लेखक परिचय

मनोज ज्वाला

मनोज ज्वाला

* लेखन- वर्ष १९८७ से पत्रकारिता व साहित्य में सक्रिय, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से सम्बद्ध । समाचार-विश्लेषण , हास्य-व्यंग्य , कविता-कहानी , एकांकी-नाटक , उपन्यास-धारावाहिक , समीक्षा-समालोचना , सम्पादन-निर्देशन आदि विविध विधाओं में सक्रिय । * सम्बन्ध-सरोकार- अखिल भारतीय साहित्य परिषद और भारत-तिब्बत सहयोग मंच की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य ।

अमेरिकी संस्थाओं के निशाने पर हिन्दू धर्म, कुछ करेंगे ट्रम्प ?

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मनोज ज्वाला हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति, हिन्दू समाज और हिन्दू राष्ट्र अभूतपूर्व संकटों और अंतर्राष्ट्रीय षड्यंत्रों के दौर से गुजर रहा है । इस षड्यंत्र में वैसे तो अमेरिका की कई संस्थायें शामिल हैं, किन्तु दलित फ्रीडम नेटवर्क और फ्रीडम हाऊस दो ऐसी संस्थायें हैं, जो अमेरिकी शासन में भी इतनी गहरी पैठ रखती हैं… Read more »

राजीव गांधी फाउण्डेशन का असली चेहरा

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मनोज ज्वाला पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के निधनोपरांत तत्कालीन कांग्रेसी सरकार की पहल पर स्थापित किए गए ‘राजीव गांधी फाउण्डेशन’ के बारे में आम तौर पर सामान्य लोग यही जानते हैं कि यह देश का भला करने वाली एक जन-कल्याणकारी संस्था है । घोषित तौर पर इसके उद्देश्य और कार्य ऐसे ही हैं । देश… Read more »



थोडा पढे तो गांव छोड दे , ज्यादा पढे तो नगर ;

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थोडा पढे तो गांव छोड दे , ज्यादा पढे तो नगर ; और पढे सो देश छोड दे , मैकाले-शिक्षण का जो असर ! मनोज ज्वाला हिन्दुस्तान टाइम्स में प्रकाशित एक सर्वेक्षण को ले कर लिखे मेरे एक लेख- “देश छोडने को तैयार नवजवान” पर मेरे मेल-बाक्स में देश-विदेश से बुद्धिजीवियों की प्रतिक्रियायें लगातार आ… Read more »

भारत के विरूद्ध भारतीय ‘बौद्धिक-बहादुरों’ की जमात के अभारतीय करामात

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मनोज ज्वाला कहा जाता है कि मुट्ठी भर अंग्रेज इंग्लैण्ड से कई गुणा विशाल भारत पर शासन करने में इसी कारण सफल हो पाए , क्योंकि उनकी सेना और पुलिस में नब्बे प्रतिशत से अधिक लोग भारतीय ही थे । छल-छद्म की रीति व कुटिल कूटनीति से भारतीय राजाओं-रजवाडों का सहयोग-समर्थन और अंग्रेजी पढे-लिखे लोगों… Read more »

भारत छोड विदेशों में बसना चाहते नवजवान

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मैकाले-अंग्रेजी शिक्षा पद्धति का परिणाम मनोज ज्वाला २० दिसम्बर २०१६ के हिन्दुस्तान टाइम्स में प्रकाशित उसके एक सर्वेक्षण पर गौर करने की जरुरत है , जिसमें बताया गया है कि हमारे देश के पढे-लिखे और शहरी नवजवानों में से आधे से अधिक ऐसे हैं , जो अपने भारत देश को पसंद नहीं करते ; वे… Read more »

महात्मा गांधी की हत्या के हालात और जांच में पक्षपात

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मनोज ज्वाला महात्मा गांधी की हत्या के लिये रामचंद्र विनायक गोड्से उर्फ नत्थुराम गोड्से को ५०० रुपये में बीस बारुदी गोलियों के साथ एक नया बैरेटा पिस्टल उपलब्ध् करानेवाले होम्योपैथिक डाक्टर जगदीश प्रसाद गोयल उर्फ दत्तात्रेय परचुरे के विरुद्ध आज तक कोई कार्र्वाई नहीं होने तथा गोली लगने के बाद गांधी जी को अस्पताल न… Read more »

राजनीतिक प्रदूषण का मारा- गणतंत्र बेचारा !

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मनोज ज्वाला २६ जनवरी सन १९५० से हमारे गणतंत्र की आरम्भ हुई यात्रा विविध राजनीतिक हालातों अवसरों चुनौतियों व प्रवृतियों से होती हुई आज एक ऐसे मुकाम पर पहुंच गई है , जहां इसकी अब तक की उपलब्धियों पर गौर फरमाने की जरुरत महसूस हो रही है तो वहीं दूसरी ओर इसके गंतब्य की दृष्टि… Read more »

कठघरे में संविधान !?

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मनोज ज्वाला हमारे देश भारत का संविधान ‘भारतीय संविधान’ नहीं है , यह ‘अभारतीय संविधान’ है । मतलब यह कि जिसे भारतीय संविधान कहा जा रहा है , इसका निर्माण हम भारत के लोगों ने अथवा हमारे पूर्वजों ने हमारी इच्छानुसार नहीं किया है । वैसे कहने-कहाने देखने-दिखाने को तो इस संविधान की मूल प्रति… Read more »

जन-मन के बिना ‘गण’तंत्र ; अनर्थकारी षड्यंत्र

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मनोज ज्वाला हमारे राष्ट्र-गान में ‘जन-मन’ के बीच में है ‘गण’ । शब्दों के इस क्रम के अपने विशेष निहितार्थ हैं । जन अर्थात जनता को अभिव्यक्त करने वाला व्यक्ति तथा गण अर्थात व्यक्तियों के संगठन-समूह अथवा उनके प्रतिनिधि और मन अर्थात इच्छा या पसंद । “ जन-गण-मन अधिनायक जय हे ” अर्थात , जनता… Read more »

गणतंत्र के ६७ वर्ष : अनर्थ और विमर्श

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मनोज ज्वाला २६ जनवरी सन १९५० से जन-मन के बीच हमारे गणतंत्र की आरम्भ हुई यात्रा विविध राजनीतिक हालातों अवसरों चुनौतियों व प्रवृतियों से होती हुई आज एक ऐसे मुकाम पर पहुंच गई है , जहां एक ओर इसकी अब तक की उपलब्धियों पर गौर फरमाने की जरुरत महसूस हो रही है , तो वहीं… Read more »