लेखक परिचय

लखेश्वर चंद्रवंशी

लखेश्वर चंद्रवंशी

लेखक नागपुर से प्रकाशित 'भारत वाणी' के संपादक हैं।

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(माननीय एकनाथजी जन्म शती पर विशेष)

स्वामी विवेकानन्द के विचारों को अपना आदर्श बनाकर उसके अनुरूप जीवन जीनेवाले श्री एकनाथजी रानडे कार्य आज बेहद प्रासंगिक है। वर्तमान वर्ष एकनाथजी के जन्म शती (19 नवम्बर, 2014 से 19 नवम्बर, 2015) के रूप में विवेकानन्द केन्द्र के द्वारा मनाया जा रहा है। ऐसे में श्री एकनाथजी का कार्य भारतीय समाज के लिए कितना महत्वपूर्ण है, इस पर चिंतन किए जाने की आवश्यकता है।

– लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’

एकनाथजी का नाम लेते ही स्वामी विवेकानन्दजी सहज याद आते हैं, और जब स्वामी विवेकानन्द की बात होती है तो आंखों के सामने उभरता है कन्याकुमारी स्थित, भव्य विवेकानन्द शिलास्मारक का दृश्य। ऐसा क्यों? इसका उत्तर है, स्वामीजी, एकनाथजी और विवेकानन्द शिलास्मारक तीनों का ध्येय एक है। तीनों एक-दूसरे से जुड़े हैं, तीनों की भव्यता एक ही ध्येय की पूर्ति के लिए प्रेरित करती है-‘मनुष्य निर्माण और राष्ट्र पुनरुत्थान’। एकनाथजी ने स्वामीजी के विचारों को समाज जीवन में चरितार्थ करने के लिए पूरा जीवन खपा दिया। एक कुशल संगठक के रूप में उनकी योजनाएं, गतिविधियां, अध्ययन, सम्पर्क और सभी प्रकार के प्रयत्न उसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए समर्पित था।

एक जीवन-एक ध्येय

स्वामी विवेकानन्दजी ने कहा था, “मस्तिष्क को उच्च विचारों से, उच्च आदर्शों से भर दो। उन्हें दिन-रात अपने सामने रखो और तब उसमें से महान् कार्य निष्पन्न होगा।…उस आदर्श के बारे में हम अधिक से अधिक श्रवण करें ताकि वह हमारे अन्त:करण में, हमारे मस्तिष्क में, हमारे रगों में समा जाए। यहां तक कि रक्त की प्रत्येक बूंद में चैतन्य भर दें और शरीर के प्रत्येक रोम में समा जाए। हम हर क्षण उसी का चिन्तन करें। अन्त:करण की परिपूर्णता में से ही वाणी मुखरित होती है और अन्तःकरण की परिपूर्णता के पश्चात् ही हाथ भी कार्य करते हैं।”  स्वामीजी के इस विचार एकनाथजी ने मानों अपने जीवन का अंग ही बना लिया था।

विवेकानन्द शिलास्मारक के निर्माण का दायित्व जब उनके कंधे था, वे उसकी पूर्ति के लिए दिन-रात लगे रहते, उसी का स्वप्न वे देखते। अपने एक मित्र डॉ. सुजीत धर के साथ जब वे एक शाम कन्याकुमारी के समुद्र तट पर टहल रहे थे, तब उन्होंने उनसे पूछा, “सुजीत, तुम्हें वहां क्या दिखाई दे रहा है? सुजीत धर ने बताया, “मुझे सामने शिला खंड दिखाई दे रहा है।” तब एकनाथजी ने कहा कि मुझे इस सागर के मध्य शिला पर भव्य स्मारक दिखाई दे रहा है।

एकनाथजी यह बात उस समय बोल रहे थे, जब शिला स्मारक के निर्माण को लेकर देश में अनुकूल परिस्थिति नहीं थी। एक तरफ जहां भारत-चीन के युद्ध में भारत को पराजय का मुख देखना पड़ा था, वहीं दूसरी ओर देश में अकाल की स्थिति थी। देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू राजनीतिक मज़बूरी के चलते विवेकानन्द शिलास्मारक के निर्माण को लेकर स्पष्ट नहीं थे। केन्द्रीय सांस्कृतिक मंत्री हुमायूँ कबीर प्राकृतिक सुन्दरता के लिए स्मारक के निर्माण को सही नहीं बता रहे थे। वहीं इसाई समुदाय के दबाव में तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री भक्तवत्सलम ने यहां तक कह दिया कि मेरे जीते जी कन्याकुमारी में विवेकानन्द शिलास्मारक कभी नहीं बनेगा।

एकनाथजी हर समस्या के मूल में जाकर उसके समाधान का विचार करते थे, यह उनके स्वभाव की विशेषता थी। वे विपरीत परिस्थितियों के आगे कभी नहीं झुकते थे, वरन हर चुनौती को अवसर के रूप में परिणत करने में वे प्रवीण थे। राजनीतिक परिस्थिति को स्मारक निर्माण के लिए अनुकूल बनाने के लिए उन्होंने 323 सांसदों के हस्ताक्षर मात्र 3 दिनों में प्राप्त कर उसे प्रधानमंत्री के कार्यालय पर पहुंचा दिया और स्पष्ट किया कि विवेकानन्द शिलासमारक के निर्माण के लिए सभी राजनीतिक दल और सांसदों का समर्थन प्राप्त है। इसलिए स्मारक के निर्माण के लिए त्वरित अनुमति देना चाहिए। एकनाथजी के इस कुशलता का परिणाम ही था कि स्मारक के निर्माण का कार्य तेजी से आगे बढ़ा। उन्होंने स्मारक के निर्माण के लिए उस अकाल के समय 1 रुपये का कूपन बनाकर देशभर के सामान्य जनता से लगभग 80 लाख का धन संग्रह किया। देश के सभी राज्यों मुख्यमंत्री, सभी राजनीतिक दलों के सांसदों से सहयोग राशि ली। विरोधियों को भी अपना सहयोगी बनाने में एकनाथजी माहिर थे। एकनाथजी के कठोर परिश्रम, कुशल योजना, प्रखर नेतृत्व और संगठन कौशल से महज 6 वर्षों में सागर के मध्य भव्य शिलास्मारक का निर्माण हुआ।

लक्ष्य के अनुरूप निर्माण  

स्वामी विवेकानन्द ने बिखरी हुई आध्यात्मिक शक्तियों को संगठित करने के लिए ‘ॐ’ के मंदिर की स्थापना की कल्पना की थी। इसलिए एकनाथजी ने विवेकानन्द शिला स्मारक के तल पर ॐ का मंदिर बनाया। शिला स्मारक में स्वामीजी की प्रतिमा का आकर, स्वरूप और धातु को लेकर भी वे बहुत स्पष्ट थे। उनका कहना था कि स्वामीजी ने भले ही इस शिला पर ध्यान किया था, लेकिन इस स्थान पर स्वामीजी की ऐसी मूर्ति स्थापित हो जो देशवासियों को उदात्त कार्य के लिए प्रेरित करती हो। अतः उन्होंने स्वामी विवेकानन्द की खड़ी प्रतिमा वहां स्थापित की जो कार्य सिद्धि के लिए तत्परता का आह्वान की दृष्टि प्रदान करती है।

कार्यकर्ता की खोज  

मात्र शिला स्मारक के निर्माण से ही लक्ष्य प्राप्त नहीं हो जाता। एकनाथजी कभी एक कार्य को पूरा करके संतुष्ट नहीं होते थे। उनके मन में विवेकानन्द शिलास्मारक के निर्माण के साथ ही स्वामी विवेकानन्द के स्वप्न के अनुरूप कार्य करनेवाले कार्यकर्ताओं के निर्माण की भी योजना थी। एकनाथजी ने इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए 1972 में विवेकानन्द केन्द्र की स्थापना की। इसका मुख्य कार्यालय कन्याकुमारी के विवेकानन्दपुरम में है। आज देशभर में 882 शाखाएं हैं। विवेकानन्द केन्द्र ने ‘विवेकानन्द केन्द्र विद्यालय (VKV)  के माध्यम से शिक्षा जगत में आदर्श स्थापित किया है। आज अरुणाचल में 34, असम में 18, नागालैंड में 1, अंदमान-निकोबार में 9, तमिलनाडु में 3 और कर्नाटक में 1 ऐसे कुल 66 विद्यालय हैं। विवेकानन्द केन्द्र की कार्यपद्धति योग वर्ग, संस्कार वर्ग और स्वाध्याय वर्ग के माध्यम से बालकों, युवाओं और बड़ों में समाज के प्रति कर्तव्य बोध को जागृत किया जाता है।

स्वामी विवेकानन्द के सन्देश को विश्व पटल पर रखने और उन संदेशों से वैश्विक हित के लिए चिंतन की दृष्टि से एकनाथजी ने विवेकानन्द इंटरनैशनल फाउन्डेशन की कल्पना रखी थी। 2009 में इस फाउंडेशन की स्थापना नई दिल्ली स्थित चाणक्यपुरी में की गई।

स्वामी विवेकानन्द कहा करते थे कि, “मेरा विश्वास आधुनिक पीढ़ी में है, युवा पीढ़ी में है। इसी में से मेरे कार्यकर्ता निकालेंगे, जो सिंह की तरह हर समस्या का समाधान कर देंगे।” स्वामी विवेकानन्द ने कहा था, – “मनुष्य, केवल मनुष्य भर चाहिए। आवश्यकता है – वीर्यवान, तेजस्वी, दृढ़ विश्वासी और निष्कपट नवयुवकों की। बाकी सब अपने आप हो जाएगा।” उन्होंने कहा था, “सिंह के पुरुष से युक्त, परमात्मा के प्रति अटूट निष्ठा से सम्पन्न, पवित्रता की भावना से उद्दीप्त सहस्रों नर-नारी, देश के एक कोने से दूसरे कोने में जाकर सामाजिक समरसता, बंधुता और मुक्ति का सन्देश देंगे।”

‘स्वामीजी के सपनों के युवाओं’ की खोज में एकनाथजी हमेशा लगे रहते थे। कार्यकर्ता की खोज में वे बेहद सकारात्मक दृष्टि रखते थे। वे कहते थे कि हमारी नजर में समाज में दो ही तरह के लोग हैं, 1) जो कार्यकर्ता हैं और 2) जो कार्यकर्ता होनेवाले हैं। उनका कहना था कि स्वामी विवेकानन्द पर मात्र श्रद्धा रखने से काम नहीं चलेगा, वरन स्वामीजी के द्वारा रखे गए महान लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अपना जीवन का हर क्षण न्योछावर करना होगा। वे देश के युवाओं से जब भी मिलते तो उनको आहवान करते थे कि स्वामीजी के स्वप्न के युवा बनों, राष्ट्र पुनरुत्थान के लिए अपना जीवन उत्सर्ग कर दो। एकनाथजी के आह्वान से अनेक युवाओं ने अपना करियर, नौकरी और प्राप्त डिग्री के महत्त्व को एक ओर रखकर अपना जीवन ‘जीवनव्रती’ के रूप में विवेकानन्द केन्द्र को समर्पित कर दिया। आज भी सैकड़ों जीवनव्रती, हजारों कार्यकर्ता के कार्य और लाखों शुभचिंतकों के सहयोग से विवेकानन्द केंद्र अनेक सेवा प्रकल्पों से सामाजिक पुनरुत्थान की दिशा में कार्यरत है।

वर्तमान वर्ष माननीय एकनाथजी जन्म शती

19 नवम्बर, 1914 को विदर्भ के अमरावती जिले के एक छोटे से गांव टिमटाला में जन्में एकनाथजी की जन्म शती इस वर्ष देशभर में मनाई जाएगी। 9 नवम्बर, 2014 को भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने ‘माननीय एकनाथजी रानडे जन्म शती पर्व’ का उदघाटन किया।

उल्लेखनीय है कि इस जन्मशती पर्व का उपक्रम युवा केन्द्रित है। ‘सफल युवा – युवा भारत’ इस नाम से यह उपक्रम देशभर चलाया जा रहा है। इस उपक्रम के चार चरण – युवा सम्पर्क, युवा संग्रह, युवा प्रशिक्षण और युवा सेवा। इन चार चरणों के माध्यम से 1 लाख युवाओं को कौशल विकास (स्किल डेवलपमेंट) का प्रशिक्षण दिया जाएगा। सफल जीवन सार्थक कैसे बनें, इस बात पर जोर दिया जाएगा।

श्री एकनाथजी रानडे एक कुशल संगठक के साथ ही कार्य को समयबद्ध और परफेक्शन से पूर्ण करनेवाले व्यक्तित्व के रूप में जाने जाते हैं। एकनाथजी की जीवनी और विवेकानन्द शिलास्मारक की गाथा को अधिकाधिक महाविद्यालयीन छात्र-छात्राओं तक पहुंचाने के लिए सम्पूर्ण देश में हजारों युवा सम्मलेन, सैंकड़ो युवा प्रेरणा शिविर तथा कार्यशालाओं का आयोजन किया जा रहा है। ‘शिव भावे जीव सेवा’ इस सन्देश को चरितार्थ करने के लिए जनजातियों और वंचितों के लिए सेवा प्रकल्प शुरू करने की योजना है।

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