विश्ववार्ता

न्यूयॉर्क से निकला हिन्दुत्व का संदेश क्या ममदानी और आसिफ महमूद समझेंगे?

डॉ. मयंक चतुर्वेदी

न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने जिस ‘वननेस’ का संदेश दुनिया के सामने रखा, वह सार्वभौमि‍क विषय है। वस्‍तुत: जिस यात्रा और कार्यक्रम को लेकर न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी और अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग के अध्यक्ष आसिफ महमूद समेत कुछ संगठनों की ओर से विरोध के स्वर उठे, उसी न्यूयॉर्क से आज ऐसी भारतीय दृष्टि सामने आई, जिसका केन्द्र मानवता, विविधता और एकता है।

‘यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन’ में डॉ. भागवत ने स्पष्ट किया कि मनुष्य अलग हो सकते हैं, उनकी भाषाएं, राष्ट्रीयताएं, रिलीजन और जीवन-पद्धतियां अलग हो सकती हैं, किंतु इन विविधताओं के कारण मानवता के मूल संबंध को नकारा नहीं जा सकता। भारतीय दृष्टि विविधता के भीतर मौजूद एकता को पहचानने की दृष्टि है।यहां डॉ. भागवत ने उस बुनियादी भ्रम की ओर भी ध्यान दिलाया जिसमें भारतीय ‘धर्म’ को पश्चिमी अर्थ के ‘रिलीजन’ के बराबर रख दिया जाता है। भारतीय चिंतन में वह व्यापक सिद्धांत है जिसके आधार पर जीवन और समाज में व्यवस्था तथा संतुलन कायम रहता है।

रिलीजन किसी व्यक्ति की आस्था और पूजा-पद्धति हो सकता है, जबकि धर्म व्यक्ति के आचरण से लेकर समाज और प्रकृति के साथ उसके संबंध तक विस्तृत है, इसलिए हिन्दुत्व का यह स्वरूप किसी दूसरे रिलीजन को पराजित करने या समाप्त करने का आग्रह नहीं करता, वह व्यक्ति, समाज और पर्यावरण के बीच संतुलन की बात करता है। वहीं, डॉ. भागवत ने विकास के उस मॉडल पर भी प्रश्न उठाया जिसमें एक पक्ष की प्रगति दूसरे के दमन पर आधारित हो। उनका संदेश स्‍प्‍ष्‍ट था कि व्यक्ति, समाज और पर्यावरण इन तीनों को साथ लेकर आगे बढ़ना होगा, तभी मानव कल्‍याण है।

हिन्दुत्व का अर्थ क्या है, न्यूयॉर्क से दुनिया ने सुना

पश्चिमी राजनीतिक विमर्श में हिन्दुत्व को लेकर लंबे समय से अनेक धारणाएं रही हैं। इसे राजनीतिक बहुसंख्यकवाद, धार्मिक वर्चस्व अथवा पहचान के संघर्ष के चश्मे से देखा जाता रहा है, जबकि मैडिसन स्क्वायर गार्डन से भागवत का संदेश इस दृष्टि से अलग वैचारिक पाठ प्रस्तुत करता दिखाई दिया। यहां हिन्दुत्व सबको जोड़ने की बात कर रहा था। यहां विविधता से भय के स्‍थान पर सम्मान का आग्रह था। अपनी आस्था छोड़ने के स्‍थापर दूसरे की आस्था के प्रति सम्मान की बात थी। साथ ही एकरूपता थोपने के स्‍थान पर विविधता के भीतर मौजूद एकता को पहचानने की बात थी।

भारत को भौगोलिक राष्ट्र से आगे सभ्यतागत भूमिका में देखें

डॉ. भागवत के संदेश में भारत की सभ्यतागत भूमिका भी स्पष्ट रूप से सामने आई। प्रत्येक राष्ट्र की अपनी भूमिका, संदेश, मिशन और नियति हो सकती है। भारत की भूमिका दुनिया की विविधताओं के बीच मौजूद एकता को पहचानने और समय-समय पर मानवता को उसकी याद दिलाने की रही है। उन्होंने अमेरिका में बसे भारतीयों से भी आग्रह किया कि वे अपने आचरण से भारत की इस सभ्यतागत भूमिका को सामने रखें। हिन्दुत्व का दावा व्यवहार से प्रमाणित होना चाहिए।

पैसा, पद और सुविधा से आगे है जीवन

भागवत ने भौतिक सुख और समृद्धि को स्‍वीकार्य करते हुए उन्हें जीवन की अंतिम सत्‍य न मानकर भारतीय दर्शन में अर्थ और काम के पुरुषार्थों से जोड़कर समझाया और बताया कि कैसे इनके साथ धर्म और मोक्ष की अवधारणा जीवन को व्यापक अर्थ देती है। व्यक्ति कितना कमाता है, यह महत्वपूर्ण है, किंतु उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि वह अपनी कमाई, क्षमता और सामर्थ्य का कितना उपयोग दूसरों के लिए करता है। सफलता का भारतीय दृष्टिकोण संग्रह से आगे बढ़कर साझेदारी, सेवा और परहित की भावना को महत्व देता है।

अमेरिका में बसे भारतीयों के लिए भागवत का संदेश भी स्पष्ट था। अमेरिका उनकी कर्मभूमि है और उसके प्रति उनकी जिम्मेदारी है। वहां रहने, काम करने और जीवन बनाने वाले भारतीयों को अमेरिका के प्रति ईमानदार और जिम्मेदार होना चाहिए। भारत के साथ उनका संबंध जन्मभूमि और उससे मिले संस्कारों का है। भारत के लिए कुछ करना चाहें तो करें, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण यह है कि भारत से मिले मूल्यों को अपने जीवन में उतारें।

अब सवाल ममदानी और आसिफ महमूद से

यहीं से सवाल उठता है कि जिन लोगों ने इस यात्रा और कार्यक्रम का विरोध किया, क्या उन्होंने वास्तव में उस संदेश को सुना और समझा जो मैडिसन स्क्वायर गार्डन से सामने आया? यदि किसी मंच से हिन्दू धर्म के नाम पर किसी दूसरे रिलीजन को मिटाने, किसी समुदाय को समाप्त करने या किसी मनुष्य को नीचा दिखाने का आह्वान होता, तो उसका विरोध समझ में आता। पर यहां संदेश क्या था? विविधता का सम्मान, एकता की पहचान, व्यक्ति-समाज-पर्यावरण के बीच संतुलन, दूसरे मनुष्य में भी उसी अस्तित्व को पहचानना और मानव जीवन को सेवा से जोड़ना। तो प्रश्न यही है; क्या विरोध करने वालों ने इस संदेश को आत्मसात किया?

विरोध के बीच ‘वननेस’ का संदेश

दुनिया आज धार्मिक पहचान के नाम पर संघर्ष, युद्ध, विस्थापन, पूर्वाग्रह, कट्टरता, सामाजिक ध्रुवीकरण और डिजिटल माध्यमों से फैलती नफरत जैसी चुनौतियों से जूझ रही है। ऐसे समय में भागवत का संदेश मनुष्य को उसकी संकीर्ण पहचान से आगे देखने की चुनौती देता है। पहचान अलग हो सकती है, अस्तित्व अलग नहीं। पूजा-पद्धति अलग हो सकती है, मानवता अलग नहीं। भाषा अलग हो सकती है, संवेदना अलग नहीं। जीवन-पद्धति अलग हो सकती है, मनुष्य होने का मूल सत्य अलग नहीं, वास्‍तव में डॉ. भागवत के शब्‍दों में यही ‘वननेस’ है।यही भारतीय दृष्टि है।

संदेश अब दुनिया के सामने है

न्यूयॉर्क से हिन्दुत्व का यह संदेश निकल चुका है। इसे सुनना या न सुनना किसी की व्यक्तिगत पसंद हो सकती है, किंतु सनातन हिन्दू दर्शन को समझे बिना हिन्दुत्व पर अंतिम फैसला सुनाना कठिन है। डॉ. भागवत ने एक बार फिर यह बताने का प्रयास किया कि हिन्दुत्व की भारतीय अवधारणा मानवता को जोड़ने वाली दृष्टि है। अत: आज आवश्यकता इस बात की है कि हिन्दुत्व को सिर्फ राजनीतिक या सीमित पहचान के चश्मे से देखने के बजाय उसके सार्वभौमिकता और सर्वकल्याण के दर्शन को भी समझा जाए। न्यूयॉर्क से उठी ‘वननेस’ की आवाज इसी कारण अमेरिका से लेकर दुनिया की हर राजधानी और हर मनुष्य के हृदय तक पहुंचने योग्य संदेश बन गई है।