लेखक परिचय

मनोज ज्वाला

मनोज ज्वाला

* लेखन- वर्ष १९८७ से पत्रकारिता व साहित्य में सक्रिय, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से सम्बद्ध । समाचार-विश्लेषण , हास्य-व्यंग्य , कविता-कहानी , एकांकी-नाटक , उपन्यास-धारावाहिक , समीक्षा-समालोचना , सम्पादन-निर्देशन आदि विविध विधाओं में सक्रिय । * सम्बन्ध-सरोकार- अखिल भारतीय साहित्य परिषद और भारत-तिब्बत सहयोग मंच की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य ।

नेहरू-कांग्रेस के पाप का ठिकरा अम्बेदकर के मत्थे फोडे जाने की त्रासदी

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यहां ध्यान देने की बात
है कि २२ जनवरी १९४७ को, संविधान की प्रस्तावना को जिस दार्शनिक आधारशिला
के तौर पर स्वीकार किया गया था उसे अखंड भारत के संघीय संविधान के
परिप्रेक्ष्य में बनाया गया था वह भी इस आशय से कि इसे ब्रिटिश सरकार की
स्वीकृति अनिवार्य थी क्योंकि २२ जनवरी १९४७ को भारत ब्रिटिश क्राऊन से
ही शासित था । १५ अगस्त १९४७ के बाद से लेकर २६ जनवरी १९५० तक भी भारत का
शासनिक प्रमुख गवर्नर जनरल ही हुआ करता था जो ब्रिटिश क्राऊन के प्रति
वफादारी की शपथ लिया हुआ था न कि भारतीय जनता के प्रति ।

अम्बेदकर के नाम पर कायमदलित-राजनीति के पीछे विदेशी संगठनों की सक्रियता चिन्ताजनक

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डी०एन०एफ०नामक अमेरिकी संस्था एक तरफ भारत के भीतर बहुसंख्यक समाज के
विरूद्ध दलितों और अल्पसंख्यकों को भडका कर विखण्डन के दरार को चौडा करने
में लगी हुई है , तो दूसरे तरफ भारत के बाहर वैश्विक मंचों पर भारतीय
राज्य-व्यवस्था को अक्षम-अयोग्य व पक्षपाती होने का दुष्प्रचार कर इस देश
में अमेरिका के हस्तक्षेप का वातवरण तैयार करने में भी सक्रिय है । ऐसी
एक नहीं अनेक संस्थायें हैं , जो भिन्न-भिन्न तरह के मुद्दों को लेकर
भारत के विरूद्ध अलग-अलग मोर्चा खोली हुई हैं ,



‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ के साथ ‘मैकाले’ से भी हो दो-दो हाथ

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विष-वृक्ष को काट-पीट कर उसका सफाया कर देना पर्याप्त नहीं
होता, जब तक उसे खाद-पानी देते रहने वाली उसकी जड-मूल को नष्ट न कर दिया
जाय । ऐसे में जरूरत है कि ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ अभियान के साथ-साथ
मैकाले से भी दो-दो हाथ कर उसकी षडयंत्रकारी अभारतीय शिक्षा-पद्धति को
उखाड कर भारतीय जीवन-दर्शन की शिक्षा-पद्धति स्थापित की जाए , तभी सही
अर्थों में स्थायी तौर पर ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ का निर्माण हो सकेगा ,

कांग्रेस-मुक्त भारत का नारा और कांग्रेसियत-युक्त सियासी नजारा

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नरेन्द्र मोदी को छोड कर किसी ने ऐसी कोई नजीर पेश नहीं की है अब तक,
जो कांग्रेसियत से रहित हो । जिस तरह से कांग्रेसियों द्वरा गांधी के
हिन्द-स्वराज को तिलांजलि दे कर सत्ता-सुख भोगना ही अपनी प्राथमिकताओं मे
शामिल कर लिया गया, उसी तरह दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म-मानव दर्शन का
ज्ञान औसत भाजपाइयों को आज भी नहीं है ।

मैकाले-पद्धति को शीर्षासन कराता महर्षि अरविन्द का शिक्षा-दर्शन

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“ वास्तविक शिक्षण
का प्रथम सिद्धान्त है- ‘कुछ भी न पढ़ाना’ , अर्थात् शिक्षार्थी के
मस्तिष्क पर बाहर से कोई ज्ञान थोपा न जाये । शिक्षण प्रक्रिया द्वारा
शिक्षार्थी के मस्तिष्क की क्रिया को सिर्फ सही दिशा देते रहने से उसकी
मेधा-प्रतिभा ही नहीं, चेतना भी विकसित हो सकती है, जबकि बाहर से ज्ञान
की घुट्टी पिलाने पर उसका आत्मिक विकास बाधित हो जाता है ।”

भगवा योगी की जय ! अर्थात, सफेद-आतंकियों की पराजय

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खुद ‘सफेद आतंक’ बरपाते रहे इन समाजवादियों-कांग्रेसियों
द्वारा मुस्लिम-वोटबैंक पर अपनी पकड बनाये रखने के लिए साम्प्रदायिक
तुष्टिकरण-आधारित विभेदकारी शासन से बहुसंख्यक समाज में उत्त्पन्न
असंतोष-अक्रोश ने योगी आदित्यनाथ के हिन्दूत्ववादी तेवर को धार देने और
पूरे प्रदेश में उसे चमकाने का काम किया ।

ऋषि-द्वय कह गए दुनिया से,युग-परिवर्तन नियति की नीयत है

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दोनों उच्च कोटि के पत्रकार-सम्पादक
थे । अंग्रेजी शासन के विरूद्ध अरविन्द अंग्रेजी में ‘वन्देमातरम’
निकालते थे , तो श्रीराम हिन्दी में ‘सैनिक’ । किन्तु बाद में किसी
दिव्यात्मा के सम्पर्क से दोनों योग-साधना के बदौलत चेतना के उच्च शिखर
पर पहुंच कर दैवीय योजना के तहत अपनी-अपनी भूमिका को तदनुसार नियोजित कर
राष्ट्रीय चेतना जगाने-उभारने के आध्यात्मिक उपचार में संलग्न हो गए ।

बदलें अपनी चाल , नया युग आने वाला है !

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मनोज ज्वाला व्यक्ति, परिवार , समाज व देश-दुनिया में व्याप्त तमाम अवांछनीयताओं के उन्मूलनार्थ नैतिक-वैचारिक क्रांति-युक्त युग निर्माण योजना का सूत्रपात करते हुए युग-परिवर्तन का विश्वव्यापी आध्यात्मिक सरंजाम खडा कर अपने तप के ताप से समस्त वातावरण को तपाने वाले महान स्वतंत्रता सेनानी व आधुनिक ऋषि पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य के कृत्य व कथ्य फलित-घटित… Read more »

कांग्रेस रानी की दुर्दशा पर दासी वामपंथियों का विधवा-विलाप

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मनोज ज्वाला १४ अगस्त सन १९४७ की आधी रात को दिल्ली में हुआ सत्ता-हस्तान्तण वास्तव में ब्रिटिश साम्राज्य के प्रतिनिधि लार्ड माउण्ट बैटन और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष जवाहर लाल नेहरू के बीच हुई एक दुरभिसंधि का परिणाम एवं एक सियासी साजिस का क्रियान्वयन था । भारत पर अंग्रेजों की सत्ता को कायम… Read more »

अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम , अर्थात बेरोक-टोक धर्मान्तरण

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मनोज ज्वाला ‘अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम’ दुनिया भर के देशों को छडीबाज मास्टर की तरह स्वतंत्रता , समानता, लोकतंत्र व मानवाधिकार का पाठ पढाते रहने वाले अमेरिका के हाथों का एक ऐसा डंडा है , जिसकी मार से उसकी छाल इस कदर उखड जाती है कि धार्मिक स्वतंत्रता की परिभाषा ही बदल जाती है ।… Read more »