कविता

अधूरे वाक्य

मृत्यु
अब खबर है।
शोक—
क्षण भर।
कल
किसी ने कहा था—
“लौटूँगा।”
किसी ने
रोटी की आँच धीमी कर दी थी,
किसी ने
दीप की लौ बचाकर रखी थी।
वह लौटा—
पर
उसके साथ
कोई आवाज़ नहीं आई।
पुलवामा—
सड़क उस दिन भी
वैसी ही थी,
पर
धूल के भीतर
एक तीखी गंध बस गई—
जैसे समय ने
अपनी ही साँस रोक ली हो।
एक ही क्षण में
कई घरों की धड़कनें
एक साथ
अधूरी रह गईं।
तिरंगा लौटता है,
पर
जिसे बाँहों में भरना था,
वह
हवा में ही कहीं छूट गया।
अहमदाबाद—
आकाश
अपनी नीली निश्चिंतता में था,
और उसी नीले में
अचानक
एक काला विराम उभरा—
जैसे
चलती हुई पंक्ति पर
स्याही गिर पड़ी हो।
क्षण भर के भीतर
लाल और पीली रेखाएँ
हवा में काँपीं—
जैसे जीवन
आख़िरी बार
अपनी उपस्थिति लिख रहा हो।
वह सफ़र—
जो अभी शुरू ही हुआ था,
समय की घड़ी पर
पूरा ठहर भी न पाया,
और
एक अधूरी दिशा बनकर
रुक गया।
अब
कुछ वाक्य
हवा में अटके हैं—
और कुछ दरवाज़े
आज भी खुलते हैं,
पर
अंदर
सिर्फ़ सन्नाटा प्रवेश करता है।
बरगी—
पानी
शांत था,
इतना शांत
कि उसमें
डूबती हुई आवाज़ भी
सुनाई नहीं देती।
एक माँ का हाथ,
एक बच्चे की उँगली—
बस
एक क्षण का अंतर—
और फिर
दोनों
एक-दूसरे की पहुँच से बाहर।
पानी
सब कुछ अपने भीतर रख लेता है,
पर
माएँ
खाली हाथ रह जाती हैं।
यूक्रेन—
बचपन
अब खेल नहीं जानता,
वह
आवाज़ों के बीच
जीना सीखता है।
रूस—
आग गिरती है,
और घर
स्मृतियों समेत
ढहते हैं।
गाज़ा—
सुबह
यहाँ उगती नहीं,
उसे
पत्थरों के नीचे से
निकालना पड़ता है।
एक बच्चा
खड़ा है
अपनी ही जगह पर,
और पूछता है—
“मेरा घर…?”
माँ
उसे देखती है—
पर
उसके पास
अब कोई उत्तर नहीं है।
इज़रायल—
मृत्यु
हर दिन
एक संख्या बनती है—
और संख्या
धीरे-धीरे
चेहरों को मिटा देती है।
हम—
सब देखते हुए भी
अपने दिनों को
सामान्य कहते हैं।
दूसरों के शोक को
समाचार मानते हैं,
और
धीरे-धीरे
अपने भीतर
एक जगह खाली कर देते हैं—
जहाँ कभी
संवेदना हुआ करती थी।
मनुष्य
पहले
भीतर से मरता है।
बाक़ी
बस
घोषणा होती है।
इससे पहले कि—
बात
कहीं रुक जाए,
और
शब्द
कहने से पहले ही
थक जाएँ—
याद रखना,
अंततः
जीवन
पूरा नहीं होता—
वह
छूट जाता है
अधूरे वाक्यों में।


डॉ नेहा गौड़