राजनीति

क्या देश को सड़क की भीड़ और यूट्यूबर्स चलाएंगे?

अशोक गुप्त

मैं उन दिल्ली वालों में से हूं जो जो सड़कों पर बढ़ती भीड़ और जाम से दुखी हो चुके हैं. मैंने वो दिन देखे हैं जब दिल्ली में वाहनों की संख्या काफी कम थी. चाहे सड़कें  भी कम चौड़ी थी पर सड़कों पर चलना एक मधुर अनुभव हुआ करता था पर हर साल लाखों की संख्या में वाहन बढ़ते जाने से हालत यह हो चुकी है कि अब सड़कों पर चलना बहुत कठिन कार्य हो गया है. जगह-जगह सड़कों पर जाम, वाहनों की बढ़ती संख्या से गाड़ी चलाना या किसी कैब में या ऑटो में यात्रा करना बहुत कठिन कार्य हो चुका है.

ऐसे में जब कोई राजनीतिक दल या कोई कॉकरोच जनता पार्टी जैसी संस्था कोई बंद की कॉल दे दे या कोई प्रदर्शन की कॉल दे दे तो ऐसे में ऐसे में कोफ्त होना बहुत स्वाभाविक है. मैंने वह समय भी देखा था जब दिल्ली में शाहीन बाग में एक समुदाय ने एक मुख्य सड़क पर कब्जा कर लिया था और अपना तम्बू गाड़ कर बैठ गए थे जिसके कारण एक महीने तक वहां ट्रैफिक  रुका रहा. लोगों को बहुत घूम कर बहुत चक्कर लगा कर काफी तकलीफ से जाना पड़ रहा था और सरकार कुछ नहीं कर पाई थी.

इसी प्रकार पिछले दिनों जब कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन दिल्ली में हुआ तो उन्होंने जंतर मंतर पर कब्जा कर लिया और वहां से यातायात को किसी और रास्ते से जाना पड़ा जिसे वाहनों को और वाहनों पर चलने वाले लोगों को बहुत कठिनाई उठानी पड़ी. सरकार भी इस कठिनाई से वाकिफ है और इसीलिए उसने इस बार कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन की कॉल होने पर शुरू से ही ऐसा बंदोबस्त किया कि कॉकरोच जनता पार्टी वाले जंतर मंतर पर बैठकर कब्जा न कर सकें. पिछली बार केवल जंतर मंतर पर कब्जा ही नहीं हुआ था बल्कि यह दिल्ली और देश के जितने आलतू फालतू के लोग थे जिन्हें सरकार से कोई नाराजगी थी या केवल मजे लेने के लिए वहां मुफ्त बांटे जाने वाले भोजन का आनंद लेने के लिए और पिज्जा बर्गर खाने के लिए एक अड्डा मिल गया था जहां जाकर वे  दिन भर सरकार को नेताओं को गंदी-गंदी गालियां दे रहे थे.

 मीडिया कर्मियों की रुचि होना स्वाभाविक है पर मीडिया के नाम पर यूट्यूबर्स  ने हालत और ज्यादा खराब कर दी थी. वे  हर बात को सेंसेशनलाइज करके ऐसा माहौल बना रहे थे मानो  आसमान सर पर गिर पड़ा हो।  वास्तव में आंदोलन इतना बड़ा नहीं था पर यूट्यूबर्स के द्वारा इतना बड़ा रूप दिखा दिया गया तो लोगों की संख्या बढ़ती गई और आखिरकार सरकार को तंग आकर धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफा दिलवाना पड़ा  पर हर बार यदि ऐसा ही किया जाए तो फिर सरकार की साख क्या रह जाएगी. अगर सरकार इसी प्रकार सड़क की भीड़ के सामने झुकती रही तो सरकार देश नहीं चला पाएगी. देश वही लोग चलाएंगे जो सड़क पर भीड़ इकट्ठी करके देश को चलाना चाहेंगे. क्या डेढ़ अरब की आबादी वाले देश को सड़क पर 10-15000 लोगों का जमावड़ा चलाएगा. इस बात पर हमें विचार करना चाहिए. सरकार ने यह बहुत अच्छा कार्य किया है जो जंतर मंतर पर प्रदर्शन करने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है और भविष्य में उसको डीनोटिफाई कर दिया है जिससे अब वहां प्रदर्शन नहीं हो पाएंगे.

 जंतर मंतर के आसपास का क्षेत्र कनॉट प्लेस और संसद भवन है जहां विदेशियों का भी बहुत आना जाना रहता है और वहां इस प्रकार का माहौल होने से विदेशियों में भी हमारी छवि खराब होती है. इससे कनॉट प्लेस के व्यापार का भी बहुत बड़ा नुकसान होता है इसलिए सरकार का यह कदम भविष्य में इस तरह के प्रदर्शनों को काबू करने में सफल सिद्ध होगा. अब जिसे प्रदर्शन करना है, वह रामलीला मैदान में जाकर करें या बुराड़ी में या सीबीटी ग्राउंड में बड़े स्थान पर आप अपना प्रदर्शन कीजिए. आपको जो करना है कीजिए किंतु आप नगर निवासियों की जिंदगी को हराम नहीं कर सकते. उन्हें इस शहर में रहने का हक है, उन्हें यहां की सड़कों पर चलने का हक है, उन्हें मेट्रो में यात्रा करने का हक है और उन्हें कहीं भी आने जाने का हक है और इस हक को कोई कॉकरोच जनता पार्टी किसी भी बहाने से छीन नहीं सकती. यह संदेश इस सरकार और पुलिस ने हमें दिया है .

अशोक गुप्त