लेखक परिचय

मनमोहन आर्य

मनमोहन आर्य

स्वतंत्र लेखक व् वेब टिप्पणीकार

मेरा धर्मग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश

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  मनुष्य जब जन्म लेता है तो उसे किसी भाषा का ज्ञान नहीं होता है, अन्य विषयों के ज्ञान होने का तो प्रश्न ही नही होता। सबसे पहले वह अपनी माता से उसकी भाषा, मातृभाषा, को सीखता है जिसे आरम्भिक जीवन के दो से पांच वर्ष तो नयूनतम लग ही जाते हैं। इसके बाद वह भाषा ज्ञान को व्याकरण की सहायता से जानकर उस पर धीरे धीरे अधिकार करना आरम्भ करता है। भाषा सीख लेने पर वह व्यक्ति उस भाषा की किसी भी पुस्तक को जानकर उसका अध्ययन कर सकता है। संसार में मिथ्या ज्ञान व सद्ज्ञान दोनों प्रकार के ग्रन्थ विद्यमान हैं। मिथ्या ज्ञान की पुस्तकें, भले ही वह धार्मिक हां या अन्य, उसे असत्य व जीवन के लक्ष्य से दूर कर अशुभ कर्म वा पाप की ओर ले जाती हैं।

तीसरा अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस और योगदर्शन द्वारा ईश्वर साक्षात्कार

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मनमोहन कुमार आर्य आज 21 जून, 2017 को विश्व के अधिकांश भागों में तीसरा अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया। तीन वर्ष पूर्व भारत के यशस्वी प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने सयुक्त राष्ट्र महासभा में योग को अन्तर्राष्ट्रीय दिवस घोषित करने का प्रस्ताव रखा था जिसे विश्व के 177 देशों का समर्थन प्राप्त हुआ था… Read more »



ऋषि दयानन्द जीवन के प्रमुख महान कार्य

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ऋषि दयानन्द का पहला प्रमुख कार्य तो उनका गुरु विरजानन्द जी से आर्ष शिक्षा को प्राप्त करना था जिससे वह वेदों के यथार्थ स्वरूप सहित वेद मन्त्रों के यथार्थ अर्थ जान सके। यदि यह न हुआ होता तो फिर ऋषि दयानन्द, दयानन्द व स्वामी दयानन्द ही रहते जैसे कि आज अनेकानेक साधु संन्यासी व विद्वान हैं। कोई उनको जानता भी न। गुरु विरजानन्द जी की शिक्षा ने उन्हें संसार के सभी विद्वानों से अलग किया जिसका कारण उनकी प्रत्येक मान्यता का आधार वेद सहित सत्य व तर्क पर आधारित होने के साथ उनका सृष्टि क्रम के अनुकूल होना भी है।

पुनर्जन्म का ज्ञानपूर्ण व बुद्धिसंगत कारण व आधार

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  मनमोहन कुमार आर्य मनुष्य जन्म का आधार प्रत्यक्ष रूप में माता-पिता होते हैं परन्तु अप्रत्यक्ष रूप में इस सृष्टि में व्यापक एक चेतन सत्ता जो सृष्टि की उत्पत्ति की सामर्थ्य सहित मनुष्य व अन्य प्राणियों की उत्पत्ति व रचना का ज्ञान रखती है, वह दोनों हैं। हमने माता-पिता से इतर सृष्टि में व्यापक एक… Read more »

अनादि से अनन्त काल की यात्रा में जीवात्मा कर्मानुसार अनेक प्राणी योनियों में विचरता रहा है और आगे भी विचरेगा

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  मनमोहन कुमार आर्य यदि हम आर्यसमाज की बात न करें और इतर मनुष्यों व समुदायों की बातें करें तो हम देखते हैं कि मनुष्य को जड़ व चेतन का भेद व उसका तत्वार्थ ज्ञात नहीं है। मनुष्य का जन्म होता है, माता-पिता उसका पालन करते हैं, स्कूल व कालेजों में पढ़ने के लिए उसे… Read more »

माता के समान हितकारी गाय की रक्षा करना मनुष्य मात्र का परम कर्तव्य व धर्म

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मनमोहन कुमार आर्य संसार के जितने भी देश है या यह कहिये कि पृथिवी तल पर जहां-जहां भी मनुष्य है, वहां-वहां गाय भी विद्यमान है। यह व्यवस्था ईश्वर ने मनुष्यों के हितों को देखकर की है। यदि उसे मनुष्य का हित करना अभीष्ट न होता तो ईश्वर गाय को बनाता ही नहीं। मनुष्यों को अपने… Read more »

ईश्वरीय ज्ञान वेदों के 6 अंग शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष हैं:

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ईश्वरीय ज्ञान वेदों के 6 अंग शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष हैं: डा. ज्वलन्त कुमार शास्त्री -मनमोहन कुमार आर्य श्रीमद् दयानन्द आर्ष ज्योतिर्मठ गुरुकुल, पौंधा, देहरादून उत्तराखण्ड राज्य का वैदिक विद्या के अध्ययन का एक प्रमुख केन्द्र है। सन् 2000 में स्थापित यह गुरुकुल अपने जीवन के 17 वर्ष पूरे कर 18वें वर्ष… Read more »

ऋषिभक्त आर्यों, नेताओं व विद्वानों का राग-द्वेष से मुक्त होना आवश्यक

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सत्यार्थप्रकाश को ऋषि दयानन्द सरस्वती जी का सबसे महत्वपूर्ण ग्रन्थ कह सकते हैं। इसके उत्तरार्ध के चार समुल्लासों में अन्तर्देशीय व दूर विदेशों में उत्पन्न मतों की समालोचना की गई है। ऋषि ने इन सभी चार समुल्लासों की पृथक भूमिका लिखी है। चतुर्दश समुल्लास की भूमिका में उन्होंने लिखा है कि उनका यह लेख हठ, दुराग्रह, ईष्र्या, द्वेष, वाद-विवाद और विरोध घटाने के लिये किया गया है, न कि इनको बढ़ाने के अर्थ क्योंकि एक दूसरे की हानि करने से पृथक् रह, परस्पर को लाभ पहुंचाना हमारा मुख्य कर्म है। अब यह विवेच्य मत विषय सब सज्जनों के सामने निवेदन करता हूं। विचार कर, इष्ट का ग्रहण, अनिष्ट का परित्याग कीजिये। हमारे विद्वानों को इसी भावना से ही अन्य विद्वानों की आलोचना करनी चाहिये। हमारी आलोचना पढ़कर कोई विद्वान हमसे क्षमा याचना ही करे, इसकी अपेक्षा करना उचित नहीं है।

मनुष्य जीवन के उत्थान का एक सरल उपाय

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मनुष्य जीवन में संगतिकरण का भी महत्व है। अच्छे लोगों की संगति का अच्छा परिणाम होता है और बुरे लोगों की संगति से मनुष्य का जीवन व भविष्य पतन को प्राप्त हो जाता है। सत्यार्थप्रकाश पढ़कर जब हम सन्ध्योपासना व स्वाध्याय करते हैं तो हमारी संगति अध्यययन किये जा रहे विषय सहित ईश्वर के साथ होती है। ईश्वर संसार के सब गुणों का अधिपति व स्वामी होने सहित सभी अवगुणों से सर्वथा मुक्त है।

आर्यसमाज के प्रचार की धीमी गति के कारणों पर विचार

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आर्यसमाज के प्रचार की धीमी गति में आर्यसमाज में पदाधिकारियों व सदस्यों की गुटबाजी व उसके पीछे कुछ लोगों के निहित स्वार्थ यथा लोकैषणा, वित्तैषणा तथा पुत्रैषणा भी सम्मिलित हैं। इस कारण योग्य लोग पदाधिकारी न चुने जाकर तिकड़मी व कम योग्यता वाले लोग पदाधिकारी बन जाते हैं। इससे एक हानि यह होती है कि बहुत से सज्जन व निष्पक्ष लोग आर्यसमाज में आना ही छोड़ देते हैं।