लेखक परिचय

सिद्धार्थ शंकर गौतम

सिद्धार्थ शंकर गौतम

ललितपुर(उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे सिद्धार्थजी ने स्कूली शिक्षा जामनगर (गुजरात) से प्राप्त की, ज़िन्दगी क्या है इसे पुणे (महाराष्ट्र) में जाना और जीना इंदौर/उज्जैन (मध्यप्रदेश) में सीखा। पढ़ाई-लिखाई से उन्‍हें छुटकारा मिला तो घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत कर भारत को करीब से देखा। वर्तमान में उनका केन्‍द्र भोपाल (मध्यप्रदेश) है। पेशे से पत्रकार हैं, सो अपने आसपास जो भी घटित महसूसते हैं उसे कागज़ की कतरनों पर लेखन के माध्यम से उड़ेल देते हैं। राजनीति पसंदीदा विषय है किन्तु जब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान होता है तो सामाजिक विषयों पर भी जमकर लिखते हैं। वर्तमान में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत, राज एक्सप्रेस, प्रदेश टुडे, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, सन्मार्ग, दैनिक दबंग दुनिया, स्वदेश, आचरण (सभी समाचार पत्र), हमसमवेत, एक्सप्रेस न्यूज़ (हिंदी भाषी न्यूज़ एजेंसी) सहित कई वेबसाइटों के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं और आज भी उन्‍हें अपनी लेखनी में धार का इंतज़ार है।

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o paneerselvam
किसान परिवार से आने वाले तमिलनाडु के वित्त मंत्री ओ. पन्नीरसेल्वम अब तमिलनाडु के अगले मुख्यमंत्री होंगे| दरअसल एआईएडीएमके प्रमुख और अम्मा के नाम से मशहूर जे. जयललिता को आय से अधिक संपत्ति के मामले में ४ साल की जेल और १०० करोड़ के जुर्माने की सजा सुनाई गई है जिसके तहत उन्हें तत्काल मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा| ओपीएस के नाम से मशहूर ६३ वर्षीय पन्नीरसेल्वम फिलहाल प्रदेश सरकार में वित्त मंत्री की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं| उन्हें जयललिता का विश्वासपात्र माना जाता है| १९५१ में जन्मे पन्नीरसेल्वम किसान परिवार से आते हैं। बताया जाता है कि उनके पास कृषि भूमि है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह वह भी पहले चाय की दुकान चलाते थे जिसे अब उनके रिश्तेदार चलाते हैं| यह पहला मौका नहीं है जब पन्नीरसेल्वम को इस तरह जयललिता की ढाल बनकर मुख्यमंत्री पद संभालना पड़ा है| कुछ इसी तरह की परिस्थितियों में पन्नीरसेल्वम २००१ में भी तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पद की कमान संभाल चुके हैं| उस समय तांसी भूमि घोटाले में सजायाफ्ता होने के कारण सुप्रीम कोर्ट ने जयललिता की मुख्यमंत्री पद पर नियुक्ति रद्द कर दी थी। उस वक्त भी अभिनेत्री से नेता बनीं जयललिता ने अपने वरिष्ठ मंत्री ओ. पन्नीरसेल्वम पर ही भरोसा जताया था और मुख्यमंत्री पद के लिए उन्हें नामित किया था| २००१ में जब उन्होंने मुख्यमंत्री पद की कुर्सी संभाली थी तो एक रिकॉर्ड उनके नाम जुड़ा और वह था थेवार समुदाय से आने वाले तमिलनाडु के पहले मुख्यमंत्री बनने का| हालांकि जल्द ही जयललिता पुनः मुख्यमंत्री बनने में कामयाब रहीं किन्तु पन्नीरसेल्वम की वफादारी से जयललिता ने उन्हें अपना ख़ास बना लिया| २००६ में हुए विधानसभा चुनाव में एआईएडीएमके की हार के बाद पन्नीरसेल्वम ने नेता प्रतिपक्ष की भी भूमिका निभाई| पन्नीरसेल्वम जब पहली बार मुख्यमंत्री बने थे तब भी वे जयललिता की कुर्सी पर बैठने की बजाए उनसे बगल में अलग से कुर्सी लगाकर बैठते थे| कुछ ऐसा ही उन्होंने इस बार भी किया| जेल में बंद अपनी नेता जयललिता के प्रति वफादारी दिखाते हुए पन्नीरसेल्वम ने सरकार के प्रमुख के लिए सचिवालय में निर्धारित चेंबर में प्रवेश ही नहीं किया| उन्होंने अपने पूर्व कार्यालय से ही काम किया| यहां तक कि उन्होंने जया मंत्रिमंडल के सभी मंत्रियों को बरकरार रखा है| उनके विभागों में भी कोई बदलाव नहीं किया है| उन्होंने वित्त और पीडब्ल्यूडी के अलावा जयललिता की तरह अपने पास गृह और दूसरे अहम विभागों को रखा है| खैर इसमें कुछ भी नया नहीं है| राजनेताओं को लेकर इस तरह की स्वामिभक्ति और वफादारी दक्षिण भारत के लोगों में दिखना आम है| प्रश्न यह है कि क्या सत्ता हस्तांतरण की खड़ाऊं प्रवृति का चलन लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ नहीं है? क्या इस परिपाटी के चलते जनता का लोकतांत्रिक प्रणाली से विश्वास नहीं उठता? आखिर राजनीति या सार्वजनिक जीवन से जुडी शख्सियतें क्या वफादारी निभाने के चलते अपने कर्तव्यों से न्याय कर पाती हैं?
समाचार माध्यमों में जब ओ. पन्नीरसेल्वम व अन्य मंत्रियों ने पद एवं गोपनीयता की शपथ ली तो सभी की आंखों में अपनी नेता जयललिता के लिए आंसू थे| वहां उपस्थित जनसमुदाय भी फूट-फूट कर रो रहा था| ज़रा कल्पना कीजिए, जिन्होंने पद एवं गोपनीयता की शपथ ली, जो जनता के प्रति उत्तरदायी हैं, यदि अपनी नेता के लिए इतने भावुक हैं तथा उनके न होने मात्र से विचलित हैं तो ये अपना फ़र्ज़ कैसे निभाएंगे? फिर तमिलनाडु की जनता ने राज्य की २३४ सदस्यीय विधानसभा में एआईएडीएमके को  १५० सीटों पर विजयश्री दिलाई थी| लोकसभा चुनाव में भी पार्टी का प्रदर्शन शानदार रहा था और उसने तमिलनाडु की ३९ में से ३७ सीटों पर जीत हासिल की थी| ज़ाहिर है जनता का यह स्नेह जयललिता के नेतृत्व को प्राप्त हुआ था| अब जबकि जयललिता जेल में हैं और जमानत पर छूटने के बाद वे १० वर्षों तक सक्रिय राजनीति से दूर रहने को बाध्य होगीं, क्या पन्नीरसेल्वम का मुख्यमंत्री बनना जनता के जनादेश का मखौल उड़ाना नहीं है? बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालूप्रसाद यादव को जब चारा घोटाला मामले में जेल जाना पड़ा तब उन्होंने भी अपनी कुर्सी का हस्तांतरण अपनी पत्नी राबड़ी देवी को कर दिया| सत्ता तो परिवार के पास रही किन्तु राज्य की जो दुर्गति हुई, उसने लोकतांत्रिक आस्था को ही ध्वस्त कर दिया था| क्या तमिलनाडु भी अब उसी राह पर अग्रसर होगा जिस राह पर कभी बिहार चल पड़ा था? दरअसल सर्वोच्च न्यायालय ने १० जुलाई २०१३ को अपने एक ऐतिहासिक फैसले में यह व्यवस्था दी थी कि दागी व्यक्ति जनप्रतिनिधि नहीं हो सकता| न्यायालय के इस फैसले के मुताबिक यदि किसी जनप्रतिनिधि को आपराधिक मामले में दोषी करार देते हुए दो साल से अधिक की सजा सुनाई गई हो तो वह व्यक्ति सांसद या विधायक नहीं रह सकता| वह मंत्री या मुख्यमंत्री भी नहीं रह सकता और आने वाले १० साल तक चुनाव भी नहीं लड़ सकता| यानी जयललिता का राजनीतिक जीवन तो अब शायद ही दम भर सके किन्तु पन्नीरसेल्वम और अन्य मंत्री भी तमिलनाडु की जनता के साथ न्याय कर पाएंगे, इसमें संदेह हैं? जयललिता को भ्रष्टाचार के मामलों में मिली सजा निःसंदेह न्यायपालिका में विश्वास पैदा करती है किन्तु राजनीति में शुरू हुए सत्ता हस्तांतरण को आखिर कौन, कैसे और कब बंद करेगा, यह सोचनीय प्रश्न है|

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