मार्क्सवादियों को संघ सपने में क्यों आता है / विपिन किशोर सिन्हा

राष्ट्रीय स्वंसेवक संघ निस्संदेह एक हिन्दू संगठन है. लेकिन उसके अनुसार हिन्दुस्तान में रहनेवाला हर व्यक्ति जिसकी निष्ठा भारत में है – हिन्दू है. कई मुसलमान भी इस संगठन से जुड़े हुए हैं. भारत के पूर्व रेल मंत्री श्री जाफ़र शरीफ़ ने लोकसभा में स्वीकार किया था कि वे कांग्रेस में आने के पहले संघ की शाखाओं में जाते थे. संघ का मूल उद्देश्य है — हिन्दू समाज की विकृतियों यथा – जातिवाद और छूआछूत को मिटाकर हिन्दू समाज में एकता स्थापित करना. इसके स्वयंसेवक एक दूसरे को जातिवाचक संबोधनों से नहीं पुकारते. वे एक दूसरे को प्रथम नाम से ही बुलाते हैं. श्री अटल बिहारी वाजपेयी को सभी वाजपेयीजी कहकर बुलाते हैं लेकिन संघ के छोटे-बड़े सभी स्वयंसेवक उन्हें अटलजी ही कहते हैं. स्वयंसेवक एक दूसरे से कभी उसकी जाति नहीं पूछते. यह किसी भी दूसरे संप्रदाय या धर्म का विरोध नहीं करता. यह चरित्रवान, देशभक्त नागरिकों का निर्माण करता है. संघ का सपना है — भारत को पुनः विश्वगुरु के आसन पर स्थापित करना, इसे पुनः सोने की चिड़िया के रूप में संसार में मान्यता दिलवाना. संघ की राष्ट्रीयता से प्रभावित होकर ही सन १९६३ के गणतंत्र दिवस के परेड में शामिल होने के लिए पं. जवाहर लाल नेहरू ने संघ को आमंत्रित किया था और संघ के स्वयंसेवकों ने उसमें भाग भी लिया था. १९६५ के भारत-पाक युद्ध के दौरान प्रधान मंत्री स्व. लाल बहादुर शास्त्री के आग्रह पर संघ ने कई महत्त्वपूर्ण सरकारी प्रतिष्ठानों की सुरक्षा की जिम्मेदारी सफलता पूर्वक संभाली थी. देश के किसी भाग में भूकंप हो, बाढ़ आई हो, सुनामी घटित हुई हो, संघ के स्वयंसेवक सबसे पहले पहुंचकर राहत कार्य आरंभ कर देते हैं. संघ की यही राष्ट्रीयता कम्युनिस्टों को खटकती है. उन्हें यह डर हमेशा सताता रहता है कि अगर संघ इस देश में सफल हो गया तो उनकी दूकान बंद हो जाएगी.

पूर्व जनसंघ और वर्तमान भारतीय जनता पार्टी को आम जनता संघ का राजनीतिक धड़ा मानती हैं. संघवाले इससे इंकार करते हैं और भाजपा वाले भी स्वीकार नहीं करते, लेकिन यह सत्य है कि भाजपा संघ की एक राजनीतिक इकाई है. विश्व हिन्दू परिषद, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, सेवा समर्पण संस्थान, वनवासी कल्याण आश्रम, सरस्वती शिशु मंदिर, विद्या भारती आदि दर्जनों संगठन संघ के आनुषांगिक घटकों के रूप में देश के कोने-कोने में उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं. बी.बी.सी. के सर्वे के अनुसार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दुनिया का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन है. महात्मा गांधी के रामराज्य का सपना ही संघ का सपना है. दुनिया के हर देश के कम्युनिस्ट राष्ट्रवादी होते हैं. लेनिन और स्टालिन ने राष्ट्रवाद से प्रेरित हो सोवियत संघ का जो विस्तार किया था, वह किसी से छुपा नहीं है. चीन के ५६ प्रान्तों के एकीकरण में माओ की भूमिका सर्वोपरि थी. रूस और चीन के अंध राष्ट्रवाद ने कालान्तर में विस्तारवाद का रूप ले लिया. चीन ने तिब्बत को हड़पा तो रूस ने उज़्बेकिस्तान, कज़ाकिस्तान आदि एशिया के देशों को. कुछ दशक पूर्व दोनों कम्युनिस्ट देश थे लेकिन रूस के अधिकार में रहे “चेन माओ” द्वीप पर चीन के दावे ने दोस्ती को दुश्मनी में बदल दिया. न रूस ने राष्ट्रवाद से समझौता किया न चीन ने. चीन आज भी अपनी विस्तारवादी नीति से बाज़ नहीं आ रहा. भारत के अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख को आज भी वह अपने नक्शे में दिखाता है. भारत और चीन से सामान्य संबंधों के बीच चीन का विस्तारवाद ही रोड़ा बन हर बार सामने आ जाता है. संघ का राष्ट्रवाद विस्तारवाद का समर्थन नहीं करता. आश्चर्य तब होता है जब अंधराष्ट्रवादी लेनिन, स्टालिन और माओ को अपना आदर्श मानने वाले भारत के कम्युनिस्ट यहां राष्ट्रवाद का मुखर विरोध करते हैं. प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध के समय इन्होंने अंग्रेजों का समर्थन किया, १९६२ में भारत पर चीन के आक्रमण के समय चीन का समर्थन किया और अब भारत की एकता और अखंडता को तार-तार करने के लिए प्रतिबद्ध नक्सलवाद और इस्लामिक आतंकवाद का कभी प्रत्यक्ष तो कभी परोक्ष समर्थन करते हैं. अरुन्धती राय, मेधा पाटकर, मकबूल फ़िदा हुसेन जैसे फ़िरकापरस्तों को अपने लेखों, पत्र-पत्रिकओं के माध्यम से महिमामंडित कर राष्ट्रवाद पर खुले हमले के लिए प्रोत्साहित करते हैं.

जबतक जनसंघ या भाजपा का जनाधार कमजोर था, तबतक भारत के कम्युनिस्टों को इनके साथ मोर्चा बनाने तथा सरकार में शामिल होने में तनिक भी एतराज़ नहीं था. नई पीढ़ी को भले ही यह पता न हो लेकिन जिनकी उम्र ५० के उपर है, उन्हें अवश्य याद होगा कि बिहार में १९६७ में स्व. महामाया प्रसाद सिन्हा के नेतृत्व में गठित पहली गैरकांग्रेसी सरकार में, कम्युनिस्ट और जनसंघ, दोनों के मंत्री शामिल थे. इमर्जेन्सी का जनसंघ के साथ सीपीएम ने भी विरोध किया था. यह बात और है कि मौकापरस्त कम्युनिस्टों (सीपीआई) का एक धड़ा इन्दिरा गांधी की गोद में बैठकर सत्ता-सुख भोगता रहा. इमर्जेन्सी के दौरान मैं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का छात्र था. कम्युनिस्ट पार्टी के छात्र विंग (स्टूडेंट फ़ेडेरेशन आफ इंडिया) के कार्यकर्त्ता विद्यार्थी परिषद, संघ और समाजवादी छात्रों की गिरफ़्तारी के लिए खुलेआम कांग्रेसी कुलपति, कालू लाल श्रीमाली की मुखबिरी कर रहे थे. उन्हीं की अनुशंसा पर रात में छात्रावासों पर छापा मारकर पुलिस ने सैकड़ों छात्रों को गिरफ़्तार कर मीसा और डी.आई.आर के तहत जेल की हवा खिलाई. १९७७ में केन्द्र में जब जनता पार्टी की सरकार बनी, तो सी.पी.एम. ने अपना खुला और बिना शर्त समर्थन दिया. याद रहे, उस सरकार में सबसे बड़ा घटक जनसंघ ही था. १९८९ में वी.पी. सिंह के नेतृत्व में केन्द्र में जब दूसरी गैरकांग्रेसी सरकार बनी, तो भाजपा और सीपीएम एकसाथ बाहर से समर्थन दे रहे थे. उस समय कम्युनिस्टों को न भाजपा सांप्रदायिक लग रही थी न राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ. ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा और अंधविरोध तब शुरू हुआ जब कम्युनिस्टों को यह एहसास हुआ कि भारतीय राजनीति में भाजपा कांग्रेस की सब्सिटीट्युट बनकर उभर रही है. अब उन्हें कांग्रेस से परहेज़ नहीं है क्योंकि यह एक छद्म राष्ट्रवादी दल है.जिस कांग्रेस ने आपातकाल के दौरान सीपीएम कार्यकर्ताओं पर दिल दहला देनेवाले अमानवीय अत्याचार किए थे, उसी कांग्रेस की पालकी सीताराम येचूरी, प्रकाश कारंत और सोमनाथ चटर्जी पांच साल तक ढोते रहे. कामरेड सोमनाथ ने तो पद के लिए पार्टी ही छोड़ दी. कम्युनिस्ट पार्टी को मुस्लिम लीग धर्मनिरपेक्ष दिखाई देती है और भाजपा सांप्रदायिक.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की निष्काम राष्ट्रभक्ति कभी न कभी रंग अवश्य लाएगी. रावण पर राम और कंस पर कृष्ण की विजय की तरह ही राष्ट्रवादियों के हाथों देशद्रोहियों की पराजय निश्चित है. जैसे-जैसे भारतीय जनमानस में राष्ट्रवाद की स्वीकार्यता बढ़ रही है, कम्युनिस्टों का क्षेत्र सीमित होता जा रहा है. राष्ट्रवाद का उदय कम्युनिस्टों के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा है. यही कारण है कि उनके सपनों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भूत हमेशा आता है और वे मुसलमानों से भी ज्यादा संघ का अंधविरोध करते हैं.

3 thoughts on “मार्क्सवादियों को संघ सपने में क्यों आता है / विपिन किशोर सिन्हा

  1. सिन्हा जी
    सुंदर साधो साधो

    राष्ट्राय नमः पुनः पढें और उठाए प्रश्नों पर विचार करें।
    मैं व्यक्तिगत रुप से अपने बड़े संघी भाई द्वारा परिवार के किए सत्यानाश से बहुत त्रस्त हूं। अरे एक संघी की जरुरत मात्र दिन भर के २० रुपये रोटी पानी और मामूली पोशाक- संसार तो संसार के नियमों से चलता है साब, आध्यात्म से नहीं।

    फिर भी वैचारिक रुप से आपके साथ हूं, संघ की एक ही कमजोरी है दुष्टों को मजबूर न कर पाना और हो जाने देना और बस स्वयं को ही सही मानना- कमल को मैंने इसीलिए सबसे चालाक धूर्त बदतमीज कृतघ्न फूल मानता हूं कि वह कीचड़ में खिल कर अपने रुप को दिखाना चाहता है कीचड़ से सरोकार नहीं रखता, कीचड़ से पोषण तो लेता है पर कीचड़ का सगा नहीं होता- भाजपा और उसके लोग ऐसे ही डबल स्टैंडर्ड के पवित्र पापी हैं।
    सादर

  2. विपिन जी,
    आपका यह लेख अत्यंत महत्वपूर्ण है और संघ के सम्बन्ध में तथ्याधारित निष्कर्ष प्रस्तुत करता है. मैं आपके साथ पूर्णत: सहमत हूँ कि भारत में साम्यवादियों को राष्ट्रवाद के उभार से खतरा है, इसीलिए वे उसके धुर विरोधी हैं. साम्यवाद ने विश्व भर में निश्चित ही पराजय का मुख देखा है और भारत में भी यह निष्प्रभ हुआ है लेकिन इस पर भी इसे निष्क्रिय हुआ अभी नहीं माना जा सकता. जिन किसान मजदूरों के हितचिंतन के नाम पर इसका उभार हुआ था उनका कितना हित साधन इसके भारतीय ध्वजवाहक गत अनेक दशकों में कर पाए हैं इसकी भी समीक्षा किए जाने की आवश्यकता है.
    जिन्हें राष्ट्र शब्द से ही चिढ है वे राष्ट्रवाद का सही मूल्यांकन क्या करेंगे?
    नरेश भारतीय

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