लेखक परिचय

इफ्तेख़ार अहमद

मो. इफ्तेख़ार अहमद

लेखक इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया के अनुभवी पत्रकार है। वर्तमान में पत्रिका रायपुर एडिशन में वरिष्ठ सह-संपादक के पद पर कार्यरत हैं और निरंतर लेखन कर रहे हैं। कई राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्रों में इनके लेख प्रकाशित हो चुके हैं। पत्र पत्रिकाओं के लिए लेख मंगवाने हेतु 09806103561 पर या फिर iftekhar.ahmed.no1@gmail.com पर संपर्क करें.

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मो. इफ्तिखार अहमद

अमेरिका इस वक्त दुनिया का सुपर पॉवर है। ज्ञान, विज्ञान, आर्थिक व साम्रिक दृष्टि से कोई इसका सानी नहीं है। अमेरिका को विकासशील देश के लोग एक आदर्श देश के रूप में देखते हैं। गरीब और विकासशील देशों के हर बच्चे का सपना अमेरिका जाने की होती है। कोई वहां जा कर अच्छा रोजगार तलाशना चाहता है, कोई आला तालीम हासिल कर अपना और अपने खानदान का नाम रौशन करना चाहता है।

अमेरिका एक बहुसांस्कृतिक देश है, लिहाजा वहां सभी का सम्मान भी होता है। अभी हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा था कि टैलेंट चाहे कही का भी हो, अमेरिका में उसका पूरा सम्मान किया जाएगा। ये सिर्फ राष्ट्रपति की बयानबाजी ही नहीं है, बल्कि इस में सच्चाई भी है। वहां आए दिन भारतीय वैज्ञानिक, बिजनेस मैनेजर, बुध्दिजीवियों और राजनीतिज्ञों को उनकी काबलियत के मुताबिक पद और सम्मान भी दिया जा रहा है, लेकिन अमेरिका का एक दूसरा चेहरा भी है जिस के बारे या तो हम जानते नहीं है, या शायद जानना ही नहीं चाहते हैं। अमेरिका दुनियाभर के विकासशील देशों पर मानव तस्करी, बाल श्रम, मानवाधिकार हनन, मादक पदार्थों की तस्करी और परमाणु प्रसार के नाम पर तरह तरह की पाबंदियां आयद कर देता है। सतही तौर पर ये सारी बातें अच्छी भी लगती है कि एक शांतिपूर्ण और खुशहाल समाज के लिए ये जरूरी भी है, क्योंकि आज के इस वैश्वीकरण के दौर में एक राष्ट्र के कुकृत्यों की कीमत दूसरे राष्ट्रों को चुकानी पड़ती है, लेकिन इन पाबंदियों की असलियत कुछ और ही होती है। इसके पीछे या तो अपने बाजार को सुरक्षित करना होता है, या अपने उत्पादकों के प्रतिस्पर्धी को कुछलना होता है, या फिर अमेरिकी नीति के आड़े आने वाले को ठिकाने लगाना। अमेरिका चाहे जिन वजहों से अपने विरोधी देशों को पाबंदियों में जकड़ देता हो, लेकिन इसकी कीमत वहां की आम जनता को चुकानी पड़ती है, लेकिन अमेरिका खुद अपने आचरण में इन नियमों को कभी उतारने की कोशिश नहीं करता है। अमेरिका के लिए न तो अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के नियमों का कोई मतलब है और न ही संयुक्त राष्ट्र का ही। जिसका नजारा हम सभी इराक युध्द से पहले देख चुके हैं। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश इराक पर हमला करने के लिए आतुर थे, लेकिन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के दो सदस्य रूस और फ्रांस इसके खिलाफ थे, लिहाजा सुरक्षा परिषद में अपनी दाल न गलती देख अमेरिका ने 2003 में अपने परम सहयोगी ब्रिटेन की मदद से इराक पर हमला बोल दिया और संयुक्त राष्ट्र देखता है रह गया। परमाणु मुद्दे पर अमेरिका दोहरा चरित्र साफ दिखता है। अमेरिका खुद तो प्रमाणु शस्त्र रखने का अपना प्राकृतिक अधिकार मानता है, उनके सहयागी और परम मित्र इस्राइल के प्रमाणु बम पर भी उसे कोई आपत्ति नहीं है, लेकनि ईरान का प्रमाणु संयंत्र उसे पूरी दुनिया के लिए खतरा दिखता है। बात यहां पर किसी मुस्लि, क्रिश्चिन और यहूदी देश का नहीं, परमाणु बम मानवता के लिए विनाशकारी है। हम इसका असर जापान में देख और झेल चुके हैं, लिहाजा कोई भी सभ्य समाज या व्यक्ति परमाणु बम का समर्थन नहीं कर सकता है। यहां पर कुछ मिसाल देने का अर्थ सिर्फ अंतरराष्ट्रीय न्याय और समानता की असलियत को सामने लाना है। अब सवाल ये पैदा होता है कि क्या अमेरिकी या फिर सुरक्षा परिषद के बाकी के चार सदस्यों का परमाणु बम मानव समाज की भूख मिटाने की क्षमता रखता है। क्या इनके विशाल परमाणु हथियारों के भंडार से दुनिया के किसी एक मरते हुए व्यक्ति को बचाया जा सकता है। एक सौ एक प्रतिशत इसका जवाब होगा नहीं, तो फिर भारत, पाक, उत्तर कोरिया और ईरान के परमाणु कार्यक्रमों पर ही हल्ला क्यों मचाया जाता है? समानता और मानवाधिकार की बात करने वाला अमेरिका स्वयं उन नियमों का पालन क्यों नहीं करता है?

अब बात युध्द अपराध की। इराक युध्द पर विकिलीक्स की ओर से जारी अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट के सामने आने पर एक बार फिर से ये साफ हो गया है कि अमेरिका की विदेश नीति कितनी कुरूर है। अपने फायदे के लिए ये देश किस तरह किसी देश को रौंद सकता है। इनके लिए न तो इंसानी जान की कोई कद्र है और न ही इनकी डिक्सनरी में मानवीयता नाम की कोई चीज है। अमेरिका के गुप्त सैन्य दस्तावेजों में इराक में मारे गए 1 लाख 9 हजार 32 लोगों का ब्यौरा है, जिनमें तो 66 हाजर 81 नागरिकों को पहले उत्पीडि़त किया गया और फिर मौत के घाट उतारा गया। इसके इलावा इस दस्तावेज में 23 हजार 9 सौ 84 विद्रोही, 15 हजार 1 सौ 96 इराकी सरकार के सैनिक और गठबंधन सेना के 3 हजार 7 सौ 71 सैनिकों के मौत की दास्तान शामिल हैं। विकिलीक्स ने अमेरिकी रक्षा मुख्यालय पेंटागन की चेतावनी के बावजूद ये खुलासा किया । अमेरिका ने पहले तो ये कह कर विकीलिक्स को चेतावनी दी थी कि इस कदम से सूचना देने वालों का जीवन खतरे में पड़ सकता है और युध्द की रणनीति भी जाहिर हो सकती है, लेकिन इसके बाद भी जब विकिलीक्स ने इन गोपनीय दस्तावेजों को जारी कर दिया तो अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता पीजे क्राउले ने इराक और दुनिया के देशों से अपने अमानवीयकृत्य पर माफी मांगने के बजाए कहा कि अमेरिका विकिलीक्स द्वारा गोपनीय सूचना जारी करने की भर्त्सना करेगा। ये उसी अमेरिका का चरित्र है जो विवादित 9/11 के हमले में 3000 हजार लोगों के मारे जाने के बाद पिछले दस सालों से अफगानिस्तान में लड़ाई लड़ रहा है और यहां भी अब तक तालिबानी लड़ाकों के साथ ही लाखों आम नागरिकों को मौत के घाट उतार चुका है। इससे तो यही साबित होता है कि अमेरिका के लिए सिर्फ अपने लोगों की ही कद्र है, बाकी दुनिया के लोग इनके लिए कुत्ते, बिल्ली से ज्यादा मायने नहीं रखता है।

अमेरिका भले ही दुनियाभर में मानवता के नाम पर और लोकतंत्र स्थापना के नाम पर आपरेशन फ्रीडम चला रहा हो, लेकिन खुद अपने घर को दीमक से नहीं बचा पा रहा है। आज अमेरिका का हर पांच में से 4 स्कूली छात्र शराबी बन चुका। सेक्स का बाजार भी देशभर में बुरी तरह से फैलता जा रहा है। अब वहां का बच्चा भी सुरक्षित नहीं है। मशहूर हॉलीवुड अदाकारा सारा जेसिका पार्कर के मुताबिक अमेरिका में हर साल कम से कम एक लाख बच्चे देह व्यापार में झोंक दिए जाते हैं। देश की इस बदतरीन हालत से दुखी हो कर तीन बच्चों की मां सारा ने यौन तस्करी के खिलाफ देशभर में जागरुकता फैलाने का फैसला किया है। इस अभियान में उन्हें सिडीब का भी साथ मिला है। सिडीब बताती है कि उन जानवरों से लडऩा बहुत ही जरूरी है, जो 12 से लेकर 14 वर्षीय तक की लड़कियों को देह व्यापार में झोंक देते हैं।

इसे देखकर तो यही कहा जा सकता है कि दुनिया को लोकतंत्र और मानवता का पाठ पढ़ाने वाला अमेरिका अब खुद ही गर्त की ओर जा रहा है। अब देखना ये होगा कि अमेरिका दुनियाभर में मासूम लोगों का खून बहाना छोड़ कर कब अपने देश का नैतिक उत्थान करता है। अगर अमेरिका वक्त रहते नहीं जागा, तो तास के पत्तों की तरह ढह जाएगा। किसी ने ठीक ही कहा है कि धन खोया तो कुछ नहीं खोया, स्वास्थ्य खोया तो कुछ खोया और अगर चरित्र खोया तो सब कुछ खो लेने जेसा है। लिहाजा अब अमेरिका का चरित्र दांव पर है अगर अमेरिका अपना चरित्र गवां देता है तो उसके पास कुछ भी नहीं बचेगा, जिसके आधार पर सुपर पॉवर बना रह सके।

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