बकरी दीदी क्यों कहलाती हैं ये महिलाएं?

उषा राय

बकरियों की तीसरी बड़ी आबादी बिहार राज्य में पाई जाती है, यहां की कई महिलाएं पशु सखी और बकरी दीदी के नाम से भी प्रसिद्ध है, जो बकरी पालन के द्वारा अपने जीवन स्तर में सुधार ला रही हैं। बिहार के मुजफ्फरपुर जिले की अधिकतर महिलाएं बकरी पालन के गुणों को सीख कर बकरियों की उत्पादन औरउत्पादक क्षमता को बढ़ाने के साथ साथ अपने आत्मविश्वास को भी बढ़ा रही हैं।

इस कार्य हेतू मुजफ्फरपुर के बोचाचा प्रखंड में बकरीयों के लिए उत्तम किस्म का घास उगाने के उद्देश्य से अलग से जमीन की व्यवस्था की व्यवस्था भी की गई है जहां बकरीयों के लिए पोषित घास उगाया जाता है। ताकि बकरीयों के स्वास्थ में सुधार हो और असमय मरने की संख्या पर रोक लगाया जा सके। स्वस्थ बकरियां अधिक मात्रा में दूध देती हैं, दूध बेचकर महिलाएं लाभ कमा रही हैं।

बकरी पालन को बढ़ावा देने के लिए मिशा नामक प्रोजेक्ट की शुरुआत 2016 के मध्य में उस समय हुई जब Aga Khan Rural Support Programme (AKRSP) को Bill and Melinda Gates Foundation की ओर से वित्तिय सहायता मिली। वास्तव में फाउंडेशन द्वारा समर्थित यह देश का पहला पशुधन विकास कार्यक्रम है। पिछले कुछ सालों में मुजफ्फरपुर के 351 गांव में इस प्रोग्राम का प्रभाव फैल चुका है और अधिक संख्या में महिलाएं इससे जुड़कर रोज़गार पा रही हैं। इस योजना को बिहार ग्रामीण आजीविका परियोजना के अंतर्गत चलने वाले प्रोग्राम “जीविका” के साथ मिलकर बिहार के अन्य जिलों में चलाने की भी योजना है।

एक अनुमान के अनुसार महिलाओं की 70 प्रतिशत आबादी बकरी पालन के इस प्रोग्राम से जुड़कर रोज़गार पाकर सशक्त हो रही हैं।

इसका सबसे बड़ा साक्ष्य है बकरी पालन के स्वंय-सहायता समूह के  इस कार्य के कारण महिलाएं ग्राम पंचायत में जॉब कार्ड तक अपनी पहुंच बना रही हैं ओर परिवार में उनका मह्तव भी बढ़ रहा है। इन पशु सखियों का चयन स्वंय-सहायता समूह के अंतर्गत किया गया जिसमें कार्य के प्रति महिलाओं की रुची ओर क्षमता के आधार पर उनका चयन हुआ। इसके लिए परिवार की सहमति भी मांगी गई क्योंकि पशु सखियों को प्रशिक्षण के लिए लंबे समय तक अपने घरों से बाहर रहने के साथ बकरियां चलाना पड़ता है। परिवार की सहमति न हो तो प्रशिक्षण नही दिया जाता है।

अब तक 107 महिलाओं को पशु सखियों का प्रशिक्षित दिया गया है और 143 को प्रशिक्षित किया जाना है। प्रत्येक पशु सखी के पास 200 घरों में बकरियों के कल्याण अर्थात् देखभाल की जिम्मेदारी है। परियोजना मिशा शुरू होने से पहले बकरियों में मृत्यु दर बहुत अधिक थी। लेकिन इस परियोजना की शुरुआत और पशु सखी के प्रशिक्षण लेने के बाद इसकी संख्या में कमी आई है क्योंकि अब पशु सखी बकरियों के टिकाकरण, खाने पीने से लेकर समय समय पर उनके वजन को मापने जैसे कार्य करके बकरियों के स्वास्थ की पूरी देखभाल करती हैं जिससे बकरी पालन में लाभ ही लाभ मिल रहा है। हांलाकि बिना प्रशिक्षण के जब महिलाएं बकरीयां पालती थी तो सही देखभाल न मिलने के कारण बकरी असमय मर जाया करती थी या कमज़ोर दिखने के कारण बेचने पर भी महिलाओं को सही मूल्य नही मिल पाता था परंतु प्रशिक्षण के कारण सीखे गए गुणो से महिलाओं ने बकरियों की सही देखभाल का तरीका न सिर्फ जाना बल्कि होली और ईद जैसे त्योहारों के अवसर पर उन्हे बेचने पर अब पहले से काफी अच्छे दाम मिल जाते  हैं।

AKRSP  द्वारा इन सारे कार्यो के लिए सभी उपकरणो के अतिरिक्त पहले साल में महिलाओं को 1500 रुपए का मासिक वेतन दिया जाता है परंतु दूसरे साल में यह 750 रुपए प्रति माह हो जाता है और तीसरे साल में वो बकरीयों का वजन करना, बधिया करना, टीकाकरण करना जैसे कामों द्वारा अपनी कमाई स्वंय करने लगती हैं जो कहीं न कहीं उनके आत्मनिर्भर होने का सबूत होता है।

इस संबध में शांतिपूर गांव की पशु सखी शीला देवी कहती हैं “ पहले बधियाकरण चाकू के द्वारा किया जाता था जिसके कारण खून आना या बकरी के खून में संक्रमण होना आम बात थी लेकिन प्रशिक्षण के दौरान हमने जो विधि सीखी है उससे कभी भी ऐसा नही हुआ और पूरी सुरक्षा के साथ बधियाकरण की प्रक्रिया समाप्त हो जाती है। इस सफलता के कारण आज कई लोग इस काम के लिए मुझसे सुझाव लेने भी आते हैं। अधिकतर लोग हमें बकरी दीदी के नाम से ही पुकारते हैं“।

अन्य महिला मुन्नी देवी ने पशु सखी के नए रुप के चेहरे को सामने लाया है वो कहती हैं “लगभग ढाई साल से ज्यादा समय से मैं इस काम को करती आ रही हूं इस दौरान मैने लगभग 900 बकरियों की देखभाल की है जिससे इस काम के प्रति मेरे आत्मविश्वास में वृद्धि हुई है। जबकि शुरुआत में मुझे यह काम काफी मुश्किल लग रहा था, जब मैं टिकाकरण के लिए बकरियों को पकड़ती थी, मेरे हाथ में कपकपाहट होती थी लेकिन प्रशिक्षण के सारे सत्र में मैने ध्यानपूर्वक भाग लिया और धीरे धीरे सभी कामों के प्रति रुची और आत्मविशवास दोनो बढ़ने लगा। पिछले एक सालों में मैने 60 टीकाकरण किये हैं और आवश्यकता पड़ने पर रात के समय भी बकरियों की देखभाल के लिए कहीं जाने से पीछे नही हटती”।

शीला देवी और मुन्नी देवी जैसी कई महिलाएं हैं जो बकरी पालन के क्षेत्र में प्रत्येक काम को सीख कर अपने लिए रोज़गार तैयार कर दूसरो के लिए भी रोजगार के विकल्प खड़ी कर रही हैं।

निश्चित ही ग्रामीँण महिलाओं को सशक्त और आत्मनिर्भर बनाने के इस सराहनीय तरीके को और बड़े स्तर पर पूरे देश में चलाया जाए तो न सिर्फ ग्रामीण भारत की महिलाओं की आर्थिक स्थिति में सुधार आएगा बल्कि गांवो का देश कहलाने वाले भारत की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।

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