लेखक परिचय

संजीव कुमार सिन्‍हा

संजीव कुमार सिन्‍हा

2 जनवरी, 1978 को पुपरी, बिहार में जन्म। दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक कला और गुरू जंभेश्वर विश्वविद्यालय से जनसंचार में स्नातकोत्तर की डिग्रियां हासिल कीं। दर्जन भर पुस्तकों का संपादन। राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर नियमित लेखन। पेंटिंग का शौक। छात्र आंदोलन में एक दशक तक सक्रिय। जनांदोलनों में बराबर भागीदारी। मोबाइल न. 9868964804 संप्रति: संपादक, प्रवक्‍ता डॉट कॉम

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संजीव कुमार सिन्‍हा

हम देखते हैं कि 1885 में स्थापित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जहां आंतरिक कलह और परिवारवाद के कारण दिन-प्रतिदिन सिकुड़ती जा रही है, वहीं 1925 में दुनिया को लाल झंडे तले लाने के सपने के साथ शुरू हुआ भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन आज दर्जनों गुटों में बंट कर अंतिम सांसें ले रहा है। इनके विपरीत 1925 में ही स्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दिनोंदिन आगे बढ़ रहा है।

आज यदि गांधी के विचार-स्वदेशी, ग्राम-पुनर्रचना, रामराज्य-को कोई कार्यान्वित कर रहा है तो वह संघ ही है। महात्मा गांधी का संघ के बारे में कहना था- ‘आपके शिविर में अनुशासन, अस्पृश्यता का पूर्ण रूप से अभाव और कठोर, सादगीपूर्ण जीवन देखकर काफी प्रभावित हुआ’ (16.09.1947, भंगी कॉलोनी, दिल्ली)।

आज विभिन्न क्षेत्रों में संघ से प्रेरित 35 अखिल भारतीय संगठन कार्यरत हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, वैकल्पिक रोजगार के क्षेत्र में लगभग 30 हजार सेवा कार्य चल रहे हैं। राष्ट्र के सम्मुख जब भी संकट या प्राकृतिक विपदाएं आई हैं, संघ के स्वयंसेवकों ने सबसे पहले घटना-स्थल पर पहुंच कर अपनी सेवाएं प्रस्तुत की हैं।

संघ में बौध्दिक और प्रत्यक्ष समाज कार्य दोनों समान हैं। संघ का कार्य वातानुकूलित कक्षों में महज सेमिनार आयोजित करने या मुट्ठियां भींचकर अनर्गल मुर्दाबाद-जिंदाबाद के नारों से नहीं चलता है। राष्ट्र की सेवा के लिए अपना सर्वस्व होम कर देने की प्रेरणा से आज हजारों की संख्या में युवक पंचतारा सुविधाओं की बजाय गांवों में जाकर कार्य कर रहे हैं। संघ के पास बरगलाने के लिए कोई प्रतीक नहीं है और न कोई काल्पनिक राष्ट्र है। संघ के स्वयंसेवक इन पंक्तियों में विश्वास करते हैं-‘एक भूमि, एक संस्कृति, एक हृदय, एक राष्ट्र और क्या चाहिए वतन के लिए?’

संघ धर्म और जाति के आधार पर भेदभाव नहीं करता। इसके तीसरे सरसंघचालक बाला साहब देवरस ने उद्धोष किया कि ‘अस्पृश्यता यदि पाप नहीं है तो कुछ भी पाप नहीं है।’ बाबा साहब भीमराव आंबेडकर का कहना था- ‘अपने पास के स्वयंसेवकों की जाति को जानने की उत्सुकता तक नहीं रखकर, परिपूर्ण समानता और भ्रातृत्व के साथ यहां व्यवहार करने वाले स्वयंसेवकों को देखकर मुझे आश्चर्य होता है’ (मई, 1939, संघ शिविर, पुणे)।

संघ की दिनोंदिन बढ़ती ताकत और सर्वस्वीकार्यता देखकर उसके विरोधी मनगढ़ंत आरोप लगाकर संघ की छवि को विकृत करने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन हमें स्वामी विवेकानंद का वचन अच्छी तरह याद है: ‘हर एक बड़े काम को चार अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है: उपेक्षा, उपहास, विरोध और अंत में विजय।’ इसी विजय को अपनी नियति मानकर संघ समाज-कार्य में जुटा हुआ है।

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74 Comments on "संघ का सच"

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ajit bhosle
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अखिल जी से कोई शिकायत नहीं, ऐसे लोग हर जगह मोजूद हैं इन पर समय खर्च करना कम से कम मैं तो मूर्खता समझता हूँ.

ajit bhosle
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आपने अपना नाम निरंकुश रख कर अच्छा किया अब हम आपको को भारतीयों के विरुद्ध किये हर गुनाह के लिए माफ़ करते हैं/.

श्रीराम तिवारी
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एक लोमड़ी थी.जंगल में रहती थी.किसी कटीली झाड़ी में उलझने से उसकी पूंछ जाती रही. चालाक लोमड़ी ने अपनी इज्जत का फलूदा होने के डर से जंगल के राजा शेर की अध्यक्षता में मीटिंग बुलाई और प्रस्ताव रखा की पूँछ बहुत बुरी चीज होती है,हम जंगली जानवरों को अनावश्यक परेशानी में धकेल सकती है सो इसे कटवा दिया जाये.प्रस्ताव रखते वक्त लोमड़ी एक पेड़ से कुछ इस तरह टिक कर बैठी थी की उसकी पूँछ जहाँ होना चाहिए वो हिस्सा पेड़ की ओट में था.सभी जंगली जानवरों ने प्रस्ताव का समर्थन किया किन्तु एक बूढ़े शेर ने आपत्ति की.बूढ़े शेर… Read more »
डॉ. मधुसूदन
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वि. अवलोकन। देखा है, कि, कुछ टिप्पणीकार आते हैं। जब तर्क के आधारपर टिप्पणी नहीं कर पाते, तो फिर कहने लगते हैं, कि प्रवक्ता “संघी” है। जब कहा जाता है, कि “प्रवक्ता तो सभी विचार धाराओं को जगह देता है”। फिर कहने लगते हैं, कि नहीं,मेरा कहना है, कि, टिप्पणीकार सारे संघी हैं। भाई टिप्पणी कार तो जो टिप्पणी करेंगे वे टिप्पणीकार कहलाएंगे। आपकी टिप्पणी भी तो, छपती ही है, जब सभ्य भाषा में लिखी जाती है। क्यों “नाचने न आए तो बोले आंगन टेढा है।” नोट: क्षमा कीजिए। कठिनाई से इस स्तरपर लिखना पड रहा है। किसी, लेखक बंधु… Read more »
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'/Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'
Guest

अखिल जी, लगता है आप फंस गए हैं, उन लोगों के बीच जो केवल और केवल संघ को ही देश और देश को ही संघ मानते हैं. परमात्मा आपकी रक्षा करें.

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