लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

भारत के नये पर्व 

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चुनाव की आहट आते ही ये भी शुरू हो जाते हैं। राजनीतिक दल और उनके नेता घोषणाएं करने लगते हैं कि सत्ता में आकर हम ये करेंगे और वो करेंगे। कुछ लोग तो आकाश से तारे तोड़ लाने की बात करने लगते हैं, भले ही उनकी झोली में घर के वोट भी न हों। इसे ‘घोषणा पर्व’ कहते हैं। इससे मिलता हुआ ‘उद्घाटन पर्व’ है। सत्ताधारी नेता आधी हो या अधूरी, पर हर सप्ताह किसी न किसी योजना का उद्घाटन कर देते हैं।

     कीमत और मूल्य

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सामान्य रूप से ये दोनों एक से लगते हैं; पर थोड़ा गहरे में जाएं, तो ध्यान आता है कि जब कोई व्यक्ति, गांव, समाज या देश लम्बे समय तक कोई कीमत चुकाता है, तो दुनिया में कुछ मूल्य स्थापित होते हैं। फिर उन्हीं का अनुसरण कर लोग आगे बढ़ते हैं। ऐसे उदाहरण हर युग में… Read more »



तलाश पूरी हुई

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राजेश बाबू देहरादून में रहते हैं। उनकी बेटी सुमन एम.ए. के अंतिम वर्ष में थी। हर पिता की तरह वे भी उसके विवाह के लिए चिंतित थे। उनकी इच्छा थी कि परीक्षा के बाद इस सर्दियों में उसके हाथ पीले कर दिये जाएं। उन्होंने अपने मित्रों और सम्बन्धियों को यह कह रखा था कि उनकी… Read more »

बाप जी की दुकान

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यों तो हर गांव और नगर में चौक होते हैं; पर लखनऊ के चौक की बात ही कुछ और है। यह केवल एक चौराहा नहीं, बल्कि 200 साल पुराना बाजार और घनी आबादी वाला क्षेत्र भी है। इसलिए इसे ‘पुराना शहर’ भी कहते हैं। लखनऊ के प्रसिद्ध चिकन की कढ़ाई वाले कपड़े यहां सबसे अच्छे… Read more »

कांग्रेस टर्न

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यदि साल के बारह महीनों में सावन और भादों का महीना न हो, तो जीवन में सर्वत्र सूखापन छा जाए। ऋतुराज भले ही बसंत को कहते हैं; पर वर्षाकाल के बिना बसंत भी सूना ही है। लेकिन सावन-भादों में वर्षा यदि जरूरत से ज्यादा होने लगे, तो भी मुसीबत आ जाती है। इस बार भी… Read more »

नेता बीमार, दुखी संसार

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शर्मा जी कल मेरे घर आये, तो उनके चेहरे से दुख ऐसे टपक रहा था, जैसे बरसात में गरीब की झोंपड़ी। मैंने कुछ पूछा, तो मुंह से आवाज की बजाय आंखों से आंसू निकलने लगे। उनके आंसू भी क्या थे, मानो सभी किनारे तोड़कर बहने वाली तूफानी नदी। यदि मैं कविहृदय होता, तो इस विषय… Read more »

बाबा, उनकी नींद भली

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लोकजीवन में कहावतों का बड़ा महत्व है। ये होती तो छोटी हैं, पर उनमें बहुत गहरा अर्थ छिपा होता है। ‘‘जो सोता है, वो खोता है’’ और ‘‘जो जागे सो पावे’’ ऐसी ही कहावते हैं। लेकिन एक भाषा की कहावत दूसरी भाषा में कई बार अर्थ का अनर्थ भी कर देती है। एक हिन्दीभाषी संत… Read more »

शीला दादी की बंद दुकान

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हिन्दी में कुछ शब्दों का प्रयोग प्रायः साथ-साथ होता है। जैसे दिन और रात, सुबह और शाम, सूरज और चांद, बच्चे और बूढ़े, जवानी और बुढ़ापा, धरती और आकाश… आदि। प्रायः ये शब्द एक-दूसरे के विलोम होते हैं। लिखते या बोलते समय अपनी बात का वजन या सुंदरता बढ़ाने के लिए इनका प्रयोग होता है।… Read more »

पाप का बोझ

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  मुझे बालपन से ही अपना काम खुद करने की आदत रही है। इसका श्रेय मेरे पिताजी को है, जिन्होंने मुझे स्वावलम्बी बनने के लिए प्रेरित किया। वे कहते थे कि कोई भी काम छोटा नहीं होता। अपना काम खुद करने में शर्म कैसी ? वे अपने और बाबाजी के जूते खुद पालिश करते थे।… Read more »

चिंतन शिविर

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सोनिया कांग्रेस के सभी बड़े लोग सिर झुकाए बैठे थे। समझ नहीं आ रहा था कि वे चिन्ता कर रहे हैं या चिंतन; वे उदास हैं या दुखी; वे शोक से ग्रस्त हैं या विषाद से; वे निद्रा में हैं या अर्धनिद्रा में; वे जड़ हैं या चेतन; वे आदमी हैं या इन्सान ? आधा… Read more »