लेखक परिचय

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

‘नेटजाल.कॉम‘ के संपादकीय निदेशक, लगभग दर्जनभर प्रमुख अखबारों के लिए नियमित स्तंभ-लेखन तथा भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष।

फिर निर्भयाः कानून बने तो ऐसा!

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यदि इन अपराधियों के साथ वही बर्ताव किया जाए, जो इन्होंने उन युवतियों के साथ किया था याने उन्हें खुले आम फांसी दी जाए, उनके अंग भंग किए जाएं और उन्हें मरते हुए लाखों-करोड़ों लोगों को देखने-दिखाने दिया जाए तो भावी बलात्कारियों की हड्डियों में कंपकंपी दौड़ सकती है।

चीनः भारत कोप-भवन में क्यों बैठे?

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वह क्षेत्र कानूनी तौर पर भारत का है। यह भारतीय संप्रभुता का उल्लंघन है। यह बात कागजी तौर पर सही है लेकिन सच्चाई क्या है? भारत की सरकार ने इस क्षेत्र को वापस लेने के लिए आज तक क्या किया है? कुछ नहीं। वह कभी उसे लेने का दावा भी नहीं करती। मुझे खुशी है कि सुषमा स्वराज आजकल उसके बारे में कभी-कभी बोल देती हैं। हमारे नेताओं को शायद पता नहीं है कि 1963 में हुए एक समझौते के तहत पाक ने चीन को इस क्षेत्र की 5180 वर्ग किमी जमीन भेंट कर दी थी। भारत इस समझौते को गैर-कानूनी मानता है। नेताओं को यह भी पता नहीं होगा कि इस समझौते की धारा 6 में कहा गया है कि कश्मीर-समस्या का स्थायी हल निकलने पर इस पर पुनर्विचार होगा।



धर्मग्रंथ बड़ा है कि राष्ट्रग्रंथ ?

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तीन तलाक के बारे में हमारे सर्वोच्च न्यायालय ने अभी जो शुरुआती विचार रखा है, उसी पर देश के विचारकों को खुली बहस चलाने की जरुरत है। अदालत ने कहा है कि वह सिर्फ तीन तलाक के मुद्दे पर विचार करेगी और यह देखेगी कि कुरान में उसका समर्थन है क्या? यदि कुरान तीन तलाक… Read more »

जाधव: सांप मरे, लाठी न टूटे

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हेग की अदालत की सलाह का लाभ उठाकर प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ अपने सेनापति को भी मना सकते हैं। यों मोदी और सुषमा, नवाज़ और सरताज अजीज़ से सीधे बात कर सकते थे लेकिन भारत सरकार की यह उत्तम कूटनीति है कि उसने अप्रत्यक्षतः नवाज़ के हाथ मजबूत कर दिए हैं। यों भी नवाज़ और सेनापति बाजवा के बीच ‘डान लीक’ के मामले में अब शांति हो गई है। नवाज़ शरीफ और मोदी दोनों ही भारत-पाक संबंधों को सुधारना चाहते हैं। यदि हेग की अदालत का फैसला जाधव की रिहाई के लिए हो जाए और पाकिस्तान उसे मान ले तो सांप भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी।

यह न्यायिक आपातकाल क्यों?

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पता नहीं, वह उनसे इतना डरा हुआ क्यों है? एक माह बाद वे सेवा-निवृत्त होने वाले थे। वे हो जाते। मामला खत्म होता लेकिन अब सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आप को दलदल में फंसा लिया है। उसका यह आदेश तो बिल्कुल भी मानने लायक नहीं है कि अखबार और टीवी चैनल कर्णन का कोई भी बयान प्रकाशित न करें। कर्णन का न करें और उनका करें, यह क्या मजाक है? क्या यह न्यायिक आपात्काल नहीं है?

फ्रांस में नए सूर्य का उदय

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मेक्रों फ्रांस के शायद ऐसे पहले राष्ट्रपति हैं, जिनकी संसद में उनका एक भी सांसद नहीं है। यदि अगले माह जून में होने वाले संसदीय चुनावों में उनकी पार्टी बहुमत ले पाई तो वे राष्ट्रपति के तौर पर अपना काम आसानी से कर सकेंगे। यों भी फ्रांस के 25 प्रतिशत युवा बेरोजगार हैं, आर्थिक स्थिति असंतोषजनक है, आतंक का खतरा बना हुआ है और जातीय तनाव भी कायम है। यूरोपीय आर्थिक समुदाय भी आजकल संकटग्रस्त है। अमेरिका के ट्रंप और रुस के पुतिन इस परिस्थिति का फायदा उठाना चाहते हैं।

रोज़े में गोमांस नहीं, गोरस!

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रमजान की तपस्या के दिनों में चित्त ओर पेट दोनों को शांत रखने के लिए शाकाहार से बढ़िया क्या हो सकता है? यदि भारतीय मुसलमान इस रास्ते पर चलें तो वे इस्लाम की इज्जत में चार चांद लगा देंगे।

आधार कार्ड पर साधार बहस

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आधार कार्ड को लेकर आजकल देश में काफी बहस चल रही है। मामला सर्वोच्च न्यायालय में भी गया हुआ है। सरकार कहती है कि भारत के हर नागरिक को यह पहचान-पत्र अनिवार्य रुप से रखना होगा। जबकि सर्वोच्च न्यायालय अपने पिछले दो फैसलों में कह चुका है कि इसे आप अनिवार्य नहीं कर सकते। सरकार… Read more »

निर्भया और बिल्किस बानो

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निर्भया के बलात्कार और हत्या करने वाले चार अपराधियों को आज सर्वोच्च न्यायालय मृत्यु-दंड नहीं देता तो भारत में न्याय की मृत्यु हो जाती। निर्भया कांड ने दिसंबर 2012 में देश का दिल जैसे दहलाया था, उसे देखते हुए ही 2013 में मृत्युदंड का कानून (धारा 376ए) पास हुआ था। छह अपराधियों में से एक… Read more »

बड़ी अदालत में बड़ा अन्याय

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भारत के सर्वोच्च न्यायालय में आप किसी भी भारतीय भाषा का प्रयोग नहीं कर सकते। हिंदी का भी नहीं। हिंदी राजभाषा है। यह हिंदी और राज दोनों का मजाक है। यदि आप संसद में भारतीय भाषाओं का प्रयोग कर सकते हैं तो सबसे बड़ी अदालत में क्यों नहीं? सबसे बड़ी अदालत में सबसे बड़ा अन्याय है, यह ! देश के सिर्फ चार उच्च न्यायालयों में हिंदी का प्रयोग हो सकता है- राजस्थान, उप्र, मप्र और बिहार! छत्तीसगढ़ और तमिलनाडु ने भी स्वभाषा के प्रयोग की मांग कर रखी है।