लेखक परिचय

लिमटी खरे

लिमटी खरे

हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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देश की आर्थिक राजधानी मुंबई पर अब तक के सबसे बडे आतंकी हमले के इकलौते जिन्दा आतंकी अजमल कसाब को भारत सरकार सर माथे पर क्यों बिठाए हुए है, यह बात आज तक समझ में नहीं आई है। लगभग पांच सौ दिन बीतने के बाद भी उससे भारत सरकार कुछ भी नहीं उगला पाई है, और न ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ही इसके जवाबदार पाकिस्तान के खिलाफ ही कोई ठोस कार्ययोजना बना सकी है। मुंबई की अंडा जेल में कसाब आज देश का सबसे अधिक सुरक्षित व्यक्ति कहा जा सकता है। सच है कि अगर जनता के पैसे से भारत गणराज्य की सरकार द्वारा मुंबई हमले के जिंदा आरोपी कसाब को पाला जा रहा है तो यह देश के लिए सबसे बडे दुर्भाग्य की बात मानी जा सकती है।

गौरतलब होगा कि पूर्व में दुनिया के चौधरी कहे जाने वाले अमेरिका के तत्कालीन महामहिम राष्ट्रपति जार्ज बुश ने यह स्वीकार किया था कि उन्होंने वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले (9/11) के आतंकियों को ”वॉटरबोर्डिंग” जैसी अमानवीय यातना दी थी। यहां उल्लेखनीय तथ्य यह है कि इस तरह की यातना समूची दुनिया में प्रतिबंधित है। वॉटर बोर्डिंग जैसी थर्ड डिग्री से भी बुरी यातना में आरोपी को निर्वस्त्र कर उसका चेहरा कपडों से ढक दिया जाता है, और फिर उसके मुंह पर पानी की धार इतनी तेज मारी जाती है कि उसे डूबने का अहसास होने लगता है। इससे अभियुक्ति की जान भी जा सकती है। आरोपी जैसे ही अपने आप को मौत के करीब पाता है, वह टूट जाता है, और सच्चाई का बखान आरंभ कर देता है।

अमेरिका ने 9/11 के बाद अपने देश में सुरक्षा तंत्र की समीक्षा की और विदेशियों के आने के मसले में वीजा नियमों को बहुत ही कठोर कर दिया। आज किसी भी देश का नागरिक जब अमेरिका की सैर पर जाता है तो उसे कडे नियम कायदों के अनेक दौर से होकर गुजरना पडता है। अमेरिका को इस बात की चिंता नहीं है कि उसकी सरजमीं पर इन कडे नियमों के कारण कौन आता है और कौन आने से कतराता है। अमेरिका के लिए उसके नागरिकों की सुरक्षा सर्वोपरि है। इससे उलट हिन्दुस्तान में ”अतिथि देवो भव” की परंपरा के निर्वहन में नियम कायदों में छूट दिए जाने के अनेक मामले प्रकाश में आए हैं। यहां तक कि सार्वजनिक स्थानों, परिवहन के साधनों आदि में धूम्रपान प्रतिबंधित है, पर कोई भी गोरी या काली चमडी वाले को भारत गणराज्य में यह छूट है कि वह जहां चाहे वहां अपनी बीडी सिगरेट सुलगा सकता है। भारत सरकार द्वारा अपने ही नागरिकों के साथ इस तरह का सौतेला व्यवहार समझ से ही परे कहा जा सकता है।

हो सकता है भारत सरकार को यह भय हो कि नियमों के कडे करने से पर्यटकों की संख्या में कमी हो जाएगी। सीधी सी बात है जिसे भारत के इतिहास, यहां की पुरातात्तविक वस्तुओं, परंपराओं में जिज्ञासा होगी वह इन कडे नियमों को पार करके भी भारत आने का जतन करेगा। भारत के नागरिकों की सुरक्षा की कीमत पर पर्यटक अगर आते हैं तो यह किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं माना जा सकता है। मुंबई हमले के उपरांत कुछ दिन आतंकी शांत रहे फिर उनके हौसले बुलंदी की ओर दिखाई दे रहे हैं। भारत के लचर कानून के चलते आतंकियों के लिए हिन्दुस्तान मुफीद जगह होती जा रही है, जहां वे अपने नापाक इरादों को आसानी से परवान चढा सकते हैं।

जहां तक अब तक हुई आतंकी घटनाओं का सवाल है, तो इतिहास गवाह है कि भारत सरकार द्वारा अपनी नाकामियों पर पर्दा डालने के लिए सदा ही पडोसी देशों को कोसकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री की है। अब तक आतंकियों ने देश के न जाने कितने सपूतों को असमय ही काल के गाल में समाया है, पर भारत सरकार हाथ पर हाथ रखे ही बैठी रही। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि देश में अब तक की नपुंसक सरकारों द्वारा भारत गणराज्य के नागरिकों को सुरक्षा मुहैया कराने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया है। अपने आप को उदार कहकर भारत सरकार अपनी पींठ खुद अवश्य ही थपथपा सकती है, पर इस तथ्य को वह भी जानती है कि कायर और और नपुंसक भारत सरकार उदारता का चोला पहनने का स्वांग कर रही है।

विडम्बना देखिए कि अनेक लोगों को मौत के घाट उतारने और भारत सरकार एवं निजी क्षेत्र की संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाले आतंकियों में से जिंदा पकडे कसाब को पाला जा रहा है। उसकी सुरक्षा में सरकार कोई कोताही नहीं बरत रही है। यह सब कुछ जनता के पैसे से ही हो रहा है। मंहगाई और कर्ज से लदी फदी भारत की जनता भी चुपचाप हाथ बांधे इस तमाशे को देखने पर मजबूर है। हम महज इतना ही कहना चाहते हैं कि देश के बेटों को शहीद करने वाले इस कसाब को भारत सरकार को पालना है तो खूब पाले पर उसकी सुरक्षा और खान पान में खर्च होने वाले पैसे की वसूली जनसेवकों के मोटे वेतन से ही वसूले जाएं। देश की जनता अखिर इस भोगमान को क्यों भोगे। जिस भी सूबे में इस तरह की घटना हो तब पीडितों को या उनके परिजनों को दी जाने वाली सहायता राशि भी उसी राज्य के सांसद, विधायक, मंत्री और मुख्यमंत्री से वसूलना होगा, तभी जनसेवकों को समझ में आएगी और वे सरकारी सिस्टम पर दवाब बना पाएंगे।

यक्ष प्रश्न तो यह है कि कसाब को लगभग पांच सौ दिन तक इस तरह जिंदा रखकर भारत गणराज्य द्वारा आतंकियों को क्या संदेश दिया जा रहा है, यही न कि अगर वे मौके पर मारे नहीं गए तो उनकी सुरक्षा में भारत सरकार कोई कोर कसर नहीं रख छोडेगी। भारत सरकार द्वारा अगर कसाब को जिंदा रखकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी कोई तीर मारा होता तो बात समझ में आती। सारे सबूतों के बाद भी पाकिस्तान द्वारा भारत के तर्कों को बहुत हल्के में लिया जा रहा है। भारत की लचर कानून व्यवस्था में पेशी पर पेशी मिलती जा रही है, और कसाब मस्त हलुआ पुरी खाकर मुटा रहा है। किसी अन्य देश में अगर यह हुआ होता तो अब तक कसाब को कब का चौराहे पर लटका दिया गया होता, जिससे आतंकियों के हौसलों में काफी हद तक कमी आती,, पर क्या करें हम नपुंसक, कायर, नाकारा हैं जो उदारता का मौखटा लगाकर अपने ही आप को धोखा देने का प्रयास कर रहे हैं।

-लिमटी खरे

6 Responses to “क्यों पाला जा रहा है कसाब को!!”

  1. PRAMOD SHARMA

    अरे भाई तुम समझो इस में भी तो घोटाला करना है न, जी कासाब को जो बिरयानी मिल रही है उसमे भी तो घोटाला करना है इस लिए ही तो हमारे भारत में ही बम फट ते है , और कांग्रेश गवर्नमेंट को तो अगले दस साल नहीं आना ह
    प्रमोद शर्मा

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  2. Anand G.Sharma

    आप लोग तो कुछ समझते ही नहीं हो l अरे भाई, ये तो एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट है l आतंकी कसाब को अपने दामाद की तरह रख के लागत निकाली जा रही है कि और जो २०-२५ आतंकिओं को पाकिस्तान से चिरौरी कर के, आरजू मिन्नतें कर के मांग रहे हैं, उन्हें भी अपने दामाद की तरह रखने में कितना खर्च प्रति वर्ष आयेगा l फिर जब अपने दामादों की तरह खातिरदारी करके रखने से उनकी उम्र में १५-२० % का इजाफा होगा, हर साल मंहगाई बढ़ेगी, उन पर उसी तरह खर्च भी बढेगा, कितनी आरामगाह बनवानी पड़ेंगी, कितने पुलिस वाले और भर्ती करने पड़ेंगे, कितनी आर्मर्ड कार खरीदनी पड़ेंगी, कितने वकील रखने पड़ेंगे, कितने नए न्यायालय बनवाने पड़ेंगे, उनके लिए कितनी जगह, कितनी बिल्डिंगे बनवानी पड़ेंगी – इन सब बड़े प्रोजेक्टों पर होने वाले प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष खर्चों की लागत निकलना कोई हंसी खेल नहीं है – अच्छे अच्छे कास्ट एकाउनटेंट फेल हो जायेंगे l फिर उन खर्चों के हिसाब से भारत के मूर्ख आयकर दाताओं से कितना वसूला जा सकता है – आतंकी पोषण कर लगाया जा सकता है या उसकी आड़ में कोई भारत सुरक्षा कर या फिर आतंकी सद्भावना कर – इत्यादि सब करना पड़ेगा l आप लोग इतने बड़े प्रोजेक्ट के बारे में व्यर्थ के सवाल पूछ कर व्यवधान न डालें l कृपया थोडा धीरज रक्खें – धैर्य का फल मीठा होता है l

    Reply
  3. Ravindra Nath Yadav,

    kahi na kahin hamari nyaya vyavastha me kuch kami hai ki ‘aapradhiyon aur aapradh’ ki sankhya kam hone ke bajai nit pratidin unme vridhi ho rahi hai.nyaya milane me anek saal beet jate hai phir appeal phir nirnaya phir appeal aur phir nirnaya, ye anant cycle anek janmo tak chalti rahati hai.’kanoon ab darane wala nahi raha.yeh bhi ab ‘aamiri’ ka dikhawa hai.hamare ‘rajneetigyon par ek do nahi darzano mukadame hai aur ve hi hamara netritva kar rahe hai aur desh ki satta me hai.

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  4. Anand G.Sharma

    आप लोग तो कुछ समझते ही नहीं हो l अरे भाई, ये तो एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट है l आतंकी कसाब को अपने दामाद की तरह रख के लागत निकाली जा रही है कि और जो २०-२५ आतंकिओं को पाकिस्तान से चिरौरी कर के, आरजू मिन्नतें कर के मांग रहे हैं, उन्हें भी अपने दामाद की तरह रखने में कितना खर्च प्रति वर्ष आयेगा l फिर जब अपने दामादों की तरह खातिरदारी करके रखने से उनकी उम्र में १५-२० % का इजाफा होगा, हर साल मंहगाई बढ़ेगी, उन पर उसी तरह खर्च भी बढेगा, कितनी आरामगाह बनवानी पड़ेंगी, कितने पुलिस वाले और भर्ती करने पड़ेंगे, कितनी आर्मर्ड कार खरीदनी पड़ेंगी, कितने वकील रखने पड़ेंगे, कितने नए न्यायालय बनवाने पड़ेंगे, उनके लिए कितनी जगह, कितनी बिल्डिंगे बनवानी पड़ेंगी – इन सब बड़े प्रोजेक्टों पर होने वाले प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष खर्चों की लागत निकलना कोई हंसी खेल नहीं है – अच्छे अच्छे कास्ट एकाउनटेंट फेल हो जायेंगे l फिर उन खर्चों के हिसाब से भारत के मूर्ख आयकर दाताओं से कितना वसूला जा सकता है – आतंकी पोषण कर लगाया जा सकता है या उसकी आड़ में कोई भारत सुरक्षा कर या फिर आतंकी सद्भावना कर – इत्यादि सब करना पड़ेगा l आप लोग इतने बड़े प्रोजेक्ट के बारे में व्यर्थ के सवाल पूछ कर व्यवधान न डालें l कृपया थोडा धीरज रक्खें – धैर्य का फल मीठा होता है l

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  5. सुरेश चिपलूनकर

    सुरेश चिपलूनकर

    “… हम नपुंसक, कायर, नाकारा हैं जो उदारता का मौखटा लगाकर अपने ही आप को धोखा देने का प्रयास कर रहे हैं…” ये आपको आज पता चला? 🙂

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  6. रामेन्द्र मिश्रा

    Ramendra Mishra

    लिमती खरे जी आपके इस शानदार लेख के बाद भी हमारी इस नपुंसक सर्कार पर कोई असर पड़ेगा, ऐसा मानना स्वयं को दोखा देना होगा ! दरअसल हमारे सत्ता में ऐसे लोग बैठे है जिन्हें अन्य देशों की और एक खास बिरादरी की जिसे मुस्लमान कहते है , के तुष्टिकरण की चिंता ज्यादा रहतीं है !

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