लेखक परिचय

व्‍यालोक पाठक

व्‍यालोक पाठक

मूलत: बिहार के रहनेवाले व्‍यालोक जी ने देश के प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय और भारतीय जनसंचार संस्‍थान से उच्‍च शिक्षा प्राप्‍त की। तत्‍पश्‍चात् साप्‍ताहिक चौथी दुनिया और दैनिक भास्‍कर से जुड़े रहे।

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व्यालोक पाठक

download‘बजरंगी भाईजान’ पर लिखने की न तो इच्छा ही थी, ना ही कोई तमन्ना। इस पर लिखना इसलिए पड़ रहा है कि कुछ वामपंथियों ने इस पर बहुत ही उल्टे और विकृत (जो उनका जन्मना अधिकार है) तौर पर लिखा है, उसमें सबसे हास्यास्पद तो यही है कि यह ‘सल्लू मियां’ का संघ(आर.एस.एस.) को उपहार है।

पहला स्टॉलिनियन प्रचार यह किया गया है कि यह फिल्म ‘सल्लू मियां’ के हाल (ध्यान दीजिएगा) में बेल पर छूटने और गुजरात के मुख्यमंत्री (तत्कालीन, जो अभी भारत के प्रधानमंत्री हैं, इन वामियों के दुर्भाग्य से) के साथ पतंग छूटने की वजह से उनका कृतज्ञता-ज्ञापन है। ठीक है, वामपंथियों को पढ़ाई-लिखाई से मतलब नहीं होता, लेकिन आप ज़रा यह याद कीजिए कि ‘सल्लू मियां’ कब से बेल यानी जमानत पर हैं। क्या मई 2014 से ही??

दूसरा, घटिया प्रचार यह है कि संघ को पहली बार मुख्यधारा के सिनेमा में दिखाया गया है। तो, भाउ, पहले तो यह जान लो कि आपको संघ की समझ ही नहीं है। इसमें तो संघ का अपमान किया गया है। जिस दृश्य में ‘सल्लू मियां’ अपने बचपन में कमर के बंद दुरुस्त कर गणवेश(संघियों का वह वेश, जिसे वामी-कामी निक्करधारी कहते हैं) धारण करता है, वह मुश्किल से 30 सेकंड का है और पूरे संघ परिवार पर गोबर लीप जाता है। वह कहता है, ‘मैं न पढ़ाई, न शरीर-गठन, न पॉलिटिक्स (ध्यान दीजिए, संघ कहां पॉलिटिक्स करता है, भइया…..आप वामियों की तरह….इस पर बकवास चाहे जो भी कर लें)’। उसके बाद उसका बाप निकाल देता है उसे और वह बारहवीं, 12 बार फेल होता है…माने सारे संघी ऐसे ही हैं….(ज्ञान तो वामी-कौमियों की बपौती है न)।

तीसरी बहुत अद्भुत बात, इसमें कही गयी है कि पाकिस्तान के लोगों से ‘जय श्रीराम’ कहलवाया गया है, जैसा गोधरा (जी हां, जहां पांच दर्जन कारसेवक जिंदा जला दिए गए, जिस पर आज भी राजनीति हावी है) में हिंदुओं ने मुसलमानों से कहा था। अच्छा, तो….सारे वामपंथी उस स्टेशन पर मौजूद थे, क्या??? तीस्ता सीतलवाड़ की तरह, जिसने लाखों रुपए उगाह कर उसे शराब और अय्याशी में बहा दिया…।

चौथी, बात….बजरंगी कहता है कि उसके घर में अभिवादन जय श्रीराम कहकर किया जाता है। जी हां, हम करते हैं। आपको क्या दिक्कत है सरकार? हम नमस्ते कहते हैं, राम-राम कहते हैं, हम अस्सलैम-अलैकुम भी कहते हैं, सलाम चचा भी कहते हैं… और मेरे गांव में तो हिंदू-मुसलमान एक-दूसरे को राम-राम कहते हैं…..आप वामियों को एयरकंडीशंड कमरों से निकलने की ज़रूरत है मालिक!

बाक़ी बातों के लिए, इस फिल्म के चरित्र को पहले समझना पड़ेगा। यह फिल्म पूरी तरह से सलमान का पी.आर. एक्सरसाइज़ है, इसलिए इसके बारे में इतना सीरियस होने की क्या जरूरत है? ‘सल्लू मियां’ पर इंडस्ट्री का 3 से 4 हज़ार करोड़ रुपए का दांव लगा है, इसलिए इस बारे में बहुत जानने की आवश्यकता नहीं। उनको जमानत लगातार मिलती रही है, जब तक संजू बाबा (ध्यान दीजिएगा, बाबा) पर दांव था, तो वह बाहर थे, वह कालबाह्य हुए, तो उनको भी दुनिया बिसर गयी। आप ‘सल्लू मियां’ की पिछली पांच-छह फिल्में देखिए। ‘किक’ में भाईजान बच्ची को बचाने के लिए, गुंडे बन गए, ‘एक था टाइगर’  का रोल याद कीजिए…’बॉडीगार्ड’ को याद कीजिए…’दबंग 1 और 2’ याद कीजिए, ‘सल्लू मियां’ कितने मानवीय, कितने ह्युमैनिटेरियन, कितने भले बनके निकले हैं।

इसलिए, कि इनके ख़िलाफ तमाम मुकदमे चल रहे हैं, वामी-कामी भाई। जहां तक इस ‘पूंजीवादी’ व्यवस्था की आप समझ रखते हैं (और, आप तो तमाम द्वंद्वात्मक व्यवस्था के ज्ञानी हैं सरकार..) ।

सबसे हास्यास्पद (जिस पर, हंसते-हंसते मैं पागल हो गया और जो छुपाने और दिखने की पुरानी स्टॉलिनियन शैली है)…कहा गया है कि ‘लड़की गोरी है, तो ब्राह्मण की बच्ची होगी…या मांस खाती है, तो क्षत्रिय होगी’…ठीक है, मान लिया। इसके बावजूद, यह बात बड़ी खूबी से छुपा ली गयी है कि उस घर में तो किसी और का भी प्रवेश वर्जित माना जाता है (फिल्म देखें), माने वह खांटी एक सामंती परिवार का चित्रण है। इसके अलावा, जब बच्ची अपनी पहचान पाकिस्तानी बताती है, तो वहां बताया गया है कि वह ‘शिया’ होगी….इसके बारे में काहे चुप्पी??

अब देखिए, कैसे ये कबूतर उड़ानेवाले (हिंद-पाक मैत्री संघ) किसी बात को कितना ग़लत इंटरप्रेट कर सकते हैं?? नायक अंदर से (सीमा के तारों से) घुस कर आया है और पाकिस्तान में पकड़े जाने पर कहता है कि वह परमिशन लेकर आया है, तो?? इसमें भारत की तरफ से घुसकर मारने की बात कहां से आयी यार? तीन बार वह पकड़ा जाता है, पाकिस्तानी रेंजर्स के द्वारा…और वही उसे जाने देते हैं…(बहरहाल, फिल्मी बातों को इतनी गंभीरता से नहीं लेना चाहिए)।

और अब,

वामी-कामी, जो कह रहे हैं कि यह मोहन भागवत के ‘हिंदू राष्ट्र’ के प्रति ‘सल्लू मियां’ का उपहार है। उनके लिए कुछ जानकारियां……

  1. फिल्म में हिंदू धर्म का बहुत का बहुत subtle तरीके से मज़ाक उड़ाया गया है। जैसे, नायक बजरंगबली का भक्त है, तो हरेक बंदर को प्रणाम करता है…उस दृश्य में नवाजुद्दीन सिद्दीकी का हंसना देखिए।
  2. फिल्म में आखिरकार, सब जगह से हारकर नायक आखिरकार कहता है कि वह सभी दरगाहों पर जाएगा और फिर अली मियां ही मुन्नी को उसकी अम्मी से मिलाते हैं, जब ‘सल्लू मियां’ अपने हाथ का रक्षा-कवच उतारकर दरगाह में बांध देते हैं। इस पर कोई प्रतिक्रिया।
  3. बजरंगबली के भक्त है, झूठ नहीं बोलेंगे- ऐसा नायक बोलता है, लेकिन आखिर जब झूठ बोलता है, तो पता नहीं, कौन सा भगवद्गीता का श्लोक बोलता है, जो पहले ‘करीना खान’ उसे सिखा चुकी होती है।
  4. और हां, आख़िर में जब ‘सल्लू मियां’ दुआ के अंदाज़ में (या फिर, अस्सैलमअलैकुम) हाथ उठाते हैं, तो उस पर कोई राय?
  5. भाई, खांटी कमर्शियल फिल्म है…सबको खुश करने की कोशिश है…इसकी इतनी व्याख्याएं क्यों….??

और, आख़िर में,

यह फिल्म पूरी तरह से सलमान की पी. आर. एक्सरसाइज़ के तौर पर बनायी गयी है, हालांकि वह पूरी तरह फ्लॉप हुए हैं। फिल्म पहले हाफ में रुला और सुला देती है। दूसरे हाफ में जब ‘नवाजुद्दीन सिद्दीकी’ आते हैं, तो फिल्म को अपने कांधे पर ले लेते हैं। फिल्म पूरी तरह नवाज और छोटी बच्ची ‘मुन्नी’ की है। इस फिल्म का कचूमर ‘सल्लू मियां’ ने निकाला है।

मुझे पता है कि फिल्म बहुत पैसे कमाएगी, लेकिन फिल्म सचमुच Avoidable है, हां, कुछ मार-धाड़, एक्शन-इमोशन देखना ही है, तो जुरासिक पार्क है, बाहुबली है और भी कई फिल्में हैं।

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