लेखक परिचय

प्रवीण गुगनानी

प्रवीण गुगनानी

प्रवीण गुगनानी, दैनिक समाचार पत्र दैनिक मत के प्रधान संपादक, कविता के क्षेत्र में प्रयोगधर्मी लेखन व नियमित स्तंभ लेखन.

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कहाँ से आ रही है हवा ? ये पता नहीं

बस इसमें बसी देह गंध पहचान आती है.

तभी तो पहचाना कि तुम

बहती हवा की दिशा में हो.

 

नहीं है इसमें वो सब कुछ

जो एक पहाड़ पर होता है

शिखर, गरिमा,संपदा, और थोड़ी जड़ता भी

बस है तनिक सहजता

जो

सदा उँगलियों में सनी रहती हैं तुम्हारी.

 

हवा जो बसी थी तुममे

सीधे इधर ही आ रही है

ऐसे जैसे नहीं है चेतना  समुद्र के पास

या कि वह तुम्हारी देह गंध  को

समीप रखना चाहती है समुद्र के नमक में भिगो कर.

 

आँखों में भी तुम्हारी होता था जो एक

निर्भीक किन्तु भावुक जंगल

उसकी गिलहरियाँ

स्मृतियों को कर देती है तितर बितर

उन्हें संजोने को रहना पड़ता है चैतन्य

बिखरी बिसरी

स्मृतियों को संजोनें के प्रयासों में

होता है आभास हवाओं के सामीप्य का.

One Response to “हवाओं में बसी देहगंध”

  1. vijay nikore

    अति सुन्दर!
    अति मार्मिक!
    ….विजय निकोर

    Reply

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