लेखक परिचय

वीरेन्द्र जैन

वीरेन्द्र जैन

सुप्रसिद्ध व्‍यंगकार। जनवादी लेखक संघ, भोपाल इकाई के अध्‍यक्ष।

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वीरेन्द्र जैन

पिछले दिनों से विभिन्न सूचना माध्यमों और राजनीतिक व गैरराजनीतिक सम्वादों में अन्ना हजारे का आन्दोलन छाया रहा है। हमारा समाज अवतारवाद में विश्वास करने वाले लोगों का समाज है जो अपनी समस्याओं के हल किसी अतिमानवीय किस्म की शक्ति में देखते हैं और किसी विशिष्ट जन के अवतरण की प्रतीक्षा करते रहते हैं। इस प्रतीक्षा में हम कई बार भ्रम के शिकार भी हो जाते हैं और हर आहट को उद्धारक के आगमन से जोड़ लेते हैं, जिससे कई बार धोखे भी हो जाते हैं। पूरे देश में सत्तारूढ से लेकर विपक्षी दलों तक सब इस बात से सहमत हैं कि भ्रष्टाचार असहनीय स्थिति तक बढ और फैल गया है और इसने सभी हिस्सों को दुष्प्रभावित करना शुरू कर दिया है। इस विश्वास को पुष्ट करने के रूप में अभी हाल ही मैं इतने बड़े बड़े भ्रष्टाचार सामने आये हैं कि प्रमुख पदों पर बैठे लोगों के बारे में कहे गये किसी भी झूठ को भी अधिकांश लोग आसानी से सच मानने लगे हैं। एक हजार करोड़ से बड़े कुछ भ्रष्टाचार इस तरह से हैं-

स्विस बैंक में मौजूद काला धन 210000 करोड़

टूजी घोटाला 176000 करोड़

स्टाम्प घोटाला 20000 करोड़

हसन अली टैक्स व हवाला घोटाला 39120 करोड़

स्कार्पियन पनडुब्बी घोटाला 18978 करोड़

टीक प्लांटेशन घोताला 8000 करोड़

सुखराम टेलीकाम घोटाला 1500 करोड़

प्रीफेंशियल एलोटमेंट घोटाला 5000 करोड़

सत्यम घोटाला 8000 करोड़

उड़ीसा खदान घोटाला 7000 करोड़

झारखण्ड खदान घोटाला 4000 करोड़

उर्वरक आयात घोटाला 1300 करोड़

हर्षद मेहता [शेयर घोटाला] 5000 करोड़

काबलर घोटाला 1000 करोड़

इसी व्याधि का विरोध करने के लिए जब आवाज उठी और जिसका नेतृत्व एक ऐसे सहज सरल सादगी पसन्द, भूतपूर्व सैनिक व्यक्ति के हाथ में दे दिया गया, जिसके सामाजिक सेवाओं का निष्कलंक इतिहास जुड़ा है व इसके लिए उसने विवाह तक नहीं किया, तो लोगों ने उसे अवतार जैसा मान लिया। वे बिना किसी पूछ परख के उसमें वांछित बदलाव का हल देखने लगे।

अन्ना हजारे का आन्दोलन भावुकता से काम लेने वाले आम लोगों को बहुत भाया किन्तु दूरदर्शी बुद्धिजीवियों ने उसे सन्देह मिश्रित श्रद्धा की दृष्टि से ही देखा। इसका कारण यह था कि यह आन्दोलन केवल बीमारी के लक्षण दूर करने वाला तो नजर आता था पर बीमारी दूर करने वाला नहीं। अर्थात भ्रष्टाचार को दण्डित करने तक सीमित नजर आता था पर भ्रष्टाचार के लिए अनुकूलता पैदा करने वाली व्यवस्था, आर्थिक नीतियों, कमजोर न्यायिक प्रणाली, दोषपूर्ण चुनावी व्यवस्था व सामाजिक बुराइयों के बारे में मौन था। वे राजनीतिक दलों से दूरी बना कर चल रहे थे जो सामाजिक बदलाव की मुख्य संस्था हैं तथा कानून बनाने के लिए सक्षम संसद में बैठते हैं। किंतु फिर भी वे भ्रष्टाचार दूर करने के लिए इसी कानून और संविधान में ही आस्था प्रकट कर रहे थे। उनके द्वारा बनाये गये ड्राफ्ट पर संसद में बैठने वाले किसी भी राजनीतिक दल ने सहमति नहीं दी थी पर फिर भी वे अपने लोकपाल बिल के ड्राफ्ट के अनुसार ही कानून बनाने की जिद ठाने आन्दोलन कर रहे थे एवं जिसके लिए आमरण अनशन का सहारा ले रहे थे।

प्रत्येक लोकप्रिय व्यक्ति, संस्था या घटना से अपने को जोड़ कर उसका राजनीतिक लाभ उठाने के लिए उत्सुक रहने वाला संघ परिवार उनके आन्दोलन को मिले समर्थन का लाभ लेने हेतु आगे बढ कर उनका साथ दे रहा था, यही कारण था कि देश की दूसरी संस्थाएं अन्ना के आन्दोलन को भी शंका की दृष्टि से देखने लगी थीं। यह अच्छी बात है कि अन्ना के आन्दोलन से जुड़े नेतृत्वकारी साथियों में एक लोकतांत्रिक भावना जिन्दा है इसलिए उन्होंने बुद्धिजीवियों और आमजन से मिले सुझावों को ध्यान पूर्वक सुना और उस पर अमल किया। सबसे पहले तो उन्होंने अपने आन्दोलन का आर एस एस से सम्बन्ध होने का जोरदार और मुखर खण्डन करते हुए कहा कि जो हमारे आन्दोलन को आर एस एस से जोड़ते हैं उन्हें पागल खाने भेजना चाहिए। यह वक्तव्य बताता है के संघ परिवार के बारे में उनके विचार देश के व्यापक जनमानस की भावनाओं से अलग नहीं हैं। इससे पहले जेल में रहते हुए उन्होंने मिलने के लिए आये बाबा रामदेव से मिलने से इंकार करके स्पष्ट संकेत दिया था कि संघ के साथ रहने वालों से दूरी बना के रहना चाहते हैं। अन्ना हजारे की टीम द्वारा गत रविवार को यह भी कहा गया कि यह लड़ाई केवल लोकपाल पर ही खत्म नहीं होगी बल्कि चुनाव व्यवस्था में सुधार तक जायेगी। उन्होंने अपने समर्थन में उतरे जन समुदाय से कहा कि वे अपने सांसद के घरों के बाहर धरना दें और उन्हें जनलोकपाल बिल के पक्ष में समर्थन देने के लिए कहें। भविष्य़ में इस आन्दोलन को किसानों आदिवासियों की भूमि अधिग्रहण से जोड़ने की बात कह कर कृषकों और ग्रामीण क्षेत्रों तक आन्दोलन के विस्तार की भूमिका तैयार की। इसका परिणाम यह हुआ कि उज्जैन में चल रही संघ के कोर ग्रुप के बैठक को फैसला लेना पड़ा कि जनता के रुख को देखते हुए भाजपा अन्ना हजारे के आन्दोलन को समर्थन तो देगी पर उसमें शामिल नहीं होगी। दूसरी ओर अन्ना के आन्दोलन के समानांतर उन्होंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में एक ग्रुप का गठन किया हुआ है जिसका नाम अन्ना के आन्दोलन इंडिया अगैंस्ट करप्शन से मिलता जुलता यूथ अगेंस्ट करप्शन रखा गया है। यह ग्रुप अन्ना के आन्दोलन को समर्थन देगा। सदैव दुहरेपन में जीने वाले संघ परिवार का यह एक और वैसा ही कदम है जिसके अनुसार वे एक ओर तो साथ देते नजर आते हैं और दूसरी ओर अलग भी हैं। अन्ना टीम और सरकार के बीच कुछ समझौते के आसार भी बन रहे हैं जिसके अनुसार वे न्याय व्यवस्था को लोकपाल के नियंत्रण में लाने की मांग छोड़ सकते हैं, और सरकार प्रधानमंत्री को लोकपाल के अंतर्गत लाने की बात पर स्वीकृत हो सकती है, जो विपक्ष भी चाहता है। यह एक शुभ लक्षण है। अभी तक अन्ना का आन्दोलन एक अमूर्तन में चल रहा था जो अब एक आकार लेता जा रहा है जिसके आधार पर उसके गुण दोषों का मूल्यांकन सम्भव हो सकता है। इस पारदर्शिता के युग में अन्ना के आन्दोलन को मिले आर्थिक सहयोग की सूची सामने आयी है, इसलिए जरूरी हो जाता है कि देश का प्रत्येक आन्दोलन और गैर सरकारी संगठनों समेत सभी जन संगठन अपने धन प्राप्ति के श्रोतों की जानकारी दें। आर एस एस को भी स्पष्ट करना चाहिए कि जब वह अपने आप को एक सांस्कृतिक संगठन कहता है तो सहयोग राशि को गुरु दक्षिणा का नाम देकर गुप्त तरीके से क्यों लेता है?

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4 Comments on "अन्ना का आन्दोलन एक आकार लेता जा रहा है"

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वीरेन्द्र जैन
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वीरेन्द्र जैन
@ श्री अनिल गुप्ता जी, सबसे पहले तो लेख की पसन्दगी के लिए धन्यवाद। दूसरा धन्यवाद इसलिए भी कि आप संघ के प्रशंसक होते हुए भी एक शिष्ट भाषा का प्रयोग कर संवाद कर रहे हैं अन्यथा वेब साइटों पर लेख लिखने के बाद संघ के समर्थकों/ प्रशंसकों, और सदस्यों के जिस गाली गलौज भरी भाषा में तर्कविहीन पत्र मिलते हैं, वे संघ की संस्कृति के उत्पादों का परिचय देते रहे हैं[आप विस्फोट डाट काम पर मेरे लेखों पर प्राप्त टिप्पणियां देख सकते हैं]। संघ से जुड़े लोगों में लोकतांत्रिक भावना नहीं होती, वे असहमति तो दूर किसी को बात… Read more »
डॉ. राजेश कपूर
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अन्ना के आन्दोलन को बुद्धि की कौसौती पर परखने वालों को गांधी जी के नमक सत्याग्रह को ज़रूर याद कर लेना चाहिए. तब भी अनेकों ने कहा होगा कि नमक और आज़ादी का क्या सम्बन्ध ? पर दूर द्रष्टा गांधी भारत के समाज की नब्ज समझते थे. जन भावनाओं को कैसे जगाना है, इसकी उन्हें समझ थी. अन्ना ने भारत के जन मानस को समझ कर तो यह आन्दोलन शुरू नहीं किया पर हुआ कमाल है. किसी ने नहीं सोचा था कि भ्रष्टाचार का मुदा भारत को इतनी गहराई से आंदोलित करदेगा. इससे पहले भी तो अनेकों ने भ्रष्टाचार का… Read more »
Anil Gupta
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श्री वीरेंदर जी का लेख अच्छा है लेकिन इससे संघ व उससे जुड़े संगठनों के प्रति उनका पूर्वाग्रह भी झलकता है.संभवतः उनके नाम के साथ जनवादी लेखक होने का जो ठप्पा लगा है ये उसकी मजबूरी है.एक महत्वपूर्ण तथ्य ये है की जिन लोगों की बदौलत भारत में जनवाद का बीजारोपण हुआ ऐसे सभी लोग देर सवेर उस विचारधारा से विमुख होकर मानवतावादी या राष्ट्रवादी हो गए.एम् एन राय रेडिकल ह्युमनिस्ट हो गए तो श्रीपाद अमृत डांगे के दामाद ने यूनिवर्स इन वेदांत लिखी.अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भी ये प्रमाणित हो चूका है की जनवाद या साम्यवाद या कम्युनिस्म की विचारधारा… Read more »
GGShaikh
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सदा की तरह ही बेहद सकारात्मक सूझ लिए आपका यह आलेख रहा.
अन्ना एक मानव है ओर मानवीय पीडाओं को भुगतते हुए वे आज हमारे बीच हैं…अन्ना को हमारे बुद्धिजिवियों ओर मानवीय सरोकार रखने वालों की बातों को, उनके चिंतन-मनन ओर चिंताओं को नज़रअंदाज़ नहीं करना है… ओर यहाँ से भी बल प्राप्त करना है…

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