महिला-जगत मीडिया लेख

भारत में महिला सशक्तिकरण

अधिकारों के साथ जिम्मेदारी और सहयोग की भी आवश्यकता

भारत में महिला सशक्तिकरण पर लंबे समय से चर्चा होती रही है। सरकार द्वारा अनेक योजनाएँ चलाई जा रही हैं, समाज में जागरूकता अभियान आयोजित किए जा रहे हैं और महिलाओं को शिक्षा, रोजगार, राजनीति तथा अन्य क्षेत्रों में आगे बढ़ाने के प्रयास लगातार जारी हैं। आज महिलाएँ विज्ञान, खेल, सेना, प्रशासन, व्यापार और राजनीति सहित लगभग हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना रही हैं। यह समाज में सकारात्मक बदलाव और बढ़ती जागरूकता का प्रतीक है।

हालाँकि, यह समझना भी आवश्यक है कि महिला सशक्तिकरण केवल अधिकार प्राप्त करने तक सीमित नहीं है। वास्तविक सशक्तिकरण तब सार्थक होता है जब उन अधिकारों का उपयोग समाज में न्याय, संवेदनशीलता और सकारात्मक बदलाव लाने के लिए किया जाए। इसका उद्देश्य किसी के विरुद्ध संघर्ष पैदा करना नहीं, बल्कि ऐसा समाज बनाना है जहाँ सम्मान, समानता और सहयोग के साथ सभी आगे बढ़ सकें।

समाज में घट रही कुछ घटनाएँ हमें आत्ममंथन करने के लिए भी प्रेरित करती हैं। हाल के वर्षों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहाँ शिक्षित और आत्मनिर्भर महिलाएँ भी दहेज, मानसिक उत्पीड़न और पारिवारिक दबाव जैसी समस्याओं का सामना करती दिखाई दीं। दुखद यह है कि कई बार इन परिस्थितियों में केवल पुरुष ही नहीं, बल्कि परिवार की अन्य महिलाएँ भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार दिखाई देती हैं। यह स्थिति इस बात की ओर संकेत करती है कि महिलाओं के बीच पारस्परिक सहयोग और संवेदनशीलता भी उतनी ही आवश्यक है जितनी अधिकारों की माँग।

इतिहास गवाह है कि महिलाओं को लंबे समय तक शिक्षा, संपत्ति, स्वतंत्रता और निर्णय लेने के अधिकारों से वंचित रखा गया। लेकिन भारत में संविधान लागू होने के बाद महिलाओं को समान अधिकार मिले और समय के साथ उनकी स्थिति में लगातार सुधार हुआ। आज महिलाएँ आत्मनिर्भर बनकर समाज के हर क्षेत्र में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। इसके बावजूद, कई बार महिलाओं के संघर्षों में दूसरी महिलाएँ ही बाधा बन जाती हैं।

घर-परिवार में सास-बहू के विवाद, ननद-भाभी के तनाव, कार्यस्थल पर प्रतिस्पर्धा और सामाजिक दबाव जैसी परिस्थितियों में महिलाओं द्वारा महिलाओं के मानसिक उत्पीड़न के उदाहरण देखने को मिलते हैं। कभी-कभी एक महिला दूसरी महिला की स्वतंत्रता, सफलता या आत्मनिर्भरता को सहज रूप से स्वीकार नहीं कर पाती। यह स्थिति दुखद है, क्योंकि यदि महिलाएँ एक-दूसरे का समर्थन करें, तो वे समाज में और अधिक सशक्त भूमिका निभा सकती हैं।

महिला सशक्तिकरण का वास्तविक उद्देश्य महिलाओं को पुरुषों के विरुद्ध खड़ा करना नहीं है। इसका उद्देश्य महिलाओं को आत्मनिर्भर, आत्मविश्वासी और सम्मानपूर्ण जीवन जीने योग्य बनाना है। इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि महिलाएँ योग्य नहीं हैं। महिलाएँ पहले से ही हर क्षेत्र में अपनी क्षमता सिद्ध कर रही हैं। आवश्यकता इस बात की है कि जो महिलाएँ सक्षम और जागरूक हैं, वे दूसरी महिलाओं को भी आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करें, और जो अभी अवसरों या संसाधनों से वंचित हैं, उन्हें सक्षम बनाना पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।

पुरुष और महिला दोनों समाज के समान रूप से महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। यदि दोनों के बीच संघर्ष की भावना बढ़ेगी तो समाज कमजोर होगा, लेकिन यदि दोनों सहयोग, सम्मान और समझदारी के साथ आगे बढ़ेंगे, तो समाज अधिक मजबूत, संतुलित और संवेदनशील बनेगा।

भारतीय संस्कृति में नारी को शक्ति का स्वरूप माना गया है। माँ दुर्गा, माँ लक्ष्मी और माँ सरस्वती की पूजा केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि यह संदेश भी है कि नारी शक्ति, समृद्धि और ज्ञान की प्रतीक है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस समाज में देवी की पूजा होती है, वहीं कई बार महिलाओं को अपमान, हिंसा और भेदभाव का सामना करना पड़ता है। इसलिए केवल पूजा पर्याप्त नहीं है; वास्तविक जीवन में भी महिलाओं को सम्मान और समान अवसर मिलना चाहिए।

यह भी सत्य है कि आज भी कई महिलाएँ घरेलू हिंसा, दहेज, कार्यस्थल पर भेदभाव और मानसिक उत्पीड़न जैसी समस्याओं का सामना कर रही हैं। इन समस्याओं के विरुद्ध कठोर कार्रवाई और कानून का सख्ती से पालन होना चाहिए। लेकिन किसी एक वर्ग को पूरी तरह दोषी ठहराने के बजाय हमें सामाजिक मानसिकता और व्यवहार में सुधार लाने की दिशा में कार्य करना होगा। समाज में अनेक पुरुष ऐसे भी हैं जो महिलाओं के सम्मान, शिक्षा और स्वतंत्रता का समर्थन करते हैं तथा उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ रहे हैं।

इसी प्रकार महिलाओं की भूमिका भी समाज को सकारात्मक दिशा देने में अत्यंत महत्वपूर्ण है। महिलाओं को भी यह विचार करना होगा कि क्या वे दूसरी महिलाओं के लिए सहयोगी और प्रेरणादायक वातावरण बना रही हैं। यदि एक महिला दूसरी महिला का मनोबल बढ़ाए, उसके संघर्षों को समझे और उसका समर्थन करे, तो समाज में बड़ा सकारात्मक परिवर्तन संभव है। एक माँ यदि बेटे और बेटी दोनों को समान संस्कार दे, एक सास यदि बहू को बेटी जैसा सम्मान दे और एक सहकर्मी दूसरी महिला की सफलता से ईर्ष्या करने के बजाय उसका समर्थन करे, तो समाज अधिक संवेदनशील और प्रगतिशील बन सकता है।

रिश्ते चाहे कोई भी हों — सास-बहू, माँ-बेटी, पति-पत्नी, भाई-बहन, मित्र या सहकर्मी — हर रिश्ते की नींव सम्मान, विश्वास और सहयोग पर टिकी होती है। जब रिश्तों में अहंकार, प्रतिस्पर्धा और अपमान की भावना आ जाती है, तब परिवार और समाज दोनों कमजोर होने लगते हैं। इसके विपरीत यदि रिश्तों में सहानुभूति और समझदारी हो, तो जीवन अधिक संतुलित और सुखद बन सकता है।

आज आवश्यकता केवल समस्याओं पर चर्चा करने की नहीं, बल्कि उनके समाधान की दिशा में आगे बढ़ने की है। बच्चों को बचपन से ही समानता, सम्मान और संवेदनशीलता के संस्कार देने होंगे। शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम न होकर नैतिकता, इंसानियत और सामाजिक जिम्मेदारी का आधार भी बननी चाहिए।

महिला सशक्तिकरण का वास्तविक अर्थ केवल महिलाओं को अधिकार देना नहीं, बल्कि ऐसा समाज बनाना है जहाँ हर व्यक्ति — चाहे वह पुरुष हो या महिला — सम्मान, सुरक्षा और समान अवसरों के साथ जीवन जी सके।

समाज की वास्तविक शक्ति किसी एक की जीत में नहीं, बल्कि सभी को साथ लेकर आगे बढ़ने में है। जब हम एक-दूसरे को गिराने के बजाय संभालना सीखेंगे, तभी सच्चे अर्थों में विकास और सशक्तिकरण संभव होगा। आइए, हम ऐसा समाज बनाने की ओर बढ़ें जहाँ समानता, सम्मान, सहयोग और संवेदनशीलता हो, और हर व्यक्ति को आगे बढ़ने का अवसर मिले क्योंकि जब इंसान इंसान का सहारा बनता है, तभी समाज मजबूत होता है और राष्ट्र प्रगति करता है।

Shri Kamlakant Pathak
Associate Director, Pragya