अशोक कुमार झा
लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यह मानी जाती है कि यहां जनता की आवाज दबाई नहीं जाती, बल्कि उसे मंच दिया जाता है। इस व्यवस्था में न्यायपालिका न्याय देती है, विधायिका कानून बनाती है, कार्यपालिका शासन चलाती है, और इन तीनों पर नजर रखने का काम करता है लोकतंत्र का चौथा स्तंभ — पत्रकारिता। पत्रकार केवल खबर लिखने वाला व्यक्ति नहीं होता, वह समाज की धड़कनों को सुनने वाला संवेदनशील चेहरा होता है। वह जनता और सत्ता के बीच एक ऐसा पुल होता है जो सच को लोगों तक पहुंचाने का काम करता है। जब कहीं अन्याय होता है, जब किसी गरीब की आवाज दबा दी जाती है, जब भ्रष्टाचार सत्ता के गलियारों में छिपने लगता है, तब पत्रकार अपनी कलम और कैमरे के साथ सामने खड़ा दिखाई देता है।
लेकिन विडंबना देखिए कि जो व्यक्ति हर दिन समाज की खबर रखता है, जो दूसरों के दुख-दर्द को दुनिया तक पहुंचाता है, जो रात-दिन जनता के लिए लड़ता है, उसकी अपनी जिंदगी की खबर शायद ही कोई रखता हो। जनता के लिए लड़ने वाला पत्रकार अक्सर अपने संघर्षों में अकेला रह जाता है। समाज उसके लिखे हुए शब्द पढ़ता है, उसकी दिखाई हुई तस्वीरें देखता है, उसकी आवाज पर बहस करता है, लेकिन उसके भीतर चल रही टूटन, असुरक्षा और संघर्ष को शायद ही कोई महसूस कर पाता है।
हिंदी पत्रकारिता दिवस केवल एक औपचारिक दिवस नहीं है। यह उस परंपरा को याद करने का दिन है जिसने देश में जनचेतना जगाई, स्वतंत्रता आंदोलन को दिशा दी और समाज को सच बोलने की ताकत दी। हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत केवल समाचार देने के उद्देश्य से नहीं हुई थी, बल्कि यह सामाजिक जागरण और राष्ट्रीय चेतना का आंदोलन थी। उस दौर के पत्रकार सत्ता से डरते नहीं थे। उनके पास न बड़े संसाधन थे, न आधुनिक तकनीक, लेकिन उनके पास सच बोलने का साहस था। उनकी कलम बिकती नहीं थी, झुकती नहीं थी और डरती नहीं थी।
समय बदलता गया और पत्रकारिता का स्वरूप भी बदलने लगा। तकनीक आई, चैनलों की संख्या बढ़ी, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने सूचना की दुनिया को पूरी तरह बदल दिया। खबरें अब मिनटों में पूरे देश और दुनिया तक पहुंचने लगीं। लेकिन इस तेज रफ्तार बदलाव के बीच पत्रकारिता का मानवीय पक्ष कहीं कमजोर पड़ता गया। पत्रकारिता धीरे-धीरे मिशन से व्यवसाय में बदलती चली गई। बड़े मीडिया संस्थानों पर कॉरपोरेट प्रभाव बढ़ने लगा। खबरों की गंभीरता की जगह टीआरपी और क्लिक ने लेना शुरू कर दिया। “सबसे तेज” और “सबसे पहले” की होड़ में पत्रकारों पर काम का दबाव लगातार बढ़ता गया।
आज छोटे शहरों, कस्बों और गांवों में काम करने वाले हजारों पत्रकार ऐसे हैं जिनकी जिंदगी बेहद कठिन परिस्थितियों में गुजर रही है। वे न दिन देखते हैं, न रात। कभी सड़क हादसे की खबर, कभी हत्या, कभी बाढ़, कभी दंगा, कभी चुनाव, कभी सरकारी कार्यक्रम — हर जगह सबसे पहले पहुंचने की जिम्मेदारी उन्हीं पर होती है। लेकिन इसके बदले उन्हें क्या मिलता है? कई पत्रकारों को नियमित वेतन तक नहीं मिलता। कई लोग केवल एक पहचान पत्र और “प्रेस” लिखी गाड़ी के सहारे पत्रकारिता कर रहे हैं। पेट्रोल का खर्च खुद, कैमरा खुद, मोबाइल और इंटरनेट खुद, और ऊपर से यह दबाव कि खबर भी सबसे पहले भेजनी है।
ग्राउंड रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार की जिंदगी अक्सर असुरक्षा से भरी होती है। वह घटनास्थल पर सबसे पहले पहुंचता है, लेकिन खतरे भी सबसे पहले उसी के सामने आते हैं। दंगों के बीच रिपोर्टिंग करने वाला पत्रकार अपनी जान जोखिम में डालता है। अपराधियों और माफियाओं के खिलाफ खबर लिखने वाला पत्रकार धमकियां झेलता है। कई बार उसे राजनीतिक दबाव का सामना करना पड़ता है। विज्ञापन रोकने की धमकी दी जाती है। मुकदमे किए जाते हैं। सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग होती है। उसके परिवार तक को निशाना बनाया जाता है। लेकिन इसके बावजूद वह सच दिखाने की कोशिश करता है, क्योंकि यही उसका पेशा नहीं बल्कि उसका दायित्व होता है।
भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं जब पत्रकारों ने सच दिखाने की कीमत अपनी जान देकर चुकाई। किसी ने माफिया के खिलाफ लिखा तो उसकी हत्या कर दी गई। किसी ने भ्रष्टाचार उजागर किया तो उसे धमकियों का सामना करना पड़ा। किसी ने सत्ता से सवाल किया तो उसे देशद्रोही तक कहा गया। यह स्थिति बेहद चिंताजनक है, क्योंकि लोकतंत्र में पत्रकार का काम सवाल पूछना ही होता है। यदि पत्रकार सवाल पूछना बंद कर दे, तो लोकतंत्र केवल औपचारिक व्यवस्था बनकर रह जाएगा।
आज सोशल मीडिया ने पत्रकारिता को जितनी ताकत दी है, उतनी ही चुनौतियां भी दी हैं। हर व्यक्ति के हाथ में मोबाइल है, हर कोई सूचना का माध्यम बन चुका है। लेकिन इस भीड़ में वास्तविक पत्रकारिता कई बार शोर में दब जाती है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि अब पत्रकारों को केवल खबर नहीं बनानी पड़ती, बल्कि वैचारिक हमलों का भी सामना करना पड़ता है। यदि पत्रकार सरकार से सवाल करे तो उसे “देशविरोधी” कहा जाता है, और यदि विपक्ष से सवाल करे तो उसे “भक्त” कह दिया जाता है। निष्पक्ष पत्रकारिता की जगह धीरे-धीरे वैचारिक खेमेबंदी ने ले ली है। ऐसे माहौल में सच्चाई और संतुलन बनाए रखना किसी चुनौती से कम नहीं है।
समाज अक्सर पत्रकार को केवल “मीडिया वाला” समझता है, लेकिन उसके पीछे भी एक इंसान होता है। उसके भी सपने होते हैं, जिम्मेदारियां होती हैं, परिवार होता है। वह भी अपने बच्चों की पढ़ाई, घर का किराया, बूढ़े माता-पिता की दवाइयों और भविष्य की चिंता करता है। फर्क सिर्फ इतना है कि वह अपने दर्द को छिपाकर दूसरों के दर्द को दुनिया के सामने लाता रहता है। जब कोई पत्रकार किसी दुर्घटना की खबर लिखता है, तब शायद उसके भीतर भी कई भावनाएं टूट रही होती हैं। जब वह किसी मां की चीख सुनता है, किसी गरीब की बेबसी देखता है या किसी हिंसा का दृश्य कैमरे में कैद करता है, तब वह केवल “रिपोर्ट” नहीं बना रहा होता, बल्कि भीतर से उस पीड़ा को महसूस भी कर रहा होता है।
पत्रकारों के मानसिक स्वास्थ्य पर आज बहुत कम चर्चा होती है। लगातार नकारात्मक खबरों के बीच काम करना, अस्थिर नौकरी, भविष्य की असुरक्षा और चौबीस घंटे सक्रिय रहने का दबाव किसी भी व्यक्ति को मानसिक रूप से कमजोर कर सकता है। कई पत्रकार अवसाद, चिंता और मानसिक थकान से गुजरते हैं, लेकिन उनके लिए न कोई काउंसलिंग व्यवस्था होती है, न संस्थागत सहयोग। समाज को यह समझना होगा कि पत्रकार मशीन नहीं है। वह भी भावनाओं वाला इंसान है।
यदि समाज को सच्ची और निर्भीक पत्रकारिता चाहिए, तो पत्रकारों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करना होगा। पत्रकारों के लिए मजबूत सुरक्षा कानून बनने चाहिए। उन्हें स्वास्थ्य बीमा, सामाजिक सुरक्षा और सम्मानजनक वेतन मिलना चाहिए। मीडिया संस्थानों को भी यह समझना होगा कि केवल टीआरपी और मुनाफे की दौड़ में पत्रकारों को “उपयोग की वस्तु” बनाना खतरनाक है। जो व्यक्ति दिन-रात संस्थान के लिए काम करता है, उसे केवल काम का दबाव नहीं, बल्कि सुरक्षा और मानसिक सहयोग भी मिलना चाहिए।
सरकारों को भी यह समझना होगा कि पत्रकार केवल खबर देने वाला व्यक्ति नहीं है। वह लोकतंत्र का प्रहरी है। उसकी कलम जनता और सत्ता के बीच संतुलन बनाए रखती है। जिस दिन पत्रकार डरकर लिखने लगेगा, उस दिन लोकतंत्र की आत्मा कमजोर पड़ जाएगी। इसलिए पत्रकार की सुरक्षा केवल मीडिया का मुद्दा नहीं, बल्कि लोकतंत्र की सुरक्षा का प्रश्न है।
समाज को भी अपनी सोच बदलनी होगी। जब कोई पत्रकार सच लिखता है, तो वह केवल खबर नहीं लिख रहा होता, बल्कि समाज के भविष्य का दस्तावेज तैयार कर रहा होता है। वह इतिहास लिख रहा होता है। आने वाली पीढ़ियां उसी के लिखे हुए सच से अपने समय को समझेंगी। इसलिए पत्रकारों के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता जरूरी है।
हिंदी पत्रकारिता दिवस के अवसर पर हमें केवल पत्रकारिता की उपलब्धियों का उत्सव नहीं मनाना चाहिए, बल्कि उन हजारों पत्रकारों के संघर्ष को भी समझना चाहिए जो बिना संसाधनों के, बिना सुरक्षा के और कई बार बिना सम्मान के भी लगातार समाज के लिए काम कर रहे हैं। वे दिन-रात जनता की आवाज बनने की कोशिश कर रहे हैं। वे हर परिस्थिति में सच को बचाए रखने की लड़ाई लड़ रहे हैं।
रात के किसी कोने में, थकी आंखों और टूटते मन के साथ जब एक पत्रकार अपनी खबर लिखता है, तब शायद उसके मन में भी यही सवाल उठता होगा —
“मैं तो सबकी खबर रखता हूं… लेकिन मेरी खबर कौन रखता है?”
यह सवाल केवल एक पत्रकार का नहीं है। यह पूरे लोकतंत्र की आत्मा का सवाल है। क्योंकि जिस समाज में सच लिखने वाले अकेले पड़ जाएं, वहां धीरे-धीरे सच भी मरने लगता है। और जिस दिन सच मर गया, उस दिन लोकतंत्र केवल एक शब्द बनकर रह जाएगा।
अशोक कुमार झा