लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

राहुल बाबा का गीता ज्ञान  

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मेरी राय है कि इसके बाद वे रामायण, महाभारत, वेद, पुराण और स्मृतियों का भी अध्ययन करें। अच्छा हो वे श्री गुरुग्रंथ साहब, बाइबल, कुरान, त्रिपिटक और जैनागम ग्रंथ भी पढ़ें। इससे उन्हें भारत में प्रचलित विभिन्न धर्म, पंथ, सम्प्रदाय और मजहबों के बारे में पता लगेगा। इस जन्म की तो मैं नहीं जानता, पर शायद इससे उनका अगला जन्म सुधर जाए।

चोरी और डकैती का लाइसेंस  

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सच कहूं, मैं कपिल सिब्बल से बहुत प्रभावित हूं। यद्यपि मेरी उनसे आज तक भेंट नहीं हुई। भगवान न करे कभी हो। चूंकि वकील, डॉक्टर और थाने के चक्कर में एक बार फंसे, तो जिंदगी भले ही छूट जाए, पर ये पिंड नहीं छोड़ते। हमारे प्रिय शर्मा जी ने जवानी में डेढ़ साल कानून की… Read more »



विपक्षी एकता की (अ)संभावनाएं

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विपक्षी एकता की खिचड़ी पकाने के प्रयास फिर से हो रहे हैं। 1947 के बाद केन्द्र और राज्यों में प्रायः कांग्रेस का ही वर्चस्व रहता था। विपक्ष के नाम पर कुछ जनसंघी, तो कुछ वामपंथी ही सदनों में होते थे। 1967 में डा. राममनोहर लोहिया और दीनदयाल उपाध्याय के प्रयास से पहली बार यह खिचड़ी… Read more »

       नेता वही जो वोट दिलाये     

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होली आते ही मौसम सुहावना हो जाता है। हर तरफ बसंती उल्लास। नाचते-गाते लोग। मस्ती करते पशु और चहचहाते पक्षी। स्वच्छ धरती और मुक्त आकाश। डालियों पर हंसते फूल और कलियां। शीतल और गुनगुनी हवा में अठखेलियां करती गेहूं की बालियां। ऐसा लगता है मानो अल्हड़ नवयौवनाएं एक दूसरे के गले में हाथ डाले पनघट… Read more »

वाद, विवाद और विकासवाद  

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सिरदर्द के अनेक कारण होते हैं। कुछ आतंरिक होते हैं, तो कुछ बाहरी। पर मेरे सिरदर्द का एक कारण हमारे पड़ोस में रहने वाला एक चंचल और बुद्धिमान बालक चिंटू भी है। उसके मेरे घर आने का मतलब ही सिरदर्द है। कल शाम को मैं टी.वी. पर समाचार सुन रहा था कि वह आ धमका।… Read more »

आलू और पनीर (सेल्वम्)

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दुनिया की हर भाषा में लोकजीवन में प्रचलित प्रतीकों और मुहावरों का बड़ा महत्व है। फल-सब्जी, पशु-पक्षी और व्यवहार या परम्पराओं से जुड़ी बातें साहित्य की हर विधा को समृद्ध करती दिखती हैं। अब आप आलू को ही लें। यह हर सब्जी में फिट हो जाता है। इससे नमकीन और मीठे, दोनों तरह के व्यंजन… Read more »

कार्यकर्ता या नेता

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पिछले कई दिन से शर्मा जी से भेंट नहीं हुई। पता लगा कि वे चुनाव में व्यस्त हैं। असल में 40 साल की समाजसेवा के बावजूद उनकी ओर किसी का ध्यान नहीं गया। उनकी बड़ी इच्छा थी कि वे भी चुनाव लड़ें। चुनाव की चर्चा चलते हुए छह महीने हो गये; पर किसी दल ने… Read more »

विचार और व्यवहार के बीच झूलती भारतीय राजनीति

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भारतीय राजनीति और राजनेता अजीब असमंजस में हैं। विचार पर दृढ़ रहें या व्यावहारिक बनें। पांच राज्यों के चुनाव के बीच यह यक्षप्रश्न एक बार फिर सिर उठाकर खड़ा हो गया है। आजादी से पहले भारत में कांग्रेस ही एकमेव दल था। उसका मुख्य लक्ष्य आजादी प्राप्त करना था। इसलिए विभिन्न विचारों वाले नेता वहां… Read more »

आरक्षण का भूत

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जहां तक आरक्षण के बारे में संघ का दृष्टिकोण है, तो इस बारे में तो संघ के किसी अधिकृत व्यक्ति की बात ही माननी होगी। संघ के सहसरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होस्बले का बयान इस बारे में आया भी है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि जब तक जाति, जन्म और क्षेत्रगत असमानताएं हैं, तब तक आरक्षण जरूरी है; लेकिन इस बयान के बावजूद वे विघ्नसंतोषी लोग शांत नहीं हुए हैं, चूंकि उनका उद्देश्य समानता लाना नहीं, बल्कि चुनाव में भा.ज.पा. को हराना है।

खादी को खुला बाजार दें

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इस वर्ष खादी विकास एवं ग्रामोद्योग आयोग ने अपने वार्षिक कैलेंडर एवं डायरी पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का चरखा चलाते हुए चित्र छापा है। इस पर कई लोग जल-भुन गये। कुछ कांग्रेसी, गांधीवादियों तथा भाजपाइयों ने अपने टेढ़े बयानों से इस विवाद की आग में घी डाल दिया। इन दिनों मीडिया वाले पांच राज्यों के… Read more »