लेखक परिचय

राजू पाण्डेय

राजू पाण्डेय

सम सामयिक विषयों पर गहन विश्लेषण परक लेखन।

बदकिस्मती से आज भी प्रासंगिक है चंपारण सत्याग्रह

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यह हमारा दुर्भाग्य है कि चंपारण सत्याग्रह  एक शताब्दी बाद भी अपनी प्रत्येक वर्षगाँठ पर पहले से अधिक प्रासंगिक होता जा रहा है। चंपारण सत्याग्रह नील की खेती करने वाले किसानों के अधिकारों के लिए संगठित संघर्ष के रूप में विख्यात है। इसके एक सदी बाद भी देश का किसान आज बदहाल है। 2010-11 के… Read more »

ईवीएम के हटते ही क्या निष्पक्ष हो जाएंगे चुनाव?

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राजू पाण्डेय ईवीएम की विश्वसनीयता का प्रश्न विश्व के सर्वाधिक विशाल लोकतंत्र के सवा सौ करोड़ नागरिकों के जीवन की दशा और दिशा तय करने वाले आम चुनावों की निष्पक्षता से जुड़ा हुआ है। इसलिए राजनीतिक दलों और चुनाव आयोग से इस विषय पर अधिक गंभीरता, संवेदनशीलता और तत्परता की अपेक्षा करना देश के नागरिकों… Read more »



सर्वधर्म समभाव निरा आदर्श नहीं अपितु अनुभूत यथार्थ

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स्वामी रामकृष्ण परमहंस के जन्मदिवस 18 फरवरी पर विशेष आलेख) स्वामी रामकृष्ण परमहंस का जन्मदिवस धार्मिक- आध्यात्मिक जगत में अनेक संस्थाओं द्वारा प्रति वर्ष की भांति अपने आंतरिक कार्यक्रमों के रूप में मनाया जाएगा। भव्य आश्रमों में आयोजित होने वाले ऐसे औपचारिक कार्यक्रम आयोजकों और प्रतिभागियों की गहन श्रद्धा के बावजूद स्वामी रामकृष्ण के विचारों… Read more »

सरोजिनी को नापसंद था नारीवादी कहलाना

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निर्भीकता, उत्कट स्वातंत्र्य प्रेम तथा नारियों को सबल-सक्षम-शिक्षित बनाने की प्रबलतम आकांक्षा- यही वह विशेषताएँ थीं जिन्होंने सरोजिनी नायडू के यशस्वी और संघर्षमय जीवन को संचालित किया। उनकी उपलब्धियां उनके अदम्य साहस और नारी मुक्ति के लिए उनके दुर्घर्ष संघर्ष की अमर गाथा का बयान करती हैं। वे द गोल्डन थ्रेशहोल्ड की प्रस्तावना में स्वयं… Read more »

लोकतंत्र का लचीला और खुला स्वरूप रहे बरकरार

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प्रधानमंत्री जी ने गत दिनों दो निजी टी वी चैनलों को दिए अपने साक्षात्कारों में अपने मन की बात हमेशा की तरह हमारे साथ की। एक मुद्दा जिसे माननीय राष्ट्रपति महोदय ने बजट सत्र के प्रारम्भ में दिए गए अभिभाषण में सम्मिलित कर आधिकारिकता और महत्व दोनों प्रदान कर दिए- वह था- लोक सभा और… Read more »

विदेशी निवेश से किसे होगा लाभ

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पुनः एफडीआई चर्चा में है। यदि सन 2000 से 2017 की अवधि को देखें तो एफडीआई के समर्थन में उठाए गए कदमों में एक निरंतरता दिखती है। नए नए क्षेत्रों में एफडीआई को मंजूरी दी गई है। अलग अलग क्षेत्रों में एफडीआई की मात्रा से सम्बंधित नियमों को शिथिल किया गया है। हम 49 प्रतिशत के… Read more »

 आधार की सुरक्षा और सदुपयोग हम सब का उत्तरदायित्व

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आधार से जुड़ी दो खबरें सुर्खियां बटोर रही हैं। एक खबर है कि आधार लिंकिंग के कारण देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में मौजूद 80 हजार फर्जी शिक्षकों का पता चला है। दूसरी खबर एक अंग्रेजी समाचार पत्र के हवाले से आई है जिसके अनुसार ऐसे हैकर्स मौजूद हैं जो नाम मात्र की रकम… Read more »

सोशल मीडिया : जगत सा अराजक या अराजकता का जगत

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क्या सोशल मीडिया अत्यंत बुद्धिमत्तापूर्वक निर्मित किसी ऐसे मानव रचित चक्रवात या भूकम्प की तरह है जिसके केंद्र का पता लगाना संभव नहीं है? पता नहीं क्यों सोशल मीडिया को देखकर एडम स्मिथ के प्राकृतिक न्याय पर आदर्श बाजारवादी अर्थव्यवस्था के मॉडल की याद आती है जो आत्मनियंत्रण के द्वारा संचालित होने का दावा करता… Read more »

 बलात्कार: पितृसत्ता का हिंसात्मक उत्सव

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जब महिला एवं बाल विकास मंत्री  मेनका गाँधी ने नवम्बर 2016 में यह बयान दिया था कि बलात्कार के मामलों के संदर्भ में भारत उन चार देशों में सम्मिलित है जहाँ सबसे कम बलात्कार होते  हैं तो उनकी बड़ी आलोचना हुई थी और उन्हें बताया गया था कि भारत बलात्कार के मामलों की संख्या के… Read more »

टेलीकॉम घोटाले और कोयला घोटाले : सच जो कभी उजागर न हो पाएगा

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वर्षों से चल रहे भ्रष्टाचार विषयक न्यायालयीन प्रकरणों में एक एक कर फैसले आ रहे हैं और अपने अपने राजनीतिक लाभ के लिए इन फैसलों का उपयोग, राजनीतिक दलों और नेताओं द्वारा खुल कर किया जा रहा है। आरोप-प्रत्यारोप और स्तरहीन बयानबाजी का यह दौर उन मीडिया समूहों और एक व्यावसायिक रणनीति के तहत लार्जर… Read more »