लेखक परिचय

अभिषेक रंजन

अभिषेक रंजन

लेखक कैम्पस लॉ सेन्‍टर, दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में एल.एलबी. (द्वितीय वर्ष) के छात्र हैं।

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aapचार राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव परिणामों ने कांग्रेस के खात्में का

संकेत दे दिया है. कांग्रेसराज में व्याप्त चौतरफा भ्रष्टाचार, कमरतोड़

महंगाई और पथभ्रष्ट नीतियों से आजिज़ हुई जनता ने पंजे को जबरदस्त पटखनी

दी है. कमल जिस तरीके से पूरी अंगराई के साथ खिली है वह मोदीराज के संकेत

के रूप में देखा जा रहा है. लेकिन स्वभावतः भाजपा विरोधी देश की मीडिया

और वामपंथी, इस जीत को फीका करने में कोई कोर कसर नही छोड़ रहे है. सब के

सब दिल्ली में अन्ना के जन आन्दोलन को धोखा देकर राजनीति की शुरुआत करने

वाले “आआपा” को मिली 28 सीटों के आगे भाजपा की शानदार सफलता को बौना

बताने में जुटे है.

 

यह ठीक है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में आप को मिली अप्रत्याशित सफलता ने

राजनीतिक दलों के पारंपरिक चाल-चलन पर बहस छेड़ी है. राजनीति क्षेत्र में

शुचिता और व्यक्तिगत ईमानदारी पर एक नए सिरे से मंथन हो रहा है जो

लोकतंत्र के लिए शुभ लक्षण है. लेकिन इसके साथ साथ यह मानने में कोई

गुरेज नही होना चाहिए कि आप को मिली इस चुनावी सफलता के साथ कई चिंताएं

भी साथ साथ उभरी है जो भारतीय लोकतंत्र के भविष्य के लिए सुखद संकेत नही

है. इसमें सबसे खतरनाक है वामपंथियों का चोला बदलकर एक नए रूप में सामने

आने का.

 

दरअसल जिस आक्रामक अंदाज में आप की एंट्री को प्रचारित किया जा रहा है,

वह चौंकाने वाला है. कई लोग आप को मिली सफलता को उसकी नीतियों की जीत

बताते है. अब भला कोई ये बताए कि वो कौन सी नीतियाँ थी, जिसके बल-बूते आप

उतरी है! सिवाए झूठे आश्वासनों, कभी न पुरे होने वाले वादों, गाली-गलौज

और भावनात्मक तरीकें से लोगों को ब्लैकमेल करने की नीतियों के अलावा था

क्या. लेकिन जीत को इतना बढ़ा चढ़ाकर पेश किया जा रहा है मानो अब भाजपा की

जगह आआपा लेगी!

 

सच कहें तो आआपा की यह जीत दिल्ली के कुछ चिन्हित संस्थाओं व लोगों की

मेहनत का परिणाम है, जिसने पहली बार अनपढ़ों के साथ साथ पढ़े लिखें को भी

बरगलाने में कामयाब रही है. इसमें पहला नाम भाजपा-संघ परिवार की पारंपरिक

विरोधी मीडिया का है. आआपा के पक्ष में कुछ मीडिया घराने और पत्रकार

प्रवक्ता की तरह व्यवहार करते दिखे, जिसकी वजह से मतदाता भ्रमित हुए.

मीडिया का एक बड़ा धरा भाजपा को नीचा दिखाने और आप को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने

में दिन-रात एक करके लगा था, जिसने भाजपा को मिलने वाली बड़ी जीत केवल

ज्यादा सिट लाने वाले दल में बदल कर रख दिया.दिल्ली जैसे छोटे प्रदेश में

यह प्रयोग सफल रहा, इसलिए बड़े रोमांचित है सब. पता नही क्या क्या उपमाओं

से नवाजे जा रहे है आआपाई लोग.

 

कांग्रेस को समर्थन करनेवाले और भाजपा-संघ परिवार के पीछे हाथ धोकर पड़े

रहने वाले पत्रकार मोदी नाम से घबरा गए है. अब जबकि मोदी की आंधी में

सारे कांग्रेसी कीलें ढहते चले जा रहे है, जनता में मोदी के पक्ष में

माहौल बन रहा है, वैसे समय में मीडिया द्वारा कांग्रेस को छोड़कर एक ऐसा

मुखौटा खड़ा करने की साजिश चल रही है, जो कांग्रेसी विरोधी वोटों में सेंध

लगाकर भाजपा को सत्ता से दूर रख सकें! आआपा को प्रोजेक्ट करने के पीछे भी

वही रणनीति है.

 

दूसरी बड़ी भूमिका नक्सली-माओवादी समर्थक लोगों की है जो मार्क्स-लेलिन के

थोथी दलीलों के सहारे भारत में लाल पताका फहराने का हसीन सपना देखते रहते

है. वामपंथ अपनी अंतिम सांसे गिन रहा है, इसके बावजूद विदेशी व मृतप्राय

हो चुकी विचारधारा से पलने वाले लोग अपना सबसे बड़ा शत्रु मोदी को मान

बैठे है. क्यूंकि पता है, मोदी घास नही डालेगा और भारतविरोधी

बुद्धिजीविता को कांग्रेस की तरह प्रश्रय और पैसा देने की वजाए मटियामेट

कर देगा. इसलिए मोदीराज की आशंका से वामपंथी गिरोह में भगदड़ मची हुई है.

मोदी के लगातार बढ़ते प्रभाव से मची खलबली बौखलाहट में बदल गई है. ऐसा

लगता है मानो मोदी नाम का चर्मरोग हो गया है, जिसे खाते, पीते, सोते

खुजलाने को बेचारे विवश है. मोदी के खिलाफ अब इनके तरकश में कोई तीर ही

नहीं बचा है. विडियो, ऑडियो, फेक एनकाउंटर के सब तीर फेल हो गए. सोचा था,

मोदी विरोध के नाम पर कांग्रेसी आकाओं के लुट-खसोट से लोगों का ध्यान

हटाने में सफल होंगे और सेक्युलर-कम्युनल की डिबेट छेड़कर, लोगों को बरगला

कर कांग्रेस की बेफिक्र वापसी में कामयाब हो जाएंगे. अब वह भी फेल होता

दिखाई दे रहा है. जीतना मोदी का विरोध, उतना ही ज्यादा समर्थन की लहर चल

पड़ी है. अब जबकि यह पक्का हो गया कि मोदी को रोकना मुश्किल ही नही,

नामुमकिन है तो एक नया राग छेड़ दिया है विकल्प की, जिसके लिए तीसरे

मोर्चे के साथ साथ आआपा फिट बैठ रहा है. इसलिए इस चुनाव में सारे वामपंथी

हंसुआ-बाली छोड़कर झाड़ू लेकर दौड़ पड़े थे. वामपंथी स्वघोषित विचारकों ने

दर्जनों लेख लिख डाले. यहाँ तक कि चुनाव में मिली सफलता के बाद सबने एक

सुर में प्रशंसा करने में देरी नही दिखाई.

 

आआपा के समर्थन में वामपंथीयों का उतरना एक खतरनाक संकेत है क्यूंकि चोला

बदलकर छोला खाने की पुरानी आदत रही है इनकी. खाकर चुप रहते तो ठीक था,

खाने के बाद ये रायता भी फैलाते है और खिलाने वाले के खिलाफ ही क्रांति

का बिगुल फूंक देते है. अपनी सड़ी-गली वैचारिक दुनिया को झाड़ूमय बनाकर

सत्ता पर काबिज होने का एक आशा भरी किरण आआपा में इन्हें दिख रही है.

वैसे भी आआपा के ज्यादातर लोग वामपंथी स्वभाव के रहे है. इसलिए आआपा का

विस्तार रेड अलेर्ट जैसा है, जिसको लेकर सचेत होने की जरुरत है.

 

तीसरी प्रमुख वजह, पढ़े-लिखे लेकिन भ्रमित हो सकने वे लोग शामिल है, जो

खुद नही बदलना चाहते लेकिन आस-पड़ोस और व्यवस्था को बदलते देखना चाहते है.

वे बीबी, बॉस, बेरोजगारी की वजह से परेशान रहते है. स्वभावतः परेशानी की

वजह से हुए मानसिक तनाव से छुटकारा पाने के लिए मनुष्य ख्याली दुनिया में

सैर करना चाहता है जहाँ मनचाही मुराद चुटकी में पूरा होता हों. ऐसे लोगों

को बड़ी-बड़ी बातें, लम्बे-चौड़े वादें मनभावन लगते है. इन्हें बरगलाना आसान

है.

 

आआपा के पीछे दिमाग लगाने वालों ने राजनीतिक व्यवस्था की खामियों व जनता

के मूड को अन्ना के सामाजिक आन्दोलन के समय पहचान लिया था. आआपा ने इसका

फायदा उठाया. अन्ना को पीछे छोड़ उन लोगों की दुनिया का ठेकेदारी ले ली,

जिन्हें सरकार और सरकारी व्यवस्था में ही केवल खामियां नज़र आती है, खुद

में नही. इसने एक नया फैशन दिया है-अपनी जिम्मेवारियों से भागों और

दूसरों को केवल गाली दो. लोकपाल का माला जपकर भड़काओ, सहानुभूति बटोरों और

नाटक-नौटंकी दिखाकर वोट लों. लोकपाल न हुआ, मानो कोई खजाना हो गया,

जिसके मिलते ही लोग मालामाल हो जायेंगे और देश में ईमानदारी की गंगा बहने

लगेगी.

आआपा वह काम करने में सफल रही.कुछ समय पहले तक यही काम वामपंथी करते रहे

है. पढ़े लिखे नौजवानों से लेकर अनपढ़ लोगों को क्रांति की घुट्टी पिलाकर

अपना उल्लू सीधा करते रहे है. अब जबकि लोगों को समझ में आ गयी है तो

क्रांति का यह खुनी विचार जड़ से उखड़ना शुरू हो गई है. आआपा के तौर तरीके

बस वही वही है, सिर्फ भारत माता की जय के तड़के लगाकार इसे भारतीयता की

शक्ल लिए वामपंथी दल बनाने की कोशिश की जा रही है.

 

देश में आज फिर से एक अनिश्चितता का माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है.

यह ठीक है कि भाजपा के चाल-चलन सौ फीसदी ठीक नही है, उसके तौर तरीकों में

कुछ बदलाव जरुरी है. लेकिन एक भाजपा ही देश को शसक्त नेतृत्व और सरकार दे

सकती है. एक बड़े सामाजिक जन आन्दोलन की बलि चढ़ने से जन्मी पाप भारत का

भविष्य नही हो सकती. जरुरत है, भ्रष्ट सत्ता व उसकी सहयोगी मीडिया के

कुप्रचार से भ्रमित न हुआ जाए.

 

हाल के वर्षों में राजनीति और राजनीतिक व्यवस्था की नीतियों में व्याप्त

बुराईयों को पहली बार किसी ने आईना दिखाने की कोशिश की तो वह जयप्रकाश और

उनकी लोक सत्ता पार्टी थी, जिन्होंने सिविल सर्विस छोड़कर राजनीति को चुना

और 2009 में आन्ध्र प्रदेश विधानसभा चुनाव लड़कर विधायक बने. लेकिन कभी

उनकी चर्चा देश की मीडिया और छद्म बुद्धिजीवियों ने जोर-शोर से नही किया.

नही किया क्यूंकि लोकसत्ता झूठे प्रपंच करके, तमाशे करके, व्यवस्था को

गलियां देकर, संसद और संविधान से सर्वोच्च किसी कानून की मांग करके

राजनीति में नही आई थी. उसे कांग्रेसी-वामपंथियों का समर्थन नही मिला था.

 

दबी जुबान में कांग्रेसी भी इस बात को स्वीकारते है कि संभावित हार के

चलते उन्होंने भी आआपा को वोट दिया. चुनाव बाद जिस तरीके से कांग्रेस ने

बिना शर्त आआपा को समर्थन की बात कही है, वह यह जताता है कि भविष्य में

वामपंथी और कांग्रेस की डर्टी चाल अपने वजूद को कायम रखने के लिए है,

जिसको समझने की जरुरत है. सावधान रहना है ताकि मोदिविरोधी मुखौटे की चाल

में फंसकर देश बर्बादी की राह पर न चल निकले.

 

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11 Comments on "मोदी विरोधी षड्यंत्र का मुखौटा है AAP"

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इंसान
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मेरे विचार में यहाँ प्रस्तुत लेख मोदी विरोधी षड्यंत्र ही है जो राष्ट्र व नागरिकों के हित में दो राष्ट्रवादी राजनितिक दलों में परस्पर सहयोग एवं संगठन को बढ़ावा न दे पाठकों के मन में उनके प्रति व्यर्थ का वाद-विवाद खड़ा करता है|

इंसान
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मुझे दिल्ली में १८५७ का इतिहास पुनरावृत होते दिखाई देता है। सांस्कृतिक रूप से भारतीय मूल प्रश्न अथवा विषय को अपनी अपनी व्यक्तिगत स्थिति के अनुसार देखते समझते हैं और इस कारण उनकी प्रतिक्रिया में संगठन का सदैव अभाव रहा है| हिंदुओं और मुसलमानो के मिल कर धूर्त फिरंगियों को परास्त करने हेतु १८५७ में बहादुर शाह ज़फर द्वारा की गई उद्घोषणा इन्ही कारणो से विफल रही थी| आज यदि मूल प्रश्न भ्रष्टाचार मिटा सुशासन को स्थापित करना है तो राष्ट्रीय दलों में सहयोग और संगठन क्यों नहीं है? बहादुर शाह स्वरूप नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में फिरंगी स्वरूप १८८५-जन्मी… Read more »
आर. सिंह
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अगर मैं यह कहूँ कि आपका यह पूरा आलेख एक बकवास के सिवा कुछ नहीं है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी. आपलोग रट लगाए जा रहे हैं कि अन्ना को धोखा दिया.आपलोग अपनी अपनी पार्टियों के गरेबान में झाँक कर देखिये कि किसने किसको धोखा दिया. आपलोग अन्ना के रामलीला मैदान के अनशन के बाद संसद द्वारा अनुमोदित मनमोहन सिंह का पत्र क्यों भूल जाते हैं? ऐसे भी आंदोलन से क्या होना था? क्या संसद में आंदोलन का बार बार मजाक नहीं उड़ाया गया था? क्या नेताओं द्वारा चुनौती नहीं दी गयी थी कि संसद में आओ और अपना क़ानून बनाओ.… Read more »
आर. सिंह
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चाइना गेट( नब्बे के दसक के अंत में आई हिंदी फ़िल्म ) में जगीरा ने कहा था कि ताकत और हिम्मत तो जुटा लोगे,पर कमीनापन कहाँ से लाओगे? भारतीय राजनीति का मूल यही कमीना पन है . आम आदमी पार्टी के लोग इससे निपटने का कोई कारगर तरीका अभी तक नहीं ढूंढ पाये हैं.जिस दिन इस कमीनेपन की कीचड़ में लिपटे बिना वे इसका जबाब ढूंढ लेंगे और अपनी ताकत हिम्मत और ईमानदारी बरकरार रखेंगे उस दिन वे अजेय हो जायेंगे.,

आर. सिंह
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अगर मैं यह कहूँ कि आपका यह पूरा आलेख एक बकवास के सिवा कुछ नहीं है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी. आपलोग रट लगाए जा रहे हैं कि अन्ना को धोखा दिया.आपलोग अपनी अपनी पार्टियों के गरेबान में झाँक कर देखिये कि किसने किसको धोखा दिया. आपलोग अन्ना के रामलीला मैदान के अनशन के बाद संसद द्वारा अनुमोदित मनमोहन सिंह का पत्र क्यों भूल जाते हैं? ऐसे भी आंदोलन से क्या होना था? क्या संसद में आंदोलन का बार बार मजाक नहीं उड़ाया गया था? क्या नेताओं द्वारा चुनौती नहीं दी गयी थी कि संसद में आओ और अपना क़ानून बनाओ.… Read more »
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