लेखक परिचय

मनोज ज्वाला

मनोज ज्वाला

* लेखन- वर्ष १९८७ से पत्रकारिता व साहित्य में सक्रिय, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से सम्बद्ध । समाचार-विश्लेषण , हास्य-व्यंग्य , कविता-कहानी , एकांकी-नाटक , उपन्यास-धारावाहिक , समीक्षा-समालोचना , सम्पादन-निर्देशन आदि विविध विधाओं में सक्रिय । * सम्बन्ध-सरोकार- अखिल भारतीय साहित्य परिषद और भारत-तिब्बत सहयोग मंच की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य ।

विष-वृक्ष की जडों के पोषण और पत्तों के डिजिटलाइजेशन की त्रासदी

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मनोज ज्वाला भारत में ‘काला धन’ और ‘काली कमाई’ वस्तुतः दुनिया भर से सारे धन बटोर लेने-हडप लेने को आतुर युरोपीय उपनिवेशवाद के साम्राज्यवादी षड्यंत्रों की बाड के तौर पर अंग्रेजों द्वारा रोपे गए ‘विष-वृक्षों’ के फल-फूल हैं । अंग्रेजों के चले जाने के बाद भी हम उन्हीं विष-वृक्षों को सिंचने-उगाने में और भी ज्यादा… Read more »

भारत के विरूद्ध सक्रिय संगठनों का वैश्विक तंत्र – ०२

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यह विडम्बना ही नहीं धूर्त्तता भी है कि जिन लोगों को आध्यात्मिक ज्ञान का ककहरा-मात्रा भी नहीं मालूम है वे दलितों को आध्यात्मिक लाभ देने में लगे हुए हैं और इस तथाकथित लाभ के नाम पर उनके गले में गुलामी का फंदा डालने वाले वे लोग उस फंदे को ही मुक्ति का माध्यम व स्वयं को मुक्तिदाता भी बता रहे हैं । इतना ही नहीं, इसकी पूरी अनुकूलता नहीं मिल पाने के कारण वे भारत के कानून-व्यवस्था को धार्मिक स्वतंत्रता का उत्पीडक बताते हुए इसके विरूद्ध अमेरिका से हस्तक्षेप की मांग भी कर रहे हैं ।



भारत के विरूद्ध सक्रिय संगठनों का वैश्विक तंत्र .

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मनोज ज्वाला पिछली दो शताब्दियों में नस्लीय रंगभेद-आधारित औपनिवेशिक साम्राज्यवाद के पुरोधा बने इंग्लैण्ड द्वारा ‘फुट डालो-शासन करो’ की नीति के तहत भारत पर शासन करते हुए अपनी दूरगामी योजना के तहत सन १९४७ में इसे खण्डित कर इसकी सत्ता का हस्तान्तरण कर दिए जाने के बावजूद शेष भारत के और अधिक विखण्डन का षड्यंत्र… Read more »

काले धन के जड-मूल : पाश्चात्य-पद्धति के स्कूल

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काले धन के विष-वृक्ष से समाज व देश को अगर सचमुच ही मुक्त
करना है , तो इसकी पत्तियों व डालियों के ‘विमुद्रीकरण’ अथवा लेन-देन की
प्रक्रिया के ‘कम्प्युटरीकरण’ से कुछ नहीं होगा ; बल्कि इसके लिए इसके
जड-मूल अर्थात दीक्षाहीन पाश्चात्य शिक्षा-पद्धति को उखाड कर
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष-सम्पन्न भारतीय शिक्षण-पद्धति का पुनर्पोषण करना
होगा ।

ह्यूम के हाथों कांग्रेस की स्थापना के निहितार्थ

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मनोज ज्वाला अपने देश की स्वतंत्रता के लिए अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध लडाई लडने वाली भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस नामक राजनीतिक संगठन की स्थापना एक अंग्रेज के हाथों किया जाना उतना ही कौतूहल का विषय है, जितना यह कि २८ दिसमबर १८८५ को इसकी स्थापना के लिए देश भर से बम्बई पहुंचे तमाम प्रतिनिधियों के स्वागतार्थ… Read more »

भारत में दलित मामलों के पीछे अभारतीय गैर-दलित संगठन सक्रिय

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मनोज ज्वाला अपने देश में समय-समय पर दलितों के उत्पीडन और धर्मान्तरण के जो मामले सामने आते रहे हैं उनके पीछे विदेशी संगठनों की सक्रियता ध्यान देने योग्य है । भारत की सामाजिक संरचना को विखण्डित करने और विदेशी साम्राज्यवादी शक्तियों के हस्तक्षेप को आमंत्रित करने के लिए अनेक अभारतीय संगठन  विभिन्न रूपों में यहां… Read more »

वैश्विक मंच पर प्राचीन भारतीय शिक्षण-पद्धति की धमक

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मनोज ज्वाला भारत को सदा-सदा के लिए अंग्रेजों का उपनिवेश बनाये रखने की कुटिल मंशा के तहत यहां के नवनिहालों पर अंग्रेजी शिक्षण-पद्धति को थोप देने वाला षड्यंत्रकारी टी०बी० मैकाले अपनी सफलता पर भले ही कभी विहंसता रहा हो , किन्तु अब वह यह जान कर भारी सदमें में है कि उसकी कुटिल बुद्धि से… Read more »

फिर विकसित न हो पाये शिक्षा के वे सुंदर उपवन

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मनोज ज्वाला २० अक्टूबर सन १९३१ को लन्दन के रायल इंस्टिच्यूट आफ इंटरनेशनल अफेयर्स के मंच से भाषण करते हुए महात्मा गांधी ने कहा था कि “ मैं बगैर किसी भय के कहता हूं कि भारत पर ब्रिटिश शासन की स्थापना से एक सौ साल पहले भारत आज की तुलना में अधिक सुशिक्षित था ।… Read more »

भारत को गुलाम बनाए रखने के उपाय की सफलता लक्ष्य से भी ज्यादा : अंग्रेजी-मैकाले-शिक्षापद्धति

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मनोज ज्वाला भारत को लम्बे समय तक गुलाम बनाये रखने का उपाय करने के लिए ब्रिटेन के रणनीतिकारों में लम्बे समय तक बहस होती रही थी । हालाकि उस बहस का घोषित विषय यह नहीं था, बल्कि यह था कि भारतीय लोगों-बच्चों को क्या और कैसी तथा किस विधि से शिक्षा दी जाये ; किन्तु… Read more »

‘लोकमंथन’ से निकली युक्ति- सच्चे स्वराज के लिए बदलें शिक्षा-पद्धति

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मनोज ज्वाला ‘हिन्द-स्वराज’ में महात्मा गांधी ने अपने सपनों के स्वराज को परिभाषित करते हुए लिखा है- “ सारे अंग्रेज भारत छोड वापस ब्रिटेन चले जाएं और उनकी संस्कृति यहां कायम रहे , तो मैं कतई नहीं मानुंगा कि स्वराज मिला ; किन्तु एक भी अंग्रेज वापस न जाए , बल्कि दो-चार लाख और भी… Read more »