पर्यावरण लेख

क्यों हो रही है मुंबई में इतनी तेज़ बारिश? सिर्फ़ अल नीनो नहीं, जलवायु परिवर्तन भी बड़ी वजह

इस साल मानसून ने भारत में अजीब तस्वीर पेश की है। जून के अंत तक देश में सामान्य से करीब 40 प्रतिशत कम बारिश हुई थी। लेकिन जुलाई शुरू होते ही हालात तेजी से बदल गए। मुंबई और पश्चिमी तट के कई इलाकों में कुछ ही दिनों में इतनी बारिश हुई कि देशभर में बारिश की कमी घटकर करीब 20 प्रतिशत रह गई।

वैज्ञानिकों का कहना है कि इस बदलाव की वजह केवल अल नीनो (El Niño) नहीं है। अब जलवायु परिवर्तन (Climate Change) भी भारतीय मानसून के स्वभाव को बदल रहा है।

बारिश कम दिनों में, लेकिन कहीं ज़्यादा तेज़
विशेषज्ञों के मुताबिक पहले मानसून में कई दिनों तक हल्की या मध्यम बारिश होती थी। अब स्थिति बदल रही है। बारिश वाले दिनों की संख्या घट रही है, लेकिन जब बारिश होती है तो बहुत कम समय में अत्यधिक मात्रा में पानी बरसता है। इसका कारण गर्म होती हवा और समुद्र हैं, जो वातावरण में पहले से अधिक नमी जमा कर रहे हैं। यही नमी बादलों को बेहद भारी बना देती है।

एक हफ्ते में ही जुलाई जितनी बारिश
मुंबई में जुलाई के पहले सप्ताह के दौरान कई बार 100 मिमी से अधिक बारिश दर्ज की गई। कोलाबा मौसम केंद्र में 1 से 7 जुलाई के बीच 791 मिमी बारिश हुई, जो पूरे जुलाई महीने के औसत (768.5 मिमी) से भी अधिक है। वहीं सांताक्रूज़ में 879 मिमी बारिश रिकॉर्ड की गई, जो उसके पूरे महीने के सामान्य औसत के लगभग बराबर है।

अरब सागर की गर्मी बढ़ा रही है बारिश की ताकत
स्काइमेट वेदर के मौसम वैज्ञानिक महेश पलावत के अनुसार इस समय मानसून सक्रिय है। ओडिशा के ऊपर बने निम्न दबाव और महाराष्ट्र के ऊपर चक्रवाती परिसंचरण के साथ अरब सागर से लगातार नमी मिलने के कारण महाराष्ट्र में बादल बार-बार बनते रहे, जिससे लगातार भारी बारिश हुई।
वहीं जलवायु वैज्ञानिक डॉ. रघु मुर्तुगुड्डे का कहना है कि अब अल नीनो और जलवायु परिवर्तन को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। अल नीनो मानसून की शुरुआत को प्रभावित करता है, लेकिन गर्म होते अरब सागर और बदलते वायुमंडलीय पैटर्न भारी बारिश को और अधिक तीव्र बना रहे हैं।

जलवायु परिवर्तन ने बदल दिया है मानसून का चरित्र
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के पूर्व महानिदेशक डॉ. के. जे. रमेश के अनुसार अब मानसून का स्वरूप स्थायी रूप से बदल चुका है। चाहे अल नीनो हो या न हो, भविष्य में बारिश कम समय में और अधिक तीव्रता के साथ होने की संभावना बढ़ती जाएगी। उन्होंने कहा कि अरब सागर के रिकॉर्ड स्तर तक गर्म होने से उत्तर-पश्चिम भारत में भी बारिश का पैटर्न बदल रहा है।

मुंबई और पुणे में बढ़ रही है मानसूनी बारिश
दीर्घकालिक आंकड़ों से भी यह बदलाव साफ दिखाई देता है। वर्ष 1981 से 2000 की तुलना में 2001 से 2024 के बीच मुंबई की औसत मानसूनी बारिश में लगभग 15 प्रतिशत और पुणे में 23 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
एक अन्य अध्ययन के अनुसार भविष्य में महाराष्ट्र और गुजरात के तटीय इलाकों में भारी बारिश वाले दिनों की संख्या लगभग एक सप्ताह तक बढ़ सकती है।

सिर्फ़ मौसम नहीं, शहर भी जिम्मेदार
विशेषज्ञों का कहना है कि शहरी बाढ़ केवल भारी बारिश का परिणाम नहीं होती। खराब ड्रेनेज, तेज़ी से बढ़ता कंक्रीटीकरण, जल निकासी मार्गों पर अतिक्रमण और हरित क्षेत्रों की कमी भी बाढ़ को गंभीर बना देती है।
डॉ. रमेश का कहना है कि मानसून से पहले नालों की नियमित सफाई, पेड़ों का संरक्षण और बेहतर शहरी योजना अब पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गई है।


अब तैयारी ही सबसे बड़ा समाधान
काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (CEEW) के विशेषज्ञ डॉ. विश्वास चिताले का कहना है कि शहरों को अब केवल मौसम की चेतावनी पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। उन्हें बाढ़ पूर्व चेतावनी प्रणाली, राहत व्यवस्था और जलवायु अनुकूल शहरी योजना पर निवेश बढ़ाना होगा।
वहीं क्लाइमेट ट्रेंड्स की निदेशक आरती खोसला का कहना है कि भविष्य में अत्यधिक बारिश की घटनाएं और बढ़ेंगी। ऐसे में जलवायु अनुकूल बुनियादी ढांचे, बेहतर ड्रेनेज, प्रकृति आधारित समाधान और वैज्ञानिक शहरी नियोजन को विकास का अनिवार्य हिस्सा बनाना होगा।

इसमें छिपी Climate कहानी
इस साल का मानसून एक अहम संदेश दे रहा है। चुनौती सिर्फ़ यह नहीं है कि कितनी बारिश होगी, बल्कि यह भी है कि बारिश किस तरह होगी। अगर शहर पुराने मौसम के हिसाब से बने रहेंगे, तो बदलती जलवायु के साथ आने वाली ऐसी चरम बारिश उन्हें बार-बार संकट में डालती रहेगी।