डॉ केशव बलिराम हेडगेवार ने 1925 में विजयादशमी के दिन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना करी थी। चिकित्सा विज्ञान में एमबीबीएस की डिग्री प्राप्त डॉ हेडगेवार संघ के प्रथम ‘सरसंघचालक’ के रूप में याद किये जाते हैं. अगले संघ चालक बने गुरु गोलवलकर, जो बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में जीव विज्ञान के प्रोफेसर भी रहे. एक बार एक पत्रकार ने उनसे प्रश्न किया कि उनकी दृष्टि में देश की सबसे ज्वलंत समस्या क्या है? उनका उत्तर था- ‘ ज्वलंत समस्या , ज्वलंत बनी रहे . पर, हमारा एकमात्र लक्ष्य हिन्दुओं का संगठन खड़ा करना है. संगठन ही शुरुआत है, संगठन ही अंत है.’ सच तो ये है , गुरू गोलवलकर के मुख से कोई अभिनव बात नहीं निकली . वो तो संघ का वही लक्ष्य बता रहे थे , जिस लक्ष्य को लेकर सदियों से देश के अनेकों महापुरुष आगे बड़े. 508 ईसवीं में आदि शंकराचार्य दक्षिण भारत के केरल में जन्मे थे . परंपरा अनुसार यज्ञोपवीत संस्कार के समय ब्रह्मचारी प्रथम भिक्षा अपनी माँ से ही मांगता है . पर आचार्य शंकर ने गाँव में सफाई का कार्य करने वाली महिला के सम्मुख जाकर पाँव पड़े और कहा, माँ, भिक्षाम देहि, और अन्न ग्रहण किया. केरल से चलकर ओंकार नाथ तीर्थ में नर्मदा तट पर पहुंचे . और वहां रहकर उन्होंने श्री गोविन्द्दपाद से सन्यास की दीक्षा ली. करुणा अवतार बुद्ध को भगवान विष्णु का नवम अवतार मानकर, समाज के एकीकरण में क्रन्तिकारी कदम उठाया. और साथ ही बुद्ध की अनेक शिक्षाओं को सनातनी हिन्दुओं के चिंतन से एकाकार कर दिया, जिससे समाज में व्याप्त भेदभाव को बहुत हद तक कम करने में सफलता मिली. समरसता और संगठन का जो कार्य संघ ने हाथ में लिया वो अभूतपूर्व नहीं. हाँ इसकी कार्य-पद्धति जरूर अनूठी कही जा सकती है; और इसका अनुसरण करने वाले स्वयंसेवकों में आवश्यक गुण, विशिष्टता से औत-प्रोत. व्यक्ति से बड़ा संगठन, संगठन से भी बड़ा राष्ट्र. सामूहिक भाव, मतलब ‘मैं’ के स्थान पर ‘हम सब’ का भाव . चिंतन प्रक्रिया नीचे से ऊपर , और एक बार निर्णय पर पहुँचने पर उसका अनुपालन ऊपर से नीचे . संगठन की योजना से कार्य में लगना आदि संघ की कार्य पद्धति का अंग हैं. इस प्रक्रिया से होकर निकले स्वयंसेवक के विषय में संघ के वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत ने जो कहा वो आगे सब-कुछ बताने के लिए काफी कहा जा सकता है-: ‘बीज से वृक्ष बनता है, और बीज को मिट्टी में मिल जाना पड़ता है। समर्पण ही बीज की ताकत है. संघ ऐसे लोगों से चलता है, जो होते तो हैं पर दिखते नहीं.’ कार्य की प्रतिष्ठा नाम की नहीं। इसलिए आगे कहा गया है कि स्वयं सेवक की यह अनामिकता , ही संघ की विशेषता भी है , और शक्ति भी।” संघ की सौ वर्षों की उपलब्धियों पर विचार करें तो बाकी सब बातों पर अलग-अलग निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। लेकिन एक बात सुनिश्चित है कि संगठन की दिशा, उसका विचार , कार्य पद्धति को लेकर कोई संशय नहीं दिखता।
प्रश्न ये उठता है कि हिंदुओं के बीच ही कार्य क्यूँ? इतिहास में झाँके तो भारत के गौरव का काल-खंड; संघर्ष का काल-खंड ; पतन का काल खंड हिंदुओं के कारण ही प्रस्तुत हुआ । याने कि उत्थान-पतन का कारण ये ही समाज रहा।
हिन्दू क्यू बचना चाहिए ? क्योंकि जिस धर्म का ये वाहक है वो प्रकृति-प्रदत्त धर्म है। इसलिए इसके ऊपर सम्पूर्ण विश्व को मार्ग दिखाने का ईश्वर-प्रदत्त कार्य का दायित्व है। इतिहास भी ये ही बताता है कि इस समाज ने संघर्ष किया लेकिन किसी देश पर आक्रमण नहीं; अच्छा जीवन सिखाने गए, लूट-पाट करने नहीं; शस्त्र लेकर पराजित करने नहीं, शास्त्र लेकर हृदय जीतने गए। हिन्दू उस धर्म का वाहक है जो कहता है, कर्णवन्तु विश्वमार्यम ; एकम सत्य विप्र बहुधा बदन्ती ; वासुदेव कुटुंबकम
प्रश्न ये है कि सिद्धांत श्रेष्ठ रहे, समाज दुर्बल तो कोई नहीं सुनता- इसलिए हिन्दू संगठन, और केवल इसलिए नहीं कि सामने शत्रु है । द्वितीय सरसंघचालक गुरु गोलवलकर से दिल्ली में हुई पत्रकार वार्ता में एक पत्रकार ने पूछा मेरे गाँव में एक भी ईसाई या मुसलमान नहीं है। तो मेरे गाँव में संघ का क्या काम? तो गुरुजी ने उत्तर दिया कि संघ ईसाई या मुसलमानों के लिए नहीं चलता है । तुम्हारे गाँव क्या, पूरी दुनिया में अगर एक भी ईसाई या मुसलमान न होता और जात-पात में बंटे हिन्दू समाज की ये दशा होती तो संघ चलता ही चलता।
चलते प्रवाह में समाज में गंदगी आएगी, कमियाँ आएंगी और उसे रोक नहीं सकते । हाँ उसे निकालते रह सकते हैं, और इसी कार्य का नाम आरएसएस है। हिन्दू समाज की विशेषता है ये किसी एक केन्द्र से संचालित नहीं होता , ये बहु-केद्रित है। इसलिए इसे मृत्युन्जय कहा गया है । (संघ शताब्दी वर्ष , भैया जी जोशी)