथायल एल्कोहल के साथ निकोटीन मिलाकर बनाया जाता है। इसके दुष्प्रभाव से मुंह का कैंसर, किडनी फेल होना, फेंफडें कमजोर होना और दिल कमजोर होन की वजह से हार्ट अटैक होने की प्रबल संभवनाएं होती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर साल 75 से 80 हजार मुंह के कैंसर के नए केस सामने आते हैं। इसके बाद भी न तो सरकारें गंभीर हैं और नही स्वयं हम। चलो माना कि जगनेर जैसे स्थानों पर साक्षरता और जागरूकता के अभाव हावी है लेकिन शहरी इलाकों में भी गुटखे का उपयोग या धूम्रपान करने वालों की संख्या कम नहीं है। शहरों में लोग जागरूक होने के बावजूद अपनी आर्थिक सम्पन्नता के प्रदर्शन के लिए सिगरेट का धुंआ पीते हैं।

सवाल बडा़ है कि हम दोषी हैं या सरकार । पर अगर वास्तव में सुधार चाहते हो तो पहले खुद पर लगाम लगाओ। सब कुछ जानते हुए भी अपभिज्ञ मत बनो। अपना भला- बुरा स्वंय सोचो और एक सकारात्मक कदम उठाओ। इसी के साथ सरकार को भी चाहिए कि जनहित में गुटखे को प्रतिबंधित करने पर गंभीरता से विचार करे क्यों कि यहां सवाल सरकार को टैक्स से होने वाले मुनाफे का नहीं है बल्कि यहां सवाल आम आदमी की अनमोल जान का है। इस दिशा में इस भयावह स्वरूप को बदलने के लिए हमारी और सरकार दोनों की तरफ से खास पहल की जरूरत है।

One Response to “दोषी कौन सरकार या हम”

  1. इक़बाल हिंदुस्तानी

    iqbalhindustani

    लोगों में जागरूकता पैदा किये बिना केवल कानून के बल पर ये मुमकिन नही होगा, साथ ही इस के बंद होने से बेरोजगार होने वाले लोगों के लिए वैकल्पिक काम की व्यवस्था भी की जानी चाहिए.

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *