लेखक परिचय

आशीष महर्षि

आशीष महर्षि

लेखिका स्वेतंत्र टिप्प णीकार हैं।

Posted On by &filed under मीडिया, राजनीति.


आशीष महर्षि

तेरे इश्क की खुमारी जब उतरी तो हम कहीं के न रहे। तेरे पे इकबाल करके हम कहीं के न रहे। तुने हमें किया बर्बाद तो हम कहीं के न रहे। ऐसा ही कुछ इनदिनों अन्ना के आंदोलन के साथ हो रहा है। जिस आंदोलन पर करोड़ों ने आंख बंद कर के विश्वास किया। साथ दिया। हमसफर बने। आज वो खुद को ठगे हुए महसूस कर रहे हैं। लेकिन क्या यह सब अचानक हुआ? जवाब खोजेंगे तो उत्तर मिलेगा, नहीं।

आखिरकार वही हुआ, जिसका डर था। एक बार फिर टीम अन्ना का लोकतंत्र न्यूज चैनलों के सामने आकर झूम-झूम कर नाचा। इस बार मुफ्ती शामून काजमी के रूप में। यह कोई पहली बार नहीं हुआ। कई बार ऐसा हो चुका है। टीम अन्ना के कुछ सदस्यों पर आंदोलन पर पहले दिन से ही अलोकतांत्रिक और तानाशाही का आरोप लगता रहा है। लेकिन बड़े लक्ष्य के लिए लड़ी जा रही लड़ाई अब पूरी तरह इगो की लड़ाई बन गई है।

जिस आंदोलन ने देश के कन्फ्यूज युवाओं को रास्ता दिखाया था। जिस आंदोलन ने बूढ़ी आंखों में मर चुके ख्वाबों को फिर से जिंदा किया था। जिस आंदोलन ने पूरी दुनिया को दिखा दिया था कि अब हिंदुस्तान अंगड़ाई ले रहा है, वह अब धीमी मौत मरने को विवश हो चुका है। कारण सिर्फ यही है कि यह आंदोलन अब जन आंदोलन न होकर कुछ लोगों की बपौती बन गया है। लोकतांत्रिक तरीकों और पारदर्शिता को लेकर टीम अन्ना हमेशा विवादों में रही है।

केंद्र सरकार से मीटिंग की वीडियो रिकॉर्डिग की मांग करने वाली टीम अन्ना अपने ही एक सदस्य के द्वारा रिकॉडिंग किए जाने को जासूसी का आरोप लगाकर बाहर का रास्ता दिखलाना, कहीं न कहीं टीम अन्ना की पारदर्शिता पर भी सवाल उठाता है।

टीम अन्ना के पूर्व सदस्य तो शुरू से कहते आए हैं कि इस आंदोलन की कथनी और करनी में हमेशा से ही फर्क रहा है। यह आंदोलन अब देश को बनाने वाला नहीं, बल्कि तोड़ने वाला है। टीम अन्ना के पूर्व सदस्य और मैग्ससे पुरस्कार के सम्मानित राजेंद्र सिंह कहते हैं कि आंदोलन में कथनी और करनी में फर्क तो है।

बाकी आंदोलन में भी होता है लेकिन इस तरह से नहीं होता है। पूरे आंदोलन में कहीं भी बराबरी नहीं है। यह आंदोलन लोकतांत्रिक नहीं है। इसलिए टीम के सदस्यों को लगता है कि वो जो फैसले ले रहे हैं, वो बाहर नहीं जाने चाहिए। इस बात से शायद ही कोई इंकार करेगा कि सरलता समानता के बिना जो भी आंदोलन चलता है वह देश को बनाने वाला नहीं बल्कि देश को बिगाड़ने वाला होता है। अब इस आंदोलन का कोई भविष्य दिखता दिख नहीं है। समझदार लोग इस आंदोलन से अलग होते जा रहे हैं। अब इसमें केवल बातों से बदलाव करने वाले लोग जुट रहे हैं। जमीनी बदलाव और बेहतरी के इसमें नहीं है। किसी भी लोकतांत्रिक आंदोलन का मतलब होता है, इसमें समता, सादगी, बराबरी, सबके हित का ध्यान रखा जाए। लेकिन इस आंदोलन में ऐसा कुछ भी नहीं है।

जब मैं पत्रकारिता का ककहरा सीख रहा था तो उस वक्त राजस्थान में सूचना के अधिकार और भोजन के अधिकार आंदोलन को बड़े करीब से देखने का मौका मिला। कई मीटिंगों में भाग लिया। सभी रणनीतिकारों को करीब से जाना। हर आंदोलन को शुरू करने से पहले गांव से शुरूआत की जाती रही। जयपुर में यदि कोई आंदोलन करना है तो दूर बैठे जैसलमेर, उदयपुर के लोगों की रायशुमारी और उनकी सक्रियता को तय किया जाता था। हर उस इंसान की राय ली जाती थी, जिसके लिए यह लड़ाई लड़ी जा रही है। कोर कमेटी में सिर्फ पांच छह लोग नहीं बल्कि पचासों की तादाद में लोग होते थे। इसमें पूर्व आईएएस से लेकर गांव का एक आम ग्रामीण तक एक साथ बैठते थे। आज भी यही होता है।

लेकिन अन्ना के आंदोलन में यह सब तत्व पूरी तरह से गायब रहे। जहां भी टीम अन्ना के सदस्य जाते थे, वहां वे एक सेलेब्रिटिज होते थे। लोग उन्हें सुनते कम थे, फोटो ज्यादा खिंचाते हैं। इस पूरे आंदोलन में ग्लैमर का तड़का अधिक दिखता है। टीम अन्ना को यह समझना होगा कि आज जो भी भीड़ जुटती है, वह सिर्फ और सिर्फ अन्ना के नाम पर। बाकी के बाकी सारे सदस्य की हैसियत सिर्फ जुगनूओं जैसी है। इसे जितनी जल्दी वो स्वीकार कर लें, उनके लिए उतना ही बेहतर है।

Leave a Reply

7 Comments on "कुछ यूं उतर रही है अन्ना के आंदोलन की खुमारी"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
इंसान
Guest
आशीष महर्षि, भले ही आपने मेरी “राय सर आँखों पर” कह दिया है (औपचारिकता के लिए सस्नेह धन्यवाद; वैसे भी आपके लेख पर अपनी प्रतिक्रिया उपरान्त मैंने विश्राम ले लिया था) लेकिन आप हमें बस समय का इंतज़ार करने को कहते हैं| यदि आप सोचते हैं कि समय आते स्वयं अन्ना के आन्दोलन की खुमारी पूर्ण रूप से उतर जायेगी तो संभवत: ऐसा हो सकता है जब वे अपरिहार्य मृत्यु को प्राप्त हो जाएं परंतु और कैसा इंतज़ार? आप युवा है; आप पढ़े लिखे हैं; आप भारत का भविष्य हैं| भ्रष्टाचार और अनैतिकता के विरुद्ध आन्दोलन की खुमारी तो अंत… Read more »
डॉ. राजेश कपूर
Guest
आन्दोलनों का मूल्यांकन इतना सतही होना अधूरी बात लगती है. * आन्दोलन अपने घोषित लक्ष्य को कितना पा सके, एक तो इस आधार पर हाँ किसी आदोलन का मूल्यांकन करते हैं. * दूसरा महत्वपूर्ण मूल्यांकन यह है की उस आन्दोलन से समाज में कितनी जागृति आई, लोगों की समाझ में कितना परिवर्तन आया. ** गत दिनों हुए आंदोलनों से भारतीय समाज की सोच में क्रांतिकारी परिवर्तन आये हैं. वे आन्दोलन अपने घोषित उद्देश्यों में पूरी तरह से सफल तो नहीं हुए पर उनकी उपलब्धिया राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में अभूतपूर्व, अद्भुत रही हैं. ***ज़रा याद करिए की २ वर्ष पहले तक हालत… Read more »
इंसान
Guest
स्वभाव-वश लेख पढ़ने से पहले मैंने लेख के शीर्षक, कुछ यूं उतर रही है अन्ना के आंदोलन की खुमारी, देख उस पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है| आशीष महर्षि युवा हैं और यहाँ प्रस्तुत लेख न केवल उनके अपरिपक्व व्यक्तित्व और उनके अनुभव में तीव्र कमी बल्कि आज के भ्रष्ट और अनैतिक वातावरण में उनके अनावश्यक रूप से महत्वाकांक्षी होने का प्रतीक भी है| मैं असमंजस में हूँ कि आशीष महर्षि लेख द्वारा अपने पाठकों को क्या कहना चाहते हैं? क्या युवा लेखक अन्ना के आंदोलन की खुमारी उतरने की वाट जोह रहे हैं? अल्बर्ट आइंस्टाइन के अनुसार विश्व एक… Read more »
ashish maharishi
Guest

इन्सान @ आपकी राय सर आँखों पर..बस समय का इंतजार कीजिये

डॉ. मधुसूदन
Guest
भ्रष्टाचारी सत्ताएँ, भी संगठित होती है. उनका प्रबंधन स्वार्थ या/एवं सत्ता आधारित होता है. एक बडा चोर, टुकडे फ़ेंक कर कई कुत्तों को भौंकने के काम में लगा देता है. मन्नू (गया अब कभी सूना नहीं जाएगा), कन्नू चन्नू ऐसे कामों में लग कर एक बहुत बड़ा स्वार्थ प्रेरित संगठन खडा(?) कर देते हैं. कुछ जयचंद भी घुस जाते हैं. और जनता अपेक्षा कर रही है, कि अकेला अन्ना अनशन करे? अकेला अन्ना मरे? हमें भगवान ने क्या तालियाँ बजाने के लिए भेजा है? शुद्ध समर्पित युवाओं का संगठन आवश्यक होता है, ऐसे आन्दोलन के लिए, जैसा जय प्रकाश जी… Read more »
आर. सिंह
Guest
आशीष महर्षी जी,आप युवा पत्रकार हैं,अतः आपका अन्ना आन्दोलन से सम्बंधित आक्रोश मैं समझ सकता हूँ.आपके इस कथन से भी मैं पूरी तरह सहमत हूँ कि हर जगह पारदर्शिता की मांग करने वाले खुद के मामले में पारदर्शिता क्यों नहीं बर्दास्त कर पा रहे हैं.यह भी सत्य है की टीम अन्ना का रवैया पूर्णतः ठीक नहीं माना जा सकता,पर यह मानना और कहना कि यह आन्दोलन अब दम तोड़ रहा है,सत्य सेबहुत दूर है.ऐसे आन्दोलनों की तुलना स्वतंत्रता की लड़ाई से की जा सकती है.भारत की स्वतत्रता की लड़ाई का इतिहास उठाकर आप देखेंगे,तो ऐसे निराशाजनक बहुत पडाव उसमें आये… Read more »
तेजवानी गिरधर
Guest

सटीक बात

wpDiscuz