लेखक परिचय

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

वामपंथी चिंतक। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन।

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-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

भगवान से भी भयावह है साम्प्रदायिकता। साम्प्रदायिकता के सामने भगवान बौना है। साम्प्रदायिकता और साम्प्रदायिक दंगे दहशत का संदेश देते हैं। ऐसी दहशत जिससे भगवान भी भयभीत हो जाए। जैसाकि लोग मानते हैं कि भगवान के हाथों (यानी स्वाभाविक मौत) आदमी मरता है तो इतना भयभीत नहीं होता जितना उसे साम्प्रदायिक हिंसाचार से होता है।

बाबा नागार्जुन ने दंगों के बाद पैदा हुए साम्प्रदायिक वातावरण पर एक बहुत ही सुंदर कविता लिखी है जिसका शीर्षक है ‘तेरी खोपड़ी के अन्दर’। दंगों के बाद किस तरह मुसलमानों की मनोदशा बनती है। वे हमेशा आतंकित रहते हैं। उनके सामने अस्तित्व रक्षा का सवाल उठ खड़ा होता है, इत्यादि बातों का सुंदर रूपायन नागार्जुन ने किया है।

यह एक लंबी कविता है एक मुस्लिम रिक्शावाले के ऊपर लिखी गयी है।लेकिन इसमें जो मनोदशा है वह हम सब के अंदर बैठी हुई है। मुसलमानों के प्रति भेदभाव का देश में सामान्य वातावरण हिन्दू साम्प्रदायिक ताकतों ने बना दिया है। प्रचार किया जाता रहा है कि किसी मुसलमान की दुकान से कोई हिन्दू सामान न खरीदे, कोई भी हिन्दू मुसलमान को घर भाड़े पर न दे, कोई भी हिन्दू मुसलमान के रिक्शे पर न चढ़े। साम्प्रदायिक हिंसा ने धीरे-धीरे मुसलमानों के खिलाफ आर्थिक नाकेबंदी और आर्थिक हिंसाचार की शक्ल ले ली है। मुसलमानों के खिलाफ बड़े ही सहजभाव से हमारे अंदर से भाव और विचार उठते रहते हैं।

हमारे चारों ओर साम्प्रदायिक ताकतों और कारपोरेट मीडिया ने मुसलमान की शैतान के रूप में इमेज विकसित की है। एक अच्छे मुसलमान, एक नागरिक मुसलमान,एक भले पड़ोसी मुसलमान, एक सभ्य मुसलमान, एक धार्मिक मुसलमान, एक देशभक्त मुसलमान की इमेज की बजाय पराए मुसलमान, आतंकी मुसलमान,गऊ मांस खानेवाला मुसलमान, हिंसक मुसलमान, बर्बर मुसलमान, स्त्री विरोधी मुसलमान, परायी संस्कृति वाला मुसलमान आदि इमेजों के जरिए मुस्लिम विरोधी फि़जा तैयार की गयी है। नागार्जुन की कविता में मुसलमान के खिलाफ बनाए गए मुस्लिम विरोधी वातावरण का बड़ा ही सुंदर चित्र खींचा गया है।

कुछ अंश देखें- ‘‘ यों तो वो/ कल्लू था-/ कल्लू रिक्शावाला/यानी कलीमुद्दीन…/मगर अब वो/ ‘परेम परकास’/ कहलाना पसन्द करेगा…/कलीमुद्दीन तो भूख की भट्ठी में / खाक हो गया था /’’ आगे पढ़ें- ‘‘जियो बेटा प्रेम प्रकाश / हाँ-हाँ, चोटी जरूर रख लो/ और हाँ, पूरनमासी के दिन /गढ़ की गंगा में डूब लगा आना/ हाँ-हाँ तेरा यही लिबास/ तेरे को रोजी-रोटी देगा/ सच,बेटा प्रेम प्रकाश, तूने मेरा दिल जीत लिया/लेकिन तू अब /इतना जरूर करना/मुझे उस नाले के करीब/ ले चलना कभी/ उस नाले के करीब/जहाँ कल्लू का कुनबा रहता है/ मैं उसकी बूढ़ी दादी के पास/बीमार अब्बाजान के पास/बैठकर चाय पी आऊँगा कभी/ कल्लू के नन्हे -मुन्ने/ मेरी दाढ़ी के बाल/ सहलाएंगे… और/ और ? / ‘‘ और तेरा सिर…/ ’’ मेरे अंदर से/ एक गुस्सैल आवाज आयी…/-बुडढ़े,अपना इलाज करवा/तेरी खोपड़ी के अंदर/ गू भर गयी है/खूसट कहीं का/कल्लू तेरा नाना लगता है न ? /खबरदार साले/ तुझे किसने कहा था/मेरठ आने के लिए ?…/ लगता है/वो गुस्सैल आवाज /आज भी कभी-कभी/सुनाई देती रहेगी…/एक जमाने में भाजपा को जनसंघ के नाम से जानते थे। जनसंघ पर बाबा ने लिखा ‘‘तम ही तम उगला करते हैं अभी घरों में दीप/वो जनसंघी, वो स्वतंत्र हैं जिनके परम समीप/ उनकी लेंड़ी घोल-घोल कर लो यह आँगन लीप/उनके लिए ढले थे मोती,हमें मुबारक सीप/तम ही तम उगला करते हैं अभी घरों में दीप।

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5 Comments on "नागार्जुन जन्मशती पर विशेष- मुस्लिम आर्थिक नाकेबंदी और हम"

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पंकज झा
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कालजयी रचनाकार यात्री जी की एक कविता अभी और प्रासंगिक हो गया है. कभी उन्होंने इंदिरा जी के ‘सम्मान’ में लिखा था….!
इंदु जी, इंदू जी क्या हुआ आपको.
बेटे को याद रखी, भूल गयी बाप को.”

अभिषेक पुरोहित
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एसे लोगो की कमी नही है जो “मुसलमानो” को बेचारा कहते है,पर सहाब अपने एसी के कमरे के बहार आकर जरा मेरे साथ चलिये,अके्ले मेरे शहर मे कितने मौहल्ले बताउ जहा कोयी हिन्दु गुजरने की हिम्मत नही कर सकता??हिन्दु नारियो का गुजरना तो जैसे अपना मुह खुद ओखली मे देना,रोज रोज का धोसपट्टी,शायद आपने देखी नही है??जरा सी बात मे हजारो मुल्लो का आकर शहर मे दंगा फ़ैलाने का माहोल भी नही देखा होगा???इस्लाम खतरे मे है कहकर मुल्लाओ का अपराधियो को छुडाने के लिये पुलिस पर अटेक करना भी नही देखा होगा???”ताजिये” निकालने के लिये जब्रदस्ती पीपल के पेड… Read more »
एल. आर गान्धी
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muslim pyaar batorne inhein ‘kashmir’ bhej do – akl thikane aa jayegi !

AJIT BHOSLE
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चतुर्वेदी जी को शायद पता नहीं दंगों में मुस्लिमों से ज्यादा हिन्दुओं की आफत आ जाती है ज़रा उन इलाकों में जाकर देखिये जहां हिन्दू अल्पसंख्यक के रूप में रह रहे है हिन्दू तो बिना दंगों के ही दिन रात दंगों का अनुभव करता रहता है, ज़रा बंगाल में जा कर देखिये आप को समझ में आ जाएगा की असल में डर-डर के कौन जी रहा हे आपके इन उलटे सीधे लेखो से हिन्दुओं का कितना दिल दुखता है आप कल्पना भी नहीं कर सकते.

दिवस दिनेश गौड़
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भाइयों यहाँ पर ख्याली पुलाव पक रहा है, किसी को खाने की इच्छा हो तो भी मत खाना| क्यों कि एक तो इसका स्वाद बहुत बेकार है, दूसरा इस को खाने से आपको भाँती भाँती की बीमारियाँ हो सकती हैं, आपका हाजमा खराब हो सकता है, आपकी मौत भी हो सकती है| लगता है बाबा चतुर्वेदी भी मुलायम सिंह की राह पर चल पड़े हैं| इन्हें देश में शान्ति बर्दाश्त नहीं हो रही| पहले अयोध्या में बाबरी मस्जिद का अलाप मारते रहे किन्तु बात नहीं बनी, तो अब ये नया रोना ले कर बैठ गए हैं| पता नहीं कहाँ कहाँ… Read more »
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