लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

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आचार्य डॉ राधे श्याम द्विवेदी ‘नवीन’

बनना राम आसान बहुत पर ,राम क्या तुम बन पाओगे।
राम नहीं बन सके अगर, तो रावण क्या बन पाओगे ।।

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बल विद्या वैभव कौशल में, इस सीमाहीन धरातल पर।
कुबेर की स्वर्ण नगरी जैसा,लंका को उसने धारण करी।।

इंद्रजाल तंत्र सम्मोहन,जादू टोने सबका वह ज्ञाता था।
सदियों दर सदियों पहले ,पुष्पक विमान का धाता था।।

चौसठ सालका पुरुषों में, रावण की गिनती होती थी।
आगामी जैन चौबीसी में उस ज्ञानी की प्रतिष्ठा होवेगी।।

दशमुख दशविद्याओं में दक्ष,रावण ने राम से शत्रुता की।
सब रामकृपा सब रामप्रताप,मोक्ष के लिए नीचता की।।

महापण्डित था शिवभक्त, वह राजनीति का ज्ञाता था।
त्रिकालदर्शी स्त्रोतसंहिता, शास्त्रों का वह रचयिता था।।

परिजन रक्षा के लिए प्रतिबद्ध,परनारी को सम्मान दिया।
कुशलशासक परहितकारी, प्रकांड वैज्ञानिक मान लिया।।

राम बनो या रावण बनो, यह सब निर्भर आप पर है ।
पर जो भी करो मन से करो,सब कुछ करना आप पर है।।

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