विदेशी निवेश से किसे होगा लाभ

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पुनः एफडीआई चर्चा में है। यदि सन 2000 से 2017 की अवधि को देखें तो एफडीआई के समर्थन में उठाए गए कदमों में एक निरंतरता दिखती है। नए नए क्षेत्रों में एफडीआई को मंजूरी दी गई है। अलग अलग क्षेत्रों में एफडीआई की मात्रा से सम्बंधित नियमों को शिथिल किया गया है। हम 49 प्रतिशत के जमाने से 100 प्रतिशत एफडीआई की ओर बढ़ रहे हैं। सरकार और रिजर्व बैंक की पूर्व अनुमति के बिना एफडीआई वाले क्षेत्रों और इनमें एफडीआई की मात्रा को बढ़ाया गया है। अर्थात हम गवर्नमेंट रुट से ऑटोमैटिक रुट की तरफ अग्रसर हुए हैं। जिन क्षेत्रों में एफडीआई प्रतिबंधित था उनमें से अनेक में सरकार और रिजर्व बैंक की अनुमति से एफडीआई की अनुमति दी गई है। वर्तमान में जिन क्षेत्रों में एफडीआई को मंजूरी प्राप्त है और जिनमें एफडीआई नियमों को सरल एवं आकर्षक बनाया गया है, उनमें से प्रमुख हैं- निर्माण क्षेत्र, पेंशन क्षेत्र, बीमा, ब्रॉडकास्टिंग, सिंगल ब्राण्ड रिटेल ट्रेडिंग, मल्टी ब्रांड रिटेलिंग, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर, नागरिक विमानन, सैटेलाइट सम्बन्धी गतिविधियां,सीमित उत्तरदायित्व की पार्टनरशिप्स, कृषि, वानिकी, उद्यानिकी, प्लांटेशन( टी, कॉफ़ी,इलायची, रबर, पाम आयल ट्री, ओलिव आयल ट्री आदि), फार्मास्यूटिकल सेक्टर, कोल एवं लिग्नाइट माइनिंग, पशुपालन, मत्स्य पालन, निजी सुरक्षा एजेंसीज, रक्षा क्षेत्र, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस, टेलीकॉम, ई कॉमर्स सेवाएं, बैंकिंग, फाइनेंसियल सर्विसेस, फ़ूड प्रोडक्ट्स, रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर आदि।
इन क्षेत्रों में से अनेक में एफडीआई को लेकर अनेक चिताएं भी व्यक्त की गई हैं और प्रायोगिक अनुभव ने बताया है कि यह चिंताएं अकारण नहीं हैं। फार्मा सेक्टर में ब्राउनफ़ील्ड इन्वेस्टमेंट के जरिए विदेशी कंपनियां कम कीमत पर भारतीय कंपनियों को खरीद रही हैं। और फिर भारतीय जरूरतों को नजरअंदाज करते हुए, सरकार के नियंत्रक उपायों का अपने अंतरराष्ट्रीय संपर्कों द्वारा प्रतिरोध करती, कीमतों में मनमाना वृद्धि कर रही हैं। इस सेक्टर में तो ग्रीनफील्ड इन्वेस्टमेंट भी गैर जरूरी था क्योंकि देशी कंपनियां खुद अच्छा कर रही थीं और भारत यूनिसेफ की अंतरराष्ट्रीय दवा खरीद का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा उपलब्ध करा रहा था। चाहे वह सिंगल ब्रांड रिटेल हो या मल्टी ब्रांड रिटेल हो या ई कॉमर्स सेक्टर हो, एफडीआई स्थानीय रिटेलर्स के व्यवसाय को विपरीत रूप से प्रभावित कर सकता है। इससे रोजगार उत्पन्न होने की आशा कम है बल्कि इसके कारण रोजगार छिन जाने की आशंका बलवती होती दिखती है। रक्षा क्षेत्र में एफडीआई से डीआरडीओ की स्थिति खराब होने की आशंका जताई जाती है। एक चिंता यह भी है कि विश्व के शक्तिशाली देशों से सम्बद्ध बहुराष्ट्रीय कंपनियां जब भारतीय रक्षा बाजार पर आधिपत्य स्थापित कर लेंगी तब इन पर निर्भरता के कारण भारत अपनी विदेश नीति के साथ समझौता करने को विवश हो सकता है। यह भी संभव है कि हमारे सामरिक रहस्यों और रक्षा उत्पादन में हमारी सीमाओं का ज्ञान प्राप्त कर ये कंपनियां इनका दुरुपयोग करें। विदेशी तकनीक पर आश्रित होना स्वदेशी तकनीकों के विकास हेतु किए जाने वाले अनुसंधान को हतोत्साहित करेगा। इसी प्रकार भली प्रकार चल रहे डेयरी क्षेत्र में शतप्रतिशत एफडीआई अनावश्यक और जबरिया थोपा गया लगता है। भारत विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है और यहाँ डेयरी उद्योग का 70 प्रतिशत लाभांश सीधे डेयरी मालिकों को हस्तांतरित होता है जबकि अमेरिका में यह 38 और ब्रिटेन में केवल 34 प्रतिशत है। एफडीआई से छोटे दुग्ध उत्पादकों के हित प्रभावित होंगे। पशुओं की स्थानीय प्रजातियां विलुप्त होने की ओर अग्रसर होंगी। अधिक मुनाफा कमाने के लिए पशुओं को घोर असुविधाजनक परिस्थितियों में रखा जाएगा। एफडीआई को किसानों की उत्पादन, संग्रहण और विक्रय सम्बन्धी समस्त समस्याओं के समाधान के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। किंतु यह सहज ही समझा जा सकता है कि जब कृषि भूमि और कृषि उत्पादन तकनीक तथा संसाधनों पर विशाल कॉरपोरेट्स का नियंत्रण हो जाएगा तो किसान इनकी दया पर आश्रित होंगे और अपने ही खेतों में इनके लाभ के लिए काम करने वाले बंधुआ मजदूर बन जाएंगे। स्वचलित वाहन उद्योग,नागर विमानन और रक्षा क्षेत्र को विभिन्न कल पुर्जों की सप्लाई करने वाली भारतीय कंपनियों ने उच्च गुणवत्ता को निरन्तर बनाए रखा है और विश्वव्यापी ख्याति अर्जित की है। इस क्षेत्र में भी एफडीआई अनावश्यक लगता है। सेवा क्षेत्र में भी अनेक भारतीय कंपनियां पूरी दुनिया में प्रशंसित हुई हैं और यहाँ भी एफडीआई औचित्यहीन लगता है। जिस प्रकार डेयरी क्षेत्र में अमूल सफलता के नए आयामों को स्पर्श करता रहा है उसी प्रकार बीमा के क्षेत्र में भारतीय जीवन बीमा निगम ने उल्लेखनीय कार्य किया है। गुणवत्ता पूर्ण सेवा,  तकनीकी कुशलता, व्यापक नेटवर्क आदि विशेषताओं के कारण एलआईसी ने देश के लोगों का भरोसा अर्जित किया है। किंतु एफडीआई के प्रति सरकार के बढ़ते आकर्षण से यह बीमा क्षेत्र भी अछूता नहीं है। बीमा क्षेत्र में एफडीआई के समर्थन में दिए जाने वाले तर्क जाने पहचाने और पुराने हैं। इससे बेहतर सेवा मिलेगी, लोगों को नए विकल्प मिलेंगे, उन्हें बेहतर रिटर्न मिलेंगे आदि आदि। किन्तु सबसे बड़ा दावा यह किया जा रहा है कि असंगठित क्षेत्रों के कामगारों को इंश्योरेंस कवर दिलाने में विदेशी बीमा कंपनियां सहायक होंगी। अपने लाभ के लिए काम करने वाली विदेशी बीमा कंपनियों से इस दिशा में गंभीर प्रयत्न की अपेक्षा करना बहुत अधिक आशावादी होना है और इससे भी अधिक आशावादी हम तब लगते हैं जब हम यह मानते हैं कि अनिश्चित आय वाले असंगठित मजदूर इन कंपनियों के प्रीमियम का लंबे समय तक नियमित भुगतान कर सकेंगे। अधिक दिन नहीं बीते हैं जब लोगों ने बड़ी बड़ी बहुराष्ट्रीय बीमा कंपनियों को 2008 की मंदी में धराशायी होते और लोगों को अपनी जमापूंजी को गंवाते देखा है। यही खतरा पेंशन क्षेत्र में भी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को बढ़ावा देने पर मंडराता रहेगा। ब्रॉडकास्टिंग क्षेत्र में विदेशी निवेश को लेकर सभी सशंकित हैं और प्रसारण तथा मीडिया में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की बढ़ती दखलंदाजी के खतरों से आगाह कर रहे हैं।
सरकारें निरन्तर यह दावा करती रही हैं कि एफडीआई से बड़े पैमाने पर रोजगार उत्पन्न होंगे। किंतु इन दावों की हकीकत की पड़ताल जरूरी है। देश में रोजगार के बारे में व्यापक, विस्तृत और अधिकृत आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, यह बात देश की आर्थिक समस्याओं को सुलझाने के लिए बनाई गई आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य स्वीकार कर चुके हैं। आर्गेनाइजेशन फ़ॉर इकॉनॉमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट का एक अध्ययन बताता है कि देश में रोजगार की दर में कमी आई है। जो रोजगार उत्पन्न हो रहे हैं वह देश की कार्यक्षम जनसंख्या में वृद्धि की तुलना में बहुत कम हैं और देश के 30 प्रतिशत युवा बेरोजगार हैं। एफडीआई से रोजगार क्यों उत्पन्न नहीं हो रहे, इसके अनेक कारण हैं। जो एफडीआई देश में आया है उसका 60 प्रतिशत भाग अभी भी सर्विस सेक्टर में है। सर्विस सेक्टर में भी ई कॉमर्स और टेलीकॉम सेक्टर में आरम्भिक रोजगार वृद्धि के बाद व्यापक छंटनी का दौर दिखाई दे रहा है जिसके लिए स्वचलन और अपना खर्च कम करने की कंपनियों की कोशिश को उत्तरदायी माना जा सकता है। आधुनिक अर्थशास्त्रियों का मानना है कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में भारी रोजगार आ सकता है किंतु प्राकृतिक संसाधनों के दोहन सम्बन्धी कानूनों, श्रम कानूनों, इंफ्रास्ट्रक्चर की समस्याओं, ट्रेड यूनियनवाद आदि के कारण विदेशी पूंजीपति इस क्षेत्र को प्राथमिकता नहीं दे रहे हैं। इन अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इज ऑफ डूइंग बिज़नेस में पहले 50 स्थानों पर पहुंचना हमारा लक्ष्य होना चाहिए। लगभग दो वर्ष पहले समारोहपूर्वक प्रारम्भ हुआ स्टार्ट अप इंडिया बुरी तरह असफल रहा है। सरकार स्टार्ट अप की असफलता का समाधान प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में देख रही है और नई प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नीति में इसके किये एक अलग सेक्शन बनाते हुए इसे सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। सरकार के पास स्टार्ट अप इंडिया की हालत सुधारने के दो विकल्प थे या तो युवा उद्यमियों के लिए बेहतर वातावरण बनाया जाता या शतप्रतिशत विदेशी निवेश की ओर भागा जाता। दूसरा रास्ता सरल था और यही सरकार की पसंद बना। किन्तु स्टार्ट अप में विदेशी निवेश से आयात निर्यात संतुलन के बिगड़ने और लाभ के बहुराष्ट्रीय कंपनियों के जरिए विदेशों को चले जाने का खतरा हमेशा बना रहेगा। कृषि क्षेत्र में भी- जो रोजगार देने वाला सबसे बड़ा क्षेत्र है – एफडीआई नगण्य है।
एफडीआई के कारण रोजगार न बढ़ने का एक अन्य कारण यह है कि इस प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का एक बड़ा भाग ब्राउन फील्ड इन्वेस्टमेंट के रूप में है जिसमें देशी कंपनियों का स्वामित्व विदेशी कंपनियां अधिग्रहण या विलय के द्वारा अर्जित कर लेती हैं। चूंकि नई उत्पादन इकाइयों का निर्माण नहीं होता इसलिए रोजगार के अवसर भी नहीं बढ़ते। अर्थशास्त्रियों का मत है कि भारत में उद्योग डालना अभी भी कठिन है इसलिए ग्रीनफ़ील्ड इन्वेस्टमेंट के बजाए ब्राउन फ़ील्ड इन्वेस्टमेंट बहुराष्ट्रीय कंपनियों की प्राथमिकता है। विदेशी कंपनियां अपने लाभ के आधार पर क्षेत्र का चयन करती हैं न कि हमारी जरूरतों के मुताबिक। एविएशन क्षेत्र में विदेशी कंपनियां विमानों के परिचालन में उतनी रुचि नहीं दिखा रही हैं जितनी कि एयरपोर्ट मेंटेनेन्स और अन्य सहायक गतिविधियों में उनकी रुचि है।
एफडीआई के सम्बंध में एक और भ्रांत धारणा यह है कि इससे मजदूरी बढ़ेगी, कार्य की दशाओं में सुधार होगा और श्रमिकों तथा कर्मचारियों का जीवन स्तर बेहतर होगा। वास्तविकता यह है कि एफडीआई समर्थक अर्थशास्त्री भी अपने अध्ययनों में इस बात को प्रमाणित करने में असफल रहे हैं। यदि कर्मचारियों का वेतन बढ़ता है तो इसके कई कारण होते हैं। यह नए कर्मचारियों की तकनीकी रूप से स्किल्ड टीम होती है जिसे बहुराष्ट्रीय कंपनियां अधिक वेतन देती हैं वह भी अधिक घण्टों तक और अधिक प्रकार का काम लेकर। इस अधिक वेतन में उस असुरक्षा का कुछ हर्जाना भी सम्मिलित होता है जो छंटनी के रूप में इन कर्मचारियों का पीछा करती रहती है। वे कर्मचारी जो किसी देशी कंपनी के बहुराष्ट्रीय कंपनी में विलय या उसके द्वारा अधिग्रहण के बाद भी उसी में बने रहते हैं उन्हें या तो कम वेतन दिया जाता है या हटा दिया जाता है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने देश के श्रम कानूनों के उस भाग को निवेश वाले देश में लागू करना चाहती हैं जो उनके अनुकूल होता है। जबकि यदि इन देशों के वर्तमान श्रम कानूनों में यदि मजदूर समर्थक प्रावधान होते हैं तो इन्हें श्रम कानूनों में संशोधन द्वारा हटाने के लिए सरकार पर दबाव बनाया जाता है। यही भारत में हो रहा है।
संभव है कि सरकार की उदार नीति से देश में विदेशी निवेश की बरसात होने लगे किन्तु इससे होने वाला विकास उन 1 प्रतिशत लोगों को और अमीर नहीं बनाएगा जिनके पास पहले से 73 प्रतिशत दौलत है इस बात की चिंता कौन करेगा।

डॉ राजू पाण्डेय

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