राजनीति

अपनी हार को ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे से क्यों जोड़ रहा विपक्ष

राजेश श्रीवास्तव

‘ज्ञानेश, इट्स डन ब्रो’ इस स्लोगन के साथ राहुल गांधी ने मंगलवार सुबह इलेक्शन कमीशन की तरफ कूच किया। दावा किया कि उनके साथ लोकसभा-राज्यसभा के करीब 3०० विपक्षी सांसद सड़क पर हैं। राहुल को हिरासत में लिया गया। देर रात सभी रिहा भी हो गये लेकिन ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग को विपक्ष ने अपना राजनीतिक वजूद बचाए रखने की लड़ाई बना ली है। आखिर क्या वजह है कि विपक्ष को लगता है कि ज्ञानेश हट जायेंगे तो उसकी जीत हो जायेगी। या उसकी सरकार बन जायेगी। जब उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में चुनाव के चंद महीने शेष हैं तो अपनी ऊर्जा प्रदेश में खर्च करने के बजाय आखिर विपक्ष ज्ञानेश कुमार के पीछे क्यों पड़ा है। महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनावों के बाद राहुल गांधी ने कहा- डुप्लीकेट वोटर और एक पते पर कई वोटर्स होने जैसी गड़बड़ियों के चलते कांग्रेस की हार हुई। राहुल गांधी, ममता बनर्जी, अखिलेश और अन्य कई विपक्षी नेताओं ने चुनाव आयोग पर बीजेपी की मदद करने और विपक्ष को चुनाव हरवाने के आरोप लगाए हैं।
अगर ज्ञानेश कुमार दबाव में इस्तीफा देते हैं, तो पूरी एसआईआर प्रक्रिया और उसके बाद हुए सारे चुनाव संदेह के घेरे में आ जाएंगे। अगर वे इस्तीफा नहीं देते, तो कांग्रेस सड़क पर उतरेगी। इस पूरे अभियान से राहुल गांधी को नरेंद्र मोदी के मुख्य चैलेंजर के रूप में स्थापित करने की कोशिश भी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि फॉर्म-6 में बदलाव की मंजूरी उन्होंने नहीं दी है। कोर्ट ने चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से उन पर लगे 14 आरोपों पर जवाब मांगा है। सरकार को भी नोटिस भेजकर अपनी बात रखने को कहा है। इसी आधार पर आगे की कार्रवाई होगी।
असल में ‘राहुल की स्ट्रैटेजी पीएम मोदी की छवि कमजोर करना है। राहुल ये संदेश देना चाहते हैं कि बीजेपी को चुनाव आयोग की वजह से वोट मिलते हैं, न कि नरेंद्र मोदी की वजह से।’ विपक्ष बीजेपी की चुनाव में जीत को चुनाव आयोग में गड़बड़ी से जोड़कर दिखा रहा है। समाजवादी पार्टी के सांसद प्रदर्शन के दौरान ‘भाजपा ही सीईसी’ के पोस्टर लिए दिखे।
महाराष्ट्र में शिवसेना में टूट हुई। फरवरी 2०23 में चुनाव आयोग ने शिवसेना का पारंपरिक निशान ‘धनुष-बाण’ बागी नेता और बीजेपी के साथ गए एकनाथ शिदे के गुट वाली शिवसेना को दे दिया। जबकि उद्धव गुट को नया सिबल ‘मशाल’ मिला।
इसी तरह एनसीपी की टूट में बीजेपी के साथ गए अजित गुट को पारंपरिक निशान घड़ी दिया। बंगाल चुनाव के बाद तृणमूल में टूट हुई, तो चुनाव आयोग ने टीएमसी के दोनों गुटों के पुराना सिबल इस्तेमाल करने पर रोक लगा दी।
विपक्ष चुनाव आयोग पर पक्षपात के आरोप लगा रहा है। राहुल गांधी ने इसे ‘पार्टी चोरी’ करार देते हुए लिखा, ‘पहले शिवसेना, फिर एनसीपी और अब टीएमसी। हर बार एक ही पैटर्न। बीजेपी और चुनाव आयोग मिलकर पार्टी तोड़ते हैं, फिर उसका चुनाव निशान छीन लिया जाता है।’
ज्ञानेश कुमार का कार्यकाल 26 जनवरी 2०29 तक है। इस दौरान 2० राज्यों के विधानसभा चुनाव होने हैं। विपक्ष मानता है कि ज्ञानेश कुमार के रहते निष्पक्ष चुनाव नहीं हो सकते। इसी बीच 23 सितंबर को इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट पब्लिश होने के बाद मुद्दे ने तूल पकड़ा, तो विपक्ष पूरी ताकत से सड़क पर उतर आया है।
दरअसरल यह कोई हाल-फिलहाल की बात नहीं है। राहुल गांधी ‘वोट चोरी’ के मुद्दे पर करीब दो साल से एक्टिव हैं। 7 अगस्त 2०25 को इस मुद्दे पर पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में महादेवपुरा सीट में धांधली के कथित सबूत दिए। सितंबर में कर्नाटक और महाराष्ट्र चुनाव में धांधली का आरोप लगाया और नवंबर 2०25 में हरियाणा चुनाव को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस की। 23 सितंबर 2०26 को ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट में चुनाव आयोग से जुड़े खुलासों के अगले ही दिन राहुल ने चौथी प्रेस कॉन्फ्रेंस की। राहुल गांधी ने ही बिहार चुनाव के पहले यह मुद्दा उठाया था और अब ये इतना बड़ा हो गया है, तो फायदा भी उन्हें ही होगा। राहुल गांधी ने बिहार में ‘वोटर अधिकार यात्रा’ की थी। इस दौरान 16 दिनों में 2० जिले कवर किए थे।
क्या इंडिया गठबंधन को एकजुट रखेगा ‘वोट चोरी’ का मुद्दा
जुलाई 2०23 में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, डीएमके और आप जैसे 23 दलों ने ‘इंडिया’ ब्लॉक बनाया। 2०24 के लोकसभा चुनावों में मिलकर लड़े, तो बीजेपी 24० सीटों पर सिमट गई। अलग-अलग मुद्दों पर गठबंधन की पार्टियों में अनबन की खबरें आती रहती हैं, लेकिन ‘वोट चोरी’ के मुद्दे पर गठबंधन की ज्यादातर पार्टियां एकजुट हैं।
कांग्रेस को करीब से जानने वाले पॉलिटिकल एक्सपर्ट आदेश रावल बताते हैं, ‘राहुल का टारगेट 2०29 का लोकसभा चुनाव है। वो चाहते हैं की 543 सीटों पर बीजेपी के सामने सिर्फ इंडिया गठबंधन का एक उम्मीदवार हो।’ प्रोटेस्ट के दौरान टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा, एनसीपी सांसद सुप्रिया सुले और कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी हाथ पकड़कर चलती दिखीं।


ये मुद्दा जेन-जी को जोड़ सकता है
पेपर लीक के खिलाफ दिल्ली के ‘जेन-जी प्रोटेस्ट’ के बाद धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की तर्ज पर सीजेपी ने दोबारा ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग की है। प्रोटेस्ट में जुट रहे युवाओं के अलावा इस मुद्दे की आम लोगों में भी चर्चा है।
राहुल भी इस मुद्दे से आम लोगों को कनेक्ट करना चाहते हैं। एसआईआर प्रक्रिया, फॉर्म-6 में बदलाव और वोटर लिस्ट में गड़बड़ी से जुड़ी तकनीकी बहस को राहुल गांधी ने आसान शब्दावली दी है- ‘सेव माय वोट’ और ‘वोट चोरी’।
परसेप्शन की लड़ाई में बढ़त की उम्मीद
2०23 में पास नए कानून के तहत सीईसी और बाकी चुनाव आयुक्तों को लीगल इम्युनिटी मिली हुई है। यानी पद पर रहते हुए किसी काम या बयान के लिए उनके खिलाफ क्रिमिनल केस नहीं चल सकता।
सीईसी को महाभियोग के जरिए ही हटाया जा सकता है। अप्रैल 2०26 में विपक्ष ने इसके लिए नोटिस दिया था, तब लोकसभा स्पीकर और राज्यसभा के सभापति ने इसे स्वीकार नहीं किया था। विपक्ष दोबारा तैयारी में है, लेकिन नंबर कम पड़ेंगे। राहुल गांधी जानते हैं कि ये परसेप्शन की लड़ाई है और वो इसमें बढ़त लेना चाहते हैं।
पूरा विपक्ष एकजुट नहीं : 6 अक्टूबर के प्रदर्शन में आम आदमी पार्टी और डीएमके शामिल नहीं थे। आप पिछले साल ‘इंडिया’ ब्लॉक से अलग हो गई थी। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के बाद डीएमके ने भी इंडिया ब्लॉक से दूरी बना ली है। हालांकि दोनों पार्टियां अपने स्तर पर ज्ञानेश कुमार का विरोध कर रही है।
गड़बड़ी के सबूत पर स्थिति कमजोर : ज्ञानेश कुमार के खिलाफ याचिका की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि गड़बड़ियां मिलने पर कार्रवाई होगी। हालांकि जब 2०25 में राहुल गांधी के आरोपों पर ज्ञानेश कुमार ने बेबुनियाद बताते हुए कहा था, ‘या तो राहुल 7 दिन के अंदर हलफनामा दें या देश से माफी मांगे।’ तब राहुल गांधी ने लिखित हलफनामा नहीं दिया था।
इस मुद्दे पर जनता जुड़गी या नहीं : बिहार विधानसभा चुनाव से पहले राहुल गांधी ने ‘वोटर अधिकार यात्रा’ के तहत करीब 13०० किमी चलकर 11० विधानसभा सीटें कवर की थीं। यात्रा में जुटी भीड़ वोट में तब्दील नहीं हुई। तब कांग्रेस ने 61 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन सिर्फ 6 जीत पाई। अगर योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश जीत लेते हैं और पंजाब में कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहता है, तो फिर आज के प्रोटेस्ट की भीड़ का कोई अर्थ नहीं रह जाता।’
इंडिया गठबंधन के मार्च और राहुल गांधी के आरोपों पर बीजेपी ने पलटवार किया है। बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि यह मार्च अराजकता पैदा करने और राहुल गांधी को फिर से लॉन्च करने की एक और कोशिश है।
उन्होंने कहा, ‘एसआईआर का विरोध करके कांग्रेस 2.8 करोड़ मृतकों के नाम वोटर लिस्ट में बनाए रखना चाहती है? क्या राहुल गांधी और सोनिया गांधी ‘वोट चोरी’ से सांसद बने? अगर एसआईआर अवैध है, तो क्या कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और हिमाचल की कांग्रेस सरकारें भी अवैध हैं?’ तैयारी नवंबर तक प्रोटेस्ट की है। अब देखना है कि कितना इम्तेहान देते हैं दरअसल, कांग्रेस ने ‘वोट चोरी’ के मुद्दे को संसद के शीतकालीन सत्र तक खींचने का प्लान बनाया है…
1० से 2० अक्टूबर : ब्लॉक लेवल पर साइकिल और मोटरसाइकिल से ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ अभियान।
25 अक्टूबर से 25 नवंबर : ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ चौपाल, जिसमें वरिष्ठ कांग्रेस नेता शामिल होंगे।
1 नवंबर : दिल्ली के रामलीला मैदान में रैली।
25 और 26 नवंबर : 6 अलग-अलग जगहों से ‘चलो दिल्ली’ मार्च निकलेगा, जो 26 नवंबर संविधान दिवस के दिन दिल्ली पहुंचेगा।

राजेश श्रीवास्तव